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बंगाल, तमिलनाडु, केरल में तख्तापलट का देश लिए मायने, अखिलेश के लिए क्या संदेश?

Dharmendra Singh
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 05, 2026 14:18 pm IST
    • Published On मई 05, 2026 14:08 pm IST
    • Last Updated On मई 05, 2026 14:18 pm IST
बंगाल, तमिलनाडु, केरल में तख्तापलट का देश लिए मायने, अखिलेश के लिए क्या संदेश?

लोकतंत्र में चुनाव मतदाता के दिल की धड़कन होती है, दिल की धड़कन से तय होता है कि प्रदेश और देश की दिशा और दशा क्या होगी. वोटरों ने पांच राज्यों में तय कर दिया है कि किस पार्टी की सरकार आएगी और किस पार्टी की सरकार जाएगी. गौर करने की बात है कि पांच राज्यों में तीन राज्यों में बदलाव की बयार चली और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन और केरल में लेफ्ट सरकार की विदाई हो गई, ये सरकारें बीजेपी की धुर विरोधी भी थीं। सबसे दिलचस्प रहा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नतीजे. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए अभेद किले को भेदना बड़ी सफलता मानी जा रही है, जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के धुर विरोधी तमिलनाडु की डीएमके की हार के बड़े मायने हैं. डीएमके सरकार को एक ऐसे नए और कम अनुभव वाले अभिनेता-नेता ने पटकनी दी जिसकी कोई कल्पना नहीं थी. मतलब दो ही राज्यों में सरकार की वापसी दिख रही है हालांकि मतगणना जारी है लेकिन पुदुचेरी में लगता है कि फिर से बीजेपी गठबंधन की सरकार बन सकती है. वहीं असम में तीसरी बार बीजेपी की वापसी यह संकेत देती है कि राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी की सबसे बड़ी जीत हुई है. इस जीत से केन्द्र और राज्य की राजनीति पर क्या असर होंगे, ये जानने की कोशिश करते हैं.

बंगाल में बंपर विजय के बाद कार्यकर्ताओं का अभिवादन स्वीकार करते पीएम मोदी

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क्या हार हुई?

लोकतंत्र में मतदाता मालिक होते हैं. अगर सरकार मतदाता के मन की बात नहीं समझ पाती है तो वह उसे सबक सिखाती है. ममता बनर्जी 15 साल से पश्चिम बंगाल में राज कर रही थीं, उनके खिलाफ नाराजगी थी, सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, बेरोजगारी, उद्योग-धंधों का बंद होना, शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर कमजोर होना और कानून-व्यवस्था की स्थिति की वजह से उनकी पार्टी की हार हुई. वहीं तमिलनाडु में डीएमके का पिछड़ना परिवारवाद की राजनीति से जनता की थकान को भी दिखाता है. ये दोनों जगह की सरकारें भले राज्य की थीं लेकिन सीधा चुनौती पीएम मोदी को दे रही थीं. हर बात में केन्द्र सरकार से टकराना, विरोध करना और दो-दो हाथ करने की स्थिति बनी रहती थी. भले इन नेताओं को अच्छा लगता था लेकिन मतदाता को आपसी लड़ाई से ज्यादा मतलब नहीं था, यही वजह रही कि जनता ने सबक सिखाने का फैसला किया. देश में आकांक्षी वर्ग बढ़ रहा है, जेन जी का भी असर है, रोजगार, विकास और महिला सशक्तिकरण मुख्य मुद्दे हैं, लगता है कि बीजेपी जनता के नब्ज को पकड़ने में सफल रही है.

पारंपरिक बंगाली धोती-कुर्ता में बीजेपी मुख्यालय पहुंचे थे पीएम मोदी

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बीजेपी का फैलता दायरा 

जब से केन्द्र में मोदी सरकार आई है तब से देश में बीजेपी की राजनीतिक जमीन का दायरा बढ़ता जा रहा है और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार ढहने के बाद राज्य में विपक्षी सरकारें ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही हैं, जो लोकतंत्र के शुभ संकेत नहीं हैं क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत रहने के लिए विपक्ष का मजबूत रहना जरूरी होता है. बीजेपी ऐसे राज्यों में अपने बलबूते पर सरकार बनाने और अपना मुख्यमंत्री नियुक्त करने में सफल रही है जहां वह पहले कमजोर मानी जाती थी, मसलन असम, ओडिशा, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा, नागालैंड और मेघालय इत्यादि. अब पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी हार गईं हैं और तमिलनाडु में ऐसी स्थिति हो सकती है कि नई सरकार के गठन में एनडीए की भूमिका हो सकती है?

अखिलेश यादव के सामने यूपी में है बड़ी चुनौती

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केंद्र में राजनीतिक स्थिरता

देश में चुनाव प्रेशर कुकर की सीटी की तरह है, यह सरकार को बताने में सफल रहता है कि वोटर में कितनी उबाल है या कितनी ठंडक है. विपक्ष लगातार सरकार की नीति, नीयत और निर्णय पर सवाल उठाता रहता है, लेकिन जब चुनाव के नतीजे विपक्ष के पक्ष में जाते हैं तो उसका हौसला बढ़ जाता है कि केन्द्र सरकार की पकड़ जनता पर ढीली पड़ रही है और फिर विपक्ष को उत्साह मिलता है और वह सड़क से संसद तक घेरने की रणनीति बनाता है, जबकि सत्ताधारी पार्टी की जीत से सरकार का हौसला बढ़ता है और उसे लगता है कि वोटर का विश्वास उसके साथ है. अब मोदी की जीत के बाद केंद्र सरकार की स्थिरता मजबूत होती है. इससे नीति-निर्माण में निरंतरता बनी रहती है और बड़े फैसलों को लागू करने में तेजी आती है. सरकार फिर नए जोश से काम करती है. आर्थिक सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इंडिया और कल्याणकारी योजनाओं जैसे एजेंडा को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है. इससे नीति की दिशा अधिक केंद्रीकृत हो सकती है। सरकार फिर विपक्ष को याद दिलाने की कोशिश करेगी कि जनता के न्यायालय में विपक्ष की फिर हार हुई है.

यूपी में बीजेपी के खिलाफ अखिलेश को बनानी होगी तगड़ी रणनीति

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ममता की हार से बढ़ गयी विपक्ष की धड़कनें

पांच राज्यों के चुनाव के बाद अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होने हैं, इसके बाद तुरंत गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव होने हैं. बंगाल में फतह के बाद बीजेपी का जोश हाई है. इसका असर विपक्षी पार्टियों पर भी पड़ सकता है. हालांकि विपक्ष की दो ही जगह सरकार है, एक हिमाचल और दूसरा पंजाब—लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव काफी जोश में हैं. 2024 के चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद अखिलेश को लग रहा है कि 2027 के चुनाव में कड़ी टक्कर होगी, लेकिन बंगाल के चुनाव नतीजों से उन पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी झारखंड छोड़कर महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में लगातार बढ़त बना रही है. वहीं विपक्ष से चूक हुई है कि पश्चिम बंगाल में विपक्षी एकता क्यों नहीं बन पाई और असम में बदरुद्दीन अजमल की अगुवाई वाली एआईयूडीएफ से गठबंधन क्यों नहीं हो पाया.

पश्चिम बंगाल में टीएमसी को लगा है तगड़ा झटका

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विपक्ष बीजेपी की चाल नहीं समझ पाया

पश्चिम बंगाल की लड़ाई भी आसान नहीं थी. जब सरकार ने महिला आरक्षण बिल लेकर आई तो विपक्ष ने उसे हल्के में लिया, लेकिन वह यह समझ नहीं पाया कि बीजेपी महिला वोटरों को अपनी तरफ खींचने की बड़ी रणनीति बना रही है. वहीं संगठनात्मक बदलावों को भी विपक्ष ठीक से नहीं समझ पाया. अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के लिए पूरा जोर लगाया और जिस तरह से शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए पैरामिलिट्री फोर्स लगाई गई, उससे मतदाता में भरोसा बढ़ा और पिछली बार की तरह हिंसा की स्थिति नहीं बनी.

अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर

मजबूत जनादेश के साथ भारत की वैश्विक छवि में स्थिरता और निरंतरता का संदेश जाता है, जिससे विदेश नीति में सरकार को अधिक आत्मविश्वास मिलता है. इससे अन्य देशों में भी यह धारणा बनती है कि भारत में सरकार मजबूत है और उसकी वैश्विक अहमियत बढ़ रही है. भले भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में अपने दम पर पूर्ण बहुमत न मिला हो, लेकिन उसके राजनीतिक प्रभाव और भौगोलिक विस्तार में वृद्धि देखी जा रही है. नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक मजबूत हुई है, क्योंकि मतदाता का रुझान पार्टी के पक्ष में बना हुआ दिखता है। वहीं दूसरी ओर, विपक्ष के सामने अपनी रणनीति और संगठन को और मजबूत करने की चुनौती बनी हुई है.

(डिस्क्लेमर: लेखक राजनैतिक और चुनाव विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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