पिछले साल कोसी नदी का पानी सोमेश्वर बाजार में आ गया था. ऐसा फिर न हो, इसके लिए इन दिनों कोसी नदी के तल को गहरा करने और उसे कैनलाइज करने के लिए कोसी में जेसीबी लगी हुई हैं.
कोसी नदी के तल को गहरा करने और उसे कैनलाइज करने के काम को लेकर स्थानीय युवा कवि हर्ष काफर ने भूवैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद डॉ. जुयाल और हर्ष काफर ने एक दस्तावेज तैयार किया है, जिसमें मानसून आधारित कोसी नदी के तल को गहरा और कैनलाइज करने से होने वाले संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर अध्ययन प्रस्तुत किया गया है.
दस्तावेज में चेतावनी दी गई है कि इस तरह के हस्तक्षेप के ऐसे पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं, जिन्हें बाद में ठीक करना मुश्किल होगा.
नदी के प्राकृतिक ढलान से छेड़छाड़ का खतरा
दस्तावेज के मुताबिक, उत्तराखंड का लघु हिमालय (लेसर हिमालय) घनी आबादी वाला क्षेत्र है. यहां की जमीन का ढलान कम है और यह ऊंचे हिमालय की तुलना में ज्यादा स्थिर है. यहां के लोग खेती और पानी के लिए पहाड़ी नदियों, नालों और जंगलों पर निर्भर हैं. निचली घाटियों में नदियों और नालों के पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है. गांवों में पीने के पानी का एक बड़ा आधार जंगल, गांवों के ऊपर बने 'खाल' और मानसूनी नालों से जमीन के अंदर पानी पहुंचना है.
दस्तावेज के मुताबिक, ऐसे में नदी या नाले के तल से मिट्टी, पत्थर और दूसरी सामग्री हटाना खतरनाक हो सकता है. मानसून के दौरान नदी और नालों के प्राकृतिक बहाव में इस तरह के बदलाव से आसपास के इलाके पर असर पड़ने की संभावना है.
जलधारा का मार्ग बदलने का असर
हर्ष के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में मानसूनी और भूजल से चलने वाले नालों को गहरा और सीधा करने से उनका प्राकृतिक स्वरूप बदल जाएगा. इससे पूरे जलक्षेत्र के पर्यावरण और पानी के प्राकृतिक चक्र पर असर पड़ेगा. जलधारा को गहरा करने से पानी की क्षमता और बहने की गति बढ़ जाएगी. इससे स्थानीय स्तर पर बाढ़ कम हो सकती है, लेकिन तेज बारिश के समय पानी का बहाव और तेज हो जाएगा. इससे निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ने की आशंका है.
उनके मुताबिक, जब किसी जलधारा को गहरा करके उसे सीधा नाला बना दिया जाता है तो आसपास का भूजल स्तर नीचे चला जाएगा. इसका असर आसपास के पहाड़ी झरनों पर पड़ेगा और खासकर निचली घाटियों में झरने सूखने की आशंका है. इससे मिट्टी में नमी कम होगी और नदी किनारे उगने वाली उन वनस्पतियों पर भी असर पड़ेगा जो उथले भूजल पर निर्भर रहती हैं.
जलीय जीवन और नदी किनारों पर असर
हर्ष काफर कहते हैं "प्राकृतिक मानसूनी जलधाराओं में पत्थरों, बजरी और रेत के जमा होने से छोटे-छोटे कुंड और गड्ढे बनते हैं. ये पानी की गति को धीमा करने का काम करते हैं और जलीय जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करते हैं."
डॉ. नवीन जुयाल के मुताबिक नदी तल को गहरा करने से गहरे कुंड और उथले तेज बहाव का यह प्राकृतिक क्रम बिगड़ जाएगा. इससे पहाड़ी मछलियों और मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स (अकशेरुकी जीवों) के प्रजनन, भोजन और रहने के स्थान प्रभावित होंगे. इससे नदी का प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र भी तेज बहाव वाली जल निकासी नाली में बदल जाएगा और जमीन की पानी रोकने की क्षमता कम होगी.
उनके अनुसार नदी तल को गहरा करने से नदी के किनारे ज्यादा सीधे, खड़े और अस्थिर हो जाएंगे. नदी के ढलान का स्वरूप बदलने से ऊपर की ओर कटाव शुरू होगा और पुल, पुलिया (कलवर्ट) तथा ऊपरी ढलान भी अस्थिर होने की आशंका है. भारी मानसूनी बारिश के दौरान नदी का पानी किनारों को नीचे से काट सकता है. इससे नदी के किनारों के ढहने का खतरा बढ़ जाएगा.
हिमालय में छेड़छाड़ से पहले उसके परिणाम समझने जरूरी
हर्ष काफर ने कहा कि उन्होंने इस विषय पर प्रशासन से बात की तो उनका कहना था कि ऐसा करने से बाजार की तरफ पानी जाने का खतरा नहीं रहेगा. हर्ष का कहना है कि पर्यावरण के साथ ऐसी कोई भी छेड़छाड़ करने से पहले उसके वैज्ञानिक असर को समझना भी जरूरी है.