प्रधानमंत्री का अचानक पाकिस्तान पंहुच जाना क्या था? इसे कोई भी बता नहीं पा रहा है। ऐन वक्त पर औचक-भौंचक दौरे का पता लगने के बाद खुद भाजपा के प्रवक्ताओं को भी तैयार होने में ढाई घंटे से ज्यादा लग गए। वो भी तब जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भाजपा प्रवक्ताओं की बाकायदा क्लास लगाकर उन्हें पढ़ाया कि क्या बोलना है। इस बीच टीवी पर भी अफरातफरी मची रही। टीवी चैनल तो इतने बेखबर थे कि उन्हें पाकिस्तान के पत्रकारों से पूछ-पूछकर अपने दर्शकों को बताना पड़ा कि हमारे प्रधानमंत्री इस समय कहां हैं? कब लाहौर पहुंचेगे? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बातचीत का उनका क्या कार्यक्रम है? कुल मिलाकर भारतीय टीवी चैनलों और उनके बहसिया कार्यक्रमों में बैठने वाले विशेषज्ञों को इतना भौंचक इससे पहले कभी नहीं देखा गया था।
पाकिस्तान के मीडिया में अचानक जान पड़ी
ऐसे मौकों पर अक्सर पाकिस्तानी टीवी चैनलों को दबा दबा से देखा जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री के इस औचक-भौंचक दौरे से पाकिस्तान के मीडिया में अचानक जान सी आ गई। हमारे अपने टीवी पत्रकारों को हर क्षण उनसे ही पूछना पड़ रहा था कि वहां आगे क्या होने वाला है। जबकि ऐसा हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भारतीय पत्रकारों का दल न हो, लेकिन इस सनसनीखेज कार्यक्रम की उन्हें भनक तक नहीं लगी। सिर्फ शुरू या बीच में ही नहीं बल्कि आखिर तक। किसी को कुछ नहीं पता था कि इस समय पाकिस्तान में क्या हो रहा है और आगे क्या होने वाला है।
टूट टाट गया नयाचार
दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच चाहे औपचारिक बात होनी हो या अनौवचारिक, उसके कायदे यानी प्रोटोकॉल यानी नयाचार तय होते हैं। इस दौरे से यह नयाचार गायब हो गया। बारह घंटे हो गए, लेकिन अब तक रहस्य बना हुआ है कि हमारे प्रधानमंत्री का पाकिस्तान में रुकने का फैसला कब हुआ था? किस मकसद से हुआ? और इसके राजदार कौन कौन थे? हद तो तब हो गई जब अफगानिस्तान से लाहौर के बीच के घंटे भर के सफर के बीच ही भारत में अफरातफरी और अटकलों का ऐसा दौर चल पड़ा कि सुनने वालों का सिर चकरा गया। किसी ने कहा कि यह चकराने वाला कार्यक्रम देश के भीतर की परेशानियों की बातों से ध्यान हटाने के लिए था। किसी ने कहा कि ये सब दुनिया की बड़ी ताकतों के दबाव का नतीजा था। कोई कह रहा था कि पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने का यह अच्छा तरीका साबित होगा।
नए नयाचार का नाम देने की कोशिश
भाजपा प्रवक्ताओं ने इस औचक दौरे को अपारंपरिक नयाचार यानी अनकन्वेंशनल प्रोटोकॉल का नाम देने की कोशिश की। लेकिन इस अजीब और नई चीज का यह नाम जंचता नहीं है। जरा हटके वाला जुमला हम हर कहीं नहीं लगा सकते। और अगर भौंचक दौरों को आगे भी चलाना हो, तो कई नए रट्टे पैदा हो सकते हैं। मसलन राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा इतना बड़ा मसला है कि बिना तारीख और समय तय किए या गुपचुप तरीके से राष्ट्राध्यक्षों के दौरे तय करने का चलन नई जटिलताएं पैदा कर देगा। दो देशों के बीच संबंधों खासतौर पर पाकिस्तान के मामले में भारत की विदेश नीति कोई आकस्मिक या तात्कालिक रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। पिछली घटनाएं, दुर्घटनाएं, संधियां, समझौते देखने ही पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं से भी हम सब बंधे हुए हैं। लिहाजा तदर्थ और औचक हलचल किसी बड़े पचड़े में डाल सकती है।
नए प्रयोग की शुरुआत पाकिस्तान से क्यों?
पाकिस्तान से अपने रिश्तों की मुश्किल से पूरी दुनिया वाकिफ है। किसी भी तरह की बातचीत से पहले आतंकवाद और कश्मीर का पच्चर फंस जाता है। देश के भीतर सांप्रदायिक रंग की बातों और आंतरिक राजनीति में पाकिस्तान की बातों के बिना हम अपना राजनीतिक गुजारा नहीं कर पा रहे हैं। जिस तरह किसी कथा या उपन्यास में खलनायक जरूरी है उसी तरह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक खलनायक बनाए रखने का चलन है। क्या यह सच नहीं है कि दोनों देशों के राजनीतिक दलों ने अपनी सियासी जरूरतों के लिहाज से अपनी अपनी जनता के मन में अपने पड़ोसी के प्रति उसी तरह के खलनायक की छवि बनाए रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कमोबेश दोनों तरफ से। लिहाजा अब भाजपा के सत्ता में आने के बाद अचानक पाकिस्तान के प्रति अपने रुझान को बदलने का आधार क्या बताया जा सकता है। और फिर भाजपा के सहयोगी दल और भाजपा के कार्यकर्ता इस मामले में इतनी जल्दी पुराने रुख को छोड़कर उस पड़ोसी से अचानक अपनापा दिखाने के लिए आसानी से तैयार कैसे हो पाएंगे? और किस बिना पर? इसीलिए पिछले एक दशक से सत्ता में रही यूपीए के नेता शुक्रवार को नरेंद्र मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे को लेकर सवाल उठाते रहे। वे पूछते रहे कि पिछले दो साल में पाकिस्तान की तरफ से ऐसा कौन सा संकेत मिला है जिसके आधार पर कहा जा सके कि पाकिस्तान से बातचीत लायक माहौल बन गया है।
फर्ज कीजिए मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता
यूपीए सरकार गए अभी दो साल भी नहीं हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ और उस बहाने पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाए रखने के लिए तब विपक्ष में रही भाजपा के रुख को इतनी जल्दी भुलाया नहीं जा सकता। सोचकर देखें कि अगर मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से बातचीत का ऐसा रुख दिखाया होता, तो भाजपा का क्या रवैया होता? इस काल्पनिक स्थिति को यह कहते हुए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि तब स्थितियां भिन्न थीं। क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से हाल फिलहाल कोई भी संकेत नहीं आया है कि हालात बदले हैं। यानी आज प्रधानमंत्री का औचक दौरा माहौल बदलने के मकसद से साबित किया जाए, तो आज से दो साल पहले के माहौल में भी साबित हो सकता था। लेकिन तब विपक्ष में रही भाजपा का रुख पाकिस्तान के प्रति शुक्रवार जैसा उदार नहीं था। यानी वह मनमोहन के दौरे के खिलाफ आसमान सिर पर उठा लेती।
औचक दौरे से हासिल क्या?
पच्चीस दिसंबर को चार बजे से रात दस बजे तक यानी लगातर छह घंटे भारतीय टीवी चैनलों पर देश के दिग्गज विश्लेषक, भाजपा और कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेता इस दौरे के नफे-नुकसान का हिसाब लगाते रहे। बिना एजेंडा और बिना एलान के हुए ऐसे दौरे के नफे-नुकसान का आंकलन आसान नहीं था। जाहिर है पुरानी राजनीतिक गिनती और पहाड़े सुनाए जाने के अलावा कुछ नहीं हुआ। हां, इतना जरूर है कि संसद का सत्र खत्म होने के बाद देश में बढ़ते जेटली विवाद की बजाए अब दो चार दिन प्रधानमंत्री के औचक दौरे पर ही वाद-विवाद चलता रहेगा। तब तक जेटली मुद्दा सुस्त पड़ जाएगा। इसके अलावा थोड़ा-बहुत फायदा यह दिखता है कि अगले महीने जब औपचारिक तौर पर पाकिस्तान से बातचीत का कार्यक्रम बनेगा, तो वैसे अंदेशे नहीं दिखाई देंगे जैसे अब तक हर बार दिखाई देते रहे हैं, क्योंकि किसी साक्षात्कार के पहले जिस तरह रेपो बनाने की जरूरत होती है वह रेपो इस औचक दौरे से जरूर बन गई है। इससे ज्यादा कोई नफा देखना मुगालता होगा। मगर नुकसान के अंदेशों को देखें तो हर तरफ से आफत ही दिखती है। खासतौर पर देश की अदरूनी राजनीति में और उससे भी ज्यादा सत्तारूढ़ एनडीए के घटक दलों और खुद भाजपा के भीतर।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।
This Article is From Dec 26, 2015
पीएम मोदी के औचक-भौचक दौरे के नफे-नुकसान का हिसाब
Sudhir Jain
- ब्लॉग,
-
Updated:दिसंबर 26, 2015 21:56 pm IST
-
Published On दिसंबर 26, 2015 11:15 am IST
-
Last Updated On दिसंबर 26, 2015 21:56 pm IST
-
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पीएम मोदी की पाकिस्तान यात्रा, नवाज शरीफ, Prime Minister Narendra Modi's Pakistan Visit, Nawaz Sharif, पाकिस्तान यात्रा, Pakistan Visit, PmModiInPakistan