लोकतंत्र के सामने कई बार ऐसे प्रश्न आते हैं जिनका उत्तर पाने के लिए हमें संविधान, संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों और संविधान बनने के दौरान हुई बहसों की ओर देखना पड़ता है. समान नागरिक कानून या यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) एक ऐसा ही मुद्दा है, जिस पर हो रही बहस का समाधान खोजने के लिए हमें वहीं जाना पड़ेगा अर्थात गणतंत्र के मूल स्थान की ओर.
इस विषय पर हो रही तमाम बहसों को इस एक प्रश्न में समेटा जा सकता है: जब कभी रिलीजियस ट्रेडिशन, मजहबी किताबें या पारंपरिक व्यवहार एक तरफ हो और दूसरी तरफ मानवाधिकार, महिला अधिकार और संवैधानिक मूल्य हों और दोनों टकरा रहे हों तो शासन को क्या करना चाहिए?
इस लेख में मैं इस मान्यता के पक्ष में तर्क दूंगा कि
जब ऐसा प्रश्न उपस्थित हो जाए तो राज्य यानी शासन को निष्पक्षता की आड़ में नहीं छिपना चाहिए और न ही ये कहना चाहिए कि जब सर्वमान्यता बन जाए यानी हर कोई सहमत हो जाए तब ही कोई कदम उठाया जाएगा.
किसी भी मजहबी या रिलीजियश शासन के उलट, सेक्युलर सरकार को अपने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और ऐसा करते हुए अगर रिलीजियस परंपराएं या मान्यताएं टूटती हों तो इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए.
धार्मिक परंपराओं, खासकर ऐसी परंपराएं जो संवैधानिक मूल्यों से टकराती हों, उनकी रक्षा करने का दायित्व किसी भी सेक्युलर और लोकतांत्रिक राष्ट्र को अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए.
धार्मिक परंपराओं में भी ये चुना जाना चाहिए कि किसी धर्म में कौन सा तत्व अनिवार्य है और कौन सा नहीं. जो अनिवार्य तत्व नहीं हैं, उन मामलों से सुधार प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए. हालांकि रिलीजीन के अनिवार्य तत्व भी संविधान से ऊपर नहीं होने चाहिए.
समान नागरिक संहिता पर बहस क्यों
ये नीति सिद्धांत आज ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं, क्योंकि समान नागरिक संहिता या यूसीसी को लेकर देश में बहस चल रही है. एक के बाद एक राज्य सरकारें यूसीसी लागू कर रही हैं या लागू करने जा रही हैं. इन सभी मामलों में ये विवाद खड़ा किया जा रहा है कि ये धर्म या पंथ मानने के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण या उल्लंघन तो नहीं है?
भारत में जब संविधान की रचना हो रही थी तो यही प्रश्न संविधान निर्माताओं के सामने भी आया था. इसी बहस की निष्पत्ति या निष्कर्ष अनुच्छेद 44 के रूप में सामने आता है, जिसमें राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अध्याय में राज्य से ये अपेक्षा की गई है कि वह सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाएगा. संविधान सभा के सदस्यों की यह राय उभर कर आई कि एक आधुनिक गणराज्य अलग-अलग धर्म आधारित नागरिक कानूनों के साथ नहीं चलाया जाना चाहिए. ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डॉ बीआर आंबेडकर समान नागरिक संहिता के पक्ष में खड़े हुए. उन्होंने ये माना कि पहले भी न्याय या लोकतांत्रिक मूल्यों का सवाल आने पर राज्य ने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप किया है.
स्पष्ट है कि अनुच्छेद 44 को संविधान में लाना एक योजना के तहत था. इसके माध्यम से सरकारों को ये बताना था कि उन्हें किस दिशा में बढ़ना है और उनका लक्ष्य क्या होना चाहिए. हालांकि उस समय इसे झटके में लागू नहीं किया गया लेकिन योजना ये नहीं थी कि आम राय बनाने के नाम पर सरकारें इसे अंतहीन रूप से टालती रहें, जैसा कि बाद में हुआ.
संविधान ने कितनी धार्मिक स्वतंत्रता दी है
समान नागरिक संहिता के विरोधियों का कहना है कि संविधान के मौलिक अधिकारों के चैप्टर के अनुच्छेद 25 और 26 में जो धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है, वह नीति-निर्देशक तत्वों के चैप्टर में आए आर्टिकल 44 में वर्णित समान नागरिक संहिता के लक्ष्य के ऊपर है. लेकिन वे इस बात की अनदेखी कर देते हैं कि आर्टिकल 25 और 26 में धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है और इसे लोक व्यवस्था अर्थात पब्लिक ऑर्डर, सदाचार अर्थात मोरालिटी और स्वास्थ्य की शर्तों के तहत रखा गया है. अर्थात कोई धार्मिक स्वतंत्रता अराजकता पैदा करने के आधार नहीं बन सकती न ही अनैतिकता को धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ से सही ठहराया जा सकता है. धार्मिक स्वतंत्रता के अनुच्छेद संविधान की प्रस्तावना और समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के संवैधानिक मूल्यों के तहत ही काम करेंगे. प्रस्तावना और संवैधानिक मूल्य ही धार्मिक स्वतंत्रता की लिमिट तय करते हैं.
थोड़ा पीछे जाएं तो सती उन्मूलन करते समय भी ये सवाल तब की सत्ता के सामने थे. सती समर्थकों ने तर्क दिया था कि ये धार्मिक परंपरा है. वे ये तर्क लेकर आए कि विधवा महिला स्वेच्छा से पति की चिता पर अग्नि का वरण करती है, इसलिए शासन को कोई अधिकार नहीं है कि इसमें हस्तक्षेप करे. सती विरोधियों ने शास्त्रों से तर्क जुटाए कि सती प्रथा धार्मिक विधान नहीं है. हालांकि ब्रिटिश शासन ने इस बहस से आगे जाकर, सती को मानवीय मूल्यों के विरुद्ध मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया. तब के शासन ने ये नहीं माना कि परंपरा धार्मिक है तो सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती.
इसी तरह 1950 के दशक में हिंदू कोड बिल को कई अलग-अलग कानूनों के जरिए जब लागू किया जा रहा था तब भी इनका इस आधार पर विरोध हुआ कि राज्य को धार्मिक परंपराओं और विधियों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. पर इस तर्क को खारिज करते हुए विवाह, सैपरेशन, विरासत और गोद लेने आदि के कानून लागू हुए. आज ये बहस ही नहीं बची है कि ये कानून गलत हैं या धर्म विरुद्ध हैं. इन सभी कानूनों का दार्शनिक आधार ये था कि ये संवैधानिक मूल्यों, मानवाधिकार और महिला अधिकारों के अनुरूप हैं.
मुस्लिम पर्सनल लॉ कब बना था
इन कानूनों के कारण हिंदुओं और कई धर्मों में बहु विवाह पर कानूनी तौर पर पाबंदी लग गई है और विवाह संबंध विच्छेद, गुजारा भत्ता आदि के प्रावधान आए हैं. बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का कानूनी अधिकार मिला है. कोई कारण नहीं है कि मुसलमान महिलाओं के लिए संविधान का ये तर्क लागू न हो. हिंदू या बौद्ध या सिखों के लिए अगर सिविल कानून राज्य बना सकता है तो किसी भी रिलीजन को इससे अलग क्यों रखा जाए?
मुसलमानों का सिविल कानून आज भी ब्रिटिश दौर के शरियत एप्लिकेशन एक्ट 1937 से चलता है.ये भी कोई ईश्वर या अल्लाह का बनाया हुआ कानून नहीं है. इसे ब्रिटिश सरकार ने बनाया था. इसमें संसद कई बार संशोधन कर चुकी है, यानी ये संशोधन से ऊपर नहीं है और न ही ये आलोचना या जांच से परे हैं.
संसद और कोर्ट पहले भी मुसलमानों के सिविल मामलों में हस्तक्षेप कर चुके हैं. मिसाल के तौर पर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर परित्यक्ता महिला को गुजारा भत्ते के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. इसी तरह 2017 के तीन तलाक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन बार तलाक बोलकर विवाह समाप्त करने की प्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) को अमान्य ठहराया. इसके बाद संसद ने 2019 में इस संबंध में कानून बनाया. इस कानून का खास विरोध नहीं हुआ. अर्थात मुस्लिम समाज भी आवश्यक सुधारों के लिए प्रस्तुत है और वहां भी इसका विरोध सिर्फ कट्टरपंथी तत्व ही करते हैं.
हिजाब जैसे मामलों में भारतीय न्यायपालिका ने यह सिद्धांत अपनाया है कि केवल वही धार्मिक प्रथाएं विशेष संवैधानिक संरक्षण की अधिकारी हैं जिन्हें धर्म का अनिवार्य (Essential Religious Practice) हिस्सा माना जाए. हालांकि हिजाब पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 25(2) के तहत राज्य सामाजिक सुधार के लिए धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकता है. वैसे भी भारतीय संदर्भों में सेक्य़ुलरिज्म का अर्थ राज्य का धार्मिक मामलों से बिल्कुल अलग होना नहीं है, बल्कि इसे सर्व धर्म समभाव के रूप में समझा गया है. हमारे देश की नीति समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए धार्मिक मामलों में नीति सम्मत हस्तक्षेप करने की है. आखिर इसी के तहत तो भारत ने छुआछूत का उन्मूलन किया, जबकि कोई ये तर्क ला सकता था कि धर्म ग्रंथ या परंपरा के तहत इसकी मान्यता है. ऐसी परंपरा को मानने की राज्य की कोई बाध्यता नहीं है, जो संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो.
(डिस्क्लेमर: लेखक सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में वरिष्ठ सलाहकार हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )