उत्तर प्रदेश को लेकर लंबे समय तक एक धारणा प्रचलित रही कि यहां के युवाओं को रोजगार के लिए बड़े शहरों या अन्य राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता है. विपक्ष की कुछ आलोचनाओं में इस बात को उठाया गया कि प्रदेश के बजट में रोजगार का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिखता और शिक्षित बेरोजगारी की समस्या की अनदेखी की जा रही है. शहरी और अर्ध-शहरी युवाओं की चिंताओं को भी इसी संदर्भ में सामने रखा जाता है। मगर, यदि तथ्यों और नीतिगत दिशा को समग्रता में देखा जाए, तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है, जो इन निराधार बातों को ध्वस्त कर देती है.
स्वरोजगार के जरिए आत्मनिर्भर बन रहे युवा
वास्तव में, उत्तर प्रदेश का 2026-27 का बजट और पिछले वर्षों की नीतियां यह संकेत देती हैं कि राज्य के युवाओं को न केवल उनके ही शहरों-गांवों व आसपास के क्षेत्रों में रोजगार मिल रहा है, बल्कि वह स्वरोजगार के जरिए आत्मनिर्भर बन अन्य युवाओं के लिए भी रोजगार से अवसरों का सृजन कर रहे हैं. ऐसे में, अब उत्तर प्रदेश रोजगार खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला प्रदेश बनने की दिशा में आगे बढ़ चुका है.
बेरोजगारी दर और आय में सुधार है स्पष्ट संकेत
इस प्रभाव को समझने के लिए सबसे पहले बुनियादी संकेतकों पर नजर डालते हैं. प्रदेश में बेरोजगारी दर 2.24 प्रतिशत रही है. यह आंकड़ा अपने आप में एक संकेत है कि रोजगार सृजन की प्रक्रिया जमीन पर असर दिखा रही है। साथ ही, वर्ष 2025-26 में प्रति व्यक्ति आय लगभग 1.20 लाख रुपये होने का अनुमान है, जो पिछले वर्षों की तुलना में वृद्धि को दर्शाता है. आय में यह सुधार केवल सरकारी वेतनभोगियों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक आर्थिक गतिविधियों के विस्तार का परिणाम है.
पूंजीगत व्यय से रोजगार: प्रत्यक्ष नहीं, पर व्यापक प्रभाव
विपक्ष की आलोचनाओं में अक्सर ये तर्क दिया जाता है कि योगी सरकार बड़े पैमाने पर भर्तियां नहीं कर रही, इसलिए रोजगार का रोडमैप स्पष्ट नहीं है. लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है. आधुनिक अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन का स्वरूप बदल चुका है. सरकारी नौकरियां स्वभावतः सीमित होती हैं. ऐसे में, स्थायी समाधान निजी क्षेत्र, विनिर्माण, सेवाओं और निर्माण गतिविधियों के विस्तार से आता है. उच्च पूंजीगत व्यय से सड़क, औद्योगिक पार्क, लॉजिस्टिक्स, डेटा सेंटर और शहरी अवसंरचना विकसित होती है, जिससे निर्माण, आपूर्ति श्रृंखला, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में व्यापक रोजगार पैदा होते हैं। उत्तर प्रदेश ने इसी मॉडल को अपनाया है.
प्रदेश में बढ़ते निवेश ने रोजगार सृजन को दिया बढ़ावा
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा इन्वेस्टर्स समिट और ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के माध्यम से लगभग 50 लाख करोड़ रुपये के एमओयू हस्ताक्षरित हुए हैं, जिनसे लगभग 10 लाख रोजगार सृजन धरातल पर उतर रहा है. यह केवल घोषणा नहीं, बल्कि निवेश आधारित विकास का संकेत है. डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना के अंतर्गत 35,280 करोड़ रुपये के निवेश के साथ 53,263 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार का अनुमान है. साफ है कि जब प्रदेश में बड़े उद्योग आते हैं, तो उनके साथ सहायक उद्योग और सेवा क्षेत्र भी विकसित होते हैं. इसी प्रकार, पर्यटन समेत विभिन्न सेक्टर्स में युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसरों का सृजन हुआ है.
कौशल और सेवायोजन: युवाओं की क्षमता पर निवेश
रोजगार केवल पदों की संख्या से नहीं, बल्कि युवाओं की क्षमता से भी जुड़ा है। उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन द्वारा पिछले पांच वर्षों में 9.25 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया, जिनमें से 4.22 लाख युवाओं को विभिन्न प्रतिष्ठित कंपनियों में सेवायोजित किया गया. यह बताता है कि सरकार कौशल आधारित रोजगार मॉडल पर काम कर रही है. उत्तर प्रदेश रोजगार मिशन का गठन भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया है.
सरकारी भर्तियां भी जारी
प्रदेश में योगी सरकार सरकारी क्षेत्र में भी युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का मार्ग सुनिश्चित कर रही है. पुलिस विभाग में वर्ष 2017 से अब तक 2,19,000 से अधिक पदों पर भर्ती की गई है. मिशन रोजगार के अंतर्गत राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में 8,966 नियुक्तियों की प्रक्रिया पूर्ण हुई तथा सहायता प्राप्त अशासकीय माध्यमिक विद्यालयों में 34,074 शिक्षकों का चयन किया गया. ये आंकड़े दर्शाते हैं कि जहां आवश्यकता है, वहां नियुक्तियां भी हुई हैं.
स्वरोजगार और उद्यमिता: आत्मनिर्भरता की दिशा
रोजगार का सबसे सशक्त मॉडल वह है जिसमें युवा स्वयं उद्यमी बनें। मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान के अंतर्गत प्रतिवर्ष 1 लाख नए सूक्ष्म उद्यम स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित है। एमएसएमई क्षेत्र पहले से ही लगभग 3.11 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। वस्त्र उद्योग क्षेत्र में वर्ष 2026-27 में 30,000 रोजगार सृजन का लक्ष्य तय किया गया है। यह बताता है कि रोजगार का विकेंद्रीकृत मॉडल विकसित हो रहा है, जिसमें छोटे शहर और जिले भी शामिल हैं।
ग्रामीण क्षेत्र में भी अवसर
मनरेगा के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2025-26 में 20 करोड़ से अधिक मानव दिवस का सृजन हुआ तथा 47.11 लाख परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया गया. यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है. जब गांव में आय के अवसर बढ़ते हैं, तो शहरों की ओर अनिवार्य पलायन कम होता है. इसे अब वीबी-जीरामजी के जरिए नए तरीके से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दिशा देने वाले कदम के रूप में परिवर्तित किया जाएगा.
भविष्य की तकनीक और नई अर्थव्यवस्था
सरकार केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. एआई जैसे उभरते क्षेत्रों में भी प्रयास हो रहे हैं. एआई प्रज्ञा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदेश में एआई दक्ष युवाओं की कार्यबल तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है. डेटा सेंटर, डिजिटल अवसंरचना और आईटी क्षेत्र में निवेश उत्तर प्रदेश को भविष्य की अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालने की कोशिश है. यह दृष्टिकोण केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आने वाले दशक के लिए भी रोजगार सुनिश्चित करने का प्रयास है.
बदलती धारणा, बदलता प्रदेश
विपक्ष को यह समझना होगा कि उत्तर प्रदेश अब केवल सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा करने वाला राज्य नहीं रहा. यहां निवेश आ रहा है, उद्योग स्थापित हो रहे हैं, युवा प्रशिक्षित होकर सेवायोजित हो रहे हैं, स्वरोजगार को बढ़ावा मिल रहा है और भविष्य की तकनीकों में भी स्थान बनाया जा रहा है. आज स्थिति यह बन रही है कि रोजगार की तलाश में बाहर जाने की मजबूरी घट रही है, क्योंकि अवसर अब शहरों, जिलों और आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध हो रहे हैं. यह परिवर्तन रातों-रात नहीं आया, बल्कि सुनियोजित नीति, पूंजी निवेश और कौशल विकास के सम्मिलित प्रयासों का परिणाम है. उत्तर प्रदेश का रोजगार परिदृश्य बदल रहा है, और यही बदलाव उसकी नई पहचान बनता जा रहा है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)