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क्या डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा से बदलेगा एशिया का शक्ति संतुलन, भारत की चुनौती क्या है

डॉक्टर राजीव रंजन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 15, 2026 14:22 pm IST
    • Published On मई 15, 2026 14:22 pm IST
    • Last Updated On मई 15, 2026 14:22 pm IST
क्या डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा से बदलेगा एशिया का शक्ति संतुलन, भारत की चुनौती क्या है

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को बीजिंग के जन सभागार (रनमिन ताहुई थांग) में मुलाक़ात की. दोनों नेताओं की नौ साल बाद हुई यह मुलाकात अमेरिका-चीन संबंधों और बदलते वैश्विक समीकरणों की गवाही दे रहे थे. शी और ट्रंप की इस मुलाकात में द्विपक्षीय जरूरतों के साथ-साथ गहरे रणनीतिक संकेत भी शामिल हैं. पर क्या चीन और अमेरिका के संबंधों में गुणात्मक और संरचनात्मक परिवर्तन मुमकिन है? क्या शी और ट्रंप की मुलाक़ात निक्सन और माओ के भेंट को दोहराते हुए रिश्तों में फिर से सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक परस्परता को दोहराएगा? 

बैठक के दौरान शी जिनपिंग ने जिस तरह ताइवान का मुद्दा उठाया और एक तरह से अमेरिकी नेतृत्व को सावधान करते हुए कहा,''ताइवान का सवाल चीन-अमेरिका संबंधों का सबसे केंद्रीय मुद्दा है. यदि इसे सही ढंग से संभाला गया तो द्विपक्षीय संबंध स्थिर रहेंगे, लेकिन यदि इसमें चूक हुई तो दोनों देश टकराव, यहां तक कि संभावित संघर्ष की ओर बढ़ सकते हैं, इससे पूरे संबंध खतरे में पड़ जाएंगे.''

क्या है अमेरिका-चीन संबंधों का भविष्य

शी ने अपने संबोधन में 'चीन-अमेरिका रचनात्मक सामरिक स्थिरता संबंध' पर जोर देते हुए दोनों देशों के भविष्य की नई रूपरेखा पेश की. मतलब चीन अब मानने लगा है कि दोनों देशों के संबंधों में पुरानी लय ला पाना मुश्किल है. लेकिन वह सहयोग पर जोर देते हुए एक नियंत्रित और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के ज़रिए संबंधों में सकारात्मक स्थिरता बनाना चाहता है. वैसे देखा जाए तो चीनी और अमेरिकी प्रशासन अब ये मान चुके हैं कि 'पूर्ण सहयोग' या 'पूर्ण अलगाव' दोनों ही संभव नहीं हैं. अमेरिकी टैरिफ के जवाब में चीन की प्रतिक्रिया ने ट्रंप के आक्रामक राजनयिक की धार को कुंद किया. 

शी ने यहां तक कहा कि 'ताइवान की स्वतंत्रता' और 'ताइवान जलडमरूमध्य की शांति' साथ-साथ नहीं चल सकते. दोनों देशों के लिए ताइवान में शांति बनाए रखना सबसे बड़ा साझा हित है. चीन का यह संदेश अमेरिकी पक्ष के लिए सीधा और साफ-साफ संदेश था कि इस मुद्दे पर चीन किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है. 

ट्रंप और शी ने ने वैश्विक चुनौतियों जैसे, मध्य पूर्व की जटिल स्थिति, यूक्रेन संकट और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी बात की. इसके साथ ही इस साल होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) शिखर सम्मेलन और जी-20 शिखर सम्मेलन को सफल बनाने के लिए एक-दूसरे का समर्थन करने पर भी सहमति बनी.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़ता चीन का दखल

चीनी मीडिया के मुताबिक शी जिनपिंग ने चर्चा के दौरान कुछ बुनियादी सवाल भी उठाए, क्या चीन और अमेरिका तथाकथित 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' से बच सकते हैं? क्या वे वैश्विक चुनौतियों का सामना मिलकर कर पाएंगे? और क्या दोनों देश अपने-अपने नागरिकों के साथ-साथ पूरी मानवता के भविष्य को ध्यान में रखते हुए बेहतर संबंध विकसित कर सकते हैं? ये सवाल केवल कूटनीतिक बयानबाजी भर नहीं है,बल्कि चीन की विश्व राजनीति में बढ़ते दख़ल और ग्लोबल साउथ के सामने चीन की एक जिम्मेदार छवि पेश करने की कोशिश है. ताकि जब ताइवान को लेकर युद्ध की स्थिति बने तो अमेरिका को दोषी ठहराया जाए. जैसे  वर्तमान ईरान-इसरायल-अमेरिका युद्ध के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट के लिए चीन अमेरिका को ज़िम्मेदार मान रहा है. 

ट्रंप की इस चीन यात्रा ने नई उम्मीदों को जन्म दिया है. चीन चाहता है कि संबंधों में स्थिरता आए, व्यापारिक बाधाएं कम हों और ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका संयम बरते. वहीं दूसरी ओर, अमेरिका चाहता है कि उसे चीनी बाजार में बेहतर पहुंच मिले, कृषि और अन्य क्षेत्रों में खरीद बढ़े और वैश्विक मुद्दों पर चीन अधिक रचनात्मक भूमिका निभाए.

अमेरिका-चीन संबंधों का आर्थिक पक्ष

राष्ट्रपति ट्रंप के साथ आया अमेरिकी सीईओ का भारी-भरकम प्रतिनिधिमंडल इस बात का संकेत है कि दोनों देश पूर्ण वियोजन या संबंधों को खत्म करने (Decoupling) की दिशा में नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि सहयोग और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा के संतुलित मार्ग को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं. अमेरिकी व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी अमेरिका-चीन संबंधों में आर्थिक संभावना की तलाश करती हुई नजर आई. एलन मस्क, जेन्सेन हुआंग जैसे कई प्रमुख सीईओ की भागीदारी यह दिखाती है कि सामरिक तनाव से ज़्यादा आर्थिक जरूरतें दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर रही हैं. यात्रा में यह साफ दिखा कि राजनीतिक तनाव चाहे जितना भी हो, अमेरिकी कंपनियां चीन के विशाल बाजार, उसकी मजबूत विनिर्माण क्षमता और तेजी से उभरती नवाचार शक्ति को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं हैं. उनके लिए चीन सिर्फ 'दुनिया का कारखाना' नहीं, बल्कि एक बड़ा और लगातार फैलता उपभोक्ता बाजार भी है.शी ने इसे रेखांकित करते हुए कहा भी कि अमेरिकी उद्यम चीन के सुधार और खुलेपन से गहराई से जुड़े हुए हैं. आगे भी चीन अपने दरवाजों को और व्यापक रूप से खोलेगा. दोनों देशों की आर्थिक टीमों के समझौते को संतुलित और सकारात्मक बताया गया.

यदि अमेरिका-चीन संबंधों में गुणात्मक सुधार आता है तो एशिया में पिछले सालों के संरचनात्मक बदलावों खासकर इंडो-पैसिफिक रणनीति के मजबूत झुकाव पर कुछ हद तक धीमापन आ सकता है. ट्रंप प्रशासन की नवीनतम नीतियों को देखते हुए अभी कोई निश्चित भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी. 

क्या कारगर है भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति

भारत ने हाल के सालों में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया था. ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत पर लगाए टैरिफ के बाद भारत पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपने रणनीतिक विकल्पों को अधिक लचीला रखना चाहता है. लेकिन चीन-अमेरिका संबंधों में बढ़ती स्थिरता से भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट नीति को नए सिरे से सशक्त करना होगा. भारत को हेजिंग की रणनीति अपनाते हुए अमेरिका और चीन, दोनों के साथ संबंध बनाए रखना होगा.

अमेरिका और चीन के बदलते रिश्तों से एशिया में शक्ति संतुलन का पूरा समीकरण बदल सकता है. यह बदलाव क्षेत्रीय शक्ति की गतिशीलता और सुरक्षा संरचना ख़ासकर दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी एशिया को प्रभावित करेगा. हालांकि अमेरिका और चीन के बीच गहरे संरचनात्मक मतभेद, आंतरिक राजनीतिक दबाव और सुरक्षा संबंधी अविश्वास अभी भी बरकरार रहेंगे.ताइवान, हाई टेक्नोलॉजी क्षेत्र और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर टकराव की आशंका बनी रहेगी. 

डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के चीनी अध्ययन, पूर्वी एशियाई अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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