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संविधान, बराबरी और हाशिये की आवाज को मुख्यधारा तक लाने वाली एक सशक्त कहानी 'जय भीम'

हिमांशु जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 20, 2026 22:57 pm IST
    • Published On फ़रवरी 20, 2026 22:31 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 20, 2026 22:57 pm IST
संविधान, बराबरी और हाशिये की आवाज को मुख्यधारा तक लाने वाली एक सशक्त कहानी 'जय भीम'

आज Social Justice Day है. बराबरी, अधिकार और न्याय की बात होते ही सिनेमा की कुछ फिल्में खुद एक मजबूत उदाहरण बनकर सामने आती हैं. 2021 में रिलीज हुई ‘जय भीम' ऐसी ही बेहतरीन फिल्म है, यह सिर्फ एक कोर्ट रूम ड्रामा नहीं, बल्कि सामाजिक सच्चाइयों पर सीधा सवाल उठाने वाली कहानी बन जाती है. फिल्म एक आदिवासी परिवार के संघर्ष के जरिए उस व्यवस्था को सामने लाती है, जहां कानून सबके लिए समान होने के बावजूद न्याय तक पहुंच आसान नहीं दिखती. पुलिसिया अत्याचार, सामाजिक भेदभाव और कानूनी लड़ाई को निर्देशक ने बेहद सधे हुए अंदाज में दिखाया है.

पुलिसिया बर्बरता और सच्ची घटनाओं की झलक

पुलिस की कार्य प्रणाली, न्यायपालिका पर आम नागरिक का भरोसा, आदिवासियों के अधिकारों और आंदोलनों की शक्ति के इर्द गिर्द सिमटी यह फिल्म दिल झकझोरने वाले दृश्यों से भरी पड़ी है. ‘गलती क्या है इनकी. यही कि ये पैदा हुए' 1994-95 में हुई सच्ची घटनाओं पर बनी यह फिल्म जाति पूछ एक जेल से छूटने पर दूसरी जेल में भेजे जा रहे कैदियों के लिए इन शब्दों के साथ शुरू होती है. भारतीय फिल्मों के इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चा पाने वाली, यह फिल्म शुरुआत से ही कसी हुई लगती है.

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छुआछूत पर प्रहार और जेल की सिहरन

राजाकन्नू बने के. मणिकंदन को बाइक में पीछे बैठा उसका हाथ झटका दूरी बनाने वाला दृश्य और ‘दीया जलाने के समय दहलीज पर खड़ी क्यों हो रही है' जैसे संवादों के साथ फिल्म छुआछूत पर लगातार प्रहार करती रहती है. आगे चलकर फिल्म में राजाकन्नू और साथी की आंखों में मिर्च पाउडर डालने और जेल में महिला के कपड़े उतारने जैसे दृश्य दर्शकों को पुलिस बर्बरता की कहानी दिखाते हैं, ये किसी भी दर्शक के जेहन में सिहरन दौड़ा दें.

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कोर्टरूम ड्रामा और दमदार अभिनय

वकील चंद्रू बने सूर्या की एक मोर्चे में मुट्ठी बांधे फिल्म में एंट्री होती है और वहीं से कोर्टरूम में उनके बेहतरीन अभिनय की शुरुआत हो जाती है. बिना किसी सबूत के लड़ने वाले केस के लिए सबूत जुटाते सूर्या के साथ फिल्म रोमांच से भरपूर है और केस की हर सुनवाई जबरदस्त लगती है. प्रकाश राज एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं. सूर्या और प्रकाश राज के आपसी संवाद गजब के हैं और पुलिस की समाज में भूमिका पर भी स्पष्टता देते हैं. संगिनी बनी लिजोमोल जोस साधारण तो दिखती हैं, पर सिस्टम से लड़ती एक गर्भवती के रूप में उन्होंने अपने अभिनय से किरदार को दर्शकों की यादों में अमर कर दिया. संगिनी को न्याय दिलाने में सहायता करने वाली शिक्षिका बनी राजिशा विजयन भी अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब हुई हैं, जबकि सब इंस्पेक्टर बने तामीज एक मजबूत नकारात्मक किरदार के रूप में याद किए जाएंगे.

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छायांकन, संवाद, संगीत और अम्बेडकरवादी सोच

तमिलनाडु के हिल स्टेशन कोडईकनाल की खूबसूरत वादियों में फिल्माई गई इस फिल्म का छायांकन दर्शकों को उस परिवेश से भावनात्मक रूप से जोड़ देता है. खेतों में चूहे पकड़ने का दृश्य भी फिल्म के शानदार विजुअल ट्रीटमेंट का उदाहरण बन जाता है. ‘पढ़िए सब कुछ मिल जाएगा' जैसे गहरे संवादों से फिल्म भरी पड़ी है और इसके कई संवाद लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं. फिल्म का संगीत कभी प्रकृति के साथ मिला हुआ लगता है तो कभी महत्वपूर्ण दृश्यों के रोमांच को दोगुना कर देता है. फिल्म में बाबा अम्बेडकर की सीखें भी समांतर चलती रहती हैं. सूर्या की पहली झलक के दौरान न्याय पर सभी के समान अधिकार की बात हो या अंतिम दृश्य में सूर्या के साथ बच्ची द्वारा अखबार पढ़ना, यह शिक्षा की सब तक पहुंच और जागरूकता का मजबूत संकेत बन जाता है. संगिनी का “मुझे लिखना नहीं आता साहब” कहना आज भी बैंकों में अंगूठा लगाने वाले बहुत से चेहरों की याद दिला देता है.

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