इस साल जनवरी में एक अमेरिकी कवयित्री रिनी गुड को गोली मार दी गई. बीते हफ़्ते उसका स्मारक किसी ने जला दिया. अमेरिका के बहुत सारे लोग अपनी एक नागरिक के साथ ऐसा सलूक देखकर हैरान हैं. ये मामला मिनीसोटा के मिनीपोलिस इलाक़े का है. रिनी गुड अपने घर से निकली थी, शायद अपने बच्चे को उसने स्कूल छोड़ा था. अपनी कार की स्टीयरिंग व्हील पर थी. तभी उसे अमेरिका की आईसीई- यानी इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स इन्फ़ोर्समेंट के लोगों ने रोका. ये सात जनवरी का वाकया है- सुबह 9 बज कर 35 मिनट का. इसका वीडियो सामने आ चुका है.
इससे पता चलता है कि रिनी गुड की हौंडा पायलट कार के सामने जोनाथन रॉस नाम के एक अफसर ने अपनी एसयूवी अड़ाई. वह गाड़ी से उतर कर आगे बढ़ा. उसने अपने फोन से वीडियो बनाना शुरू किया. वह गुड की कार के चारों तरफ़ घूमता हुआ उसके पिछले हिस्से में लगी नंबर प्लेट रिकॉर्ड करने लगता है. उसने अपना चेहरा ढंक रखा है.
रिनी गुड ने कहा- ‘फाइन ड्यूड, आई एम नॉट मैड ऐट यू'- ठीक है यार, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूं.
इस बीच गुड की पार्टनर बेका गुड ने भी अपने फोन से रिकॉर्डिंग शुरू कर दी है. वह कहती है- अपना चेहरा दिखाओ. ठीक है. हम हर सुबह नंबर प्लेट नहीं बदलते, जब तुम बाद में बात करने आओगे तो यही नंबर प्लेट मिलेगी.

इसके बाद कुछ गाड़ियां गुज़रती हैं. एक और गाड़ी से कुछ आईसीई एजेंट निकलते हैं. इसके बाद चश्मदीदों के मुताबिक दो तरह के निर्देश सुनाई पड़ते हैं. एक कहता है, गाड़ी आगे बढ़ाओ, दूसरा कहता है- कार से उतरो. इस बीच जोनाथन रॉस उसकी खिड़की के पास पहुंच चुका है. रिनी गुड कार पीछे करती है, फिर रॉस से दूर जाने की कोशिश में कार दाहिनी ओर आगे बढ़ाती है. इसी दौरान रॉस गोलियां चलाता है- रिनी गुड की मौत हो जाती है. वीडियो में अंत में एक पुरुष स्वर भी सुनाई पड़ता है- ‘फ...बिच'.
लेकिन यह सबकुछ हुआ क्यों? इसके पीछे ट्रंप प्रशासन के दौर में अमेरिका के बदलते माहौल को पहचाना जा सकता है. वहां अवैध आप्रवासियों- यानी घुसपैठियों को- निकालने की मुहिम चल रही है. इसका नाम ऑपरेशन मेट्रो सर्ज है. जिस दिन रिनी गुड को गोली मारी गई, उस दिन बताया जा रहा है कि 2000 से ज़्यादा एजेंट मिनीपोलिस और सेंट पॉल में उतरे हुए थे. इस मुहिम में दूसरी एजेंसियां भी शामिल थीं.

बताया जा रहा है कि बीते छह महीने में पांच राज्यों में इस तरह की गोलीबारी की यह नौवीं घटना है. इसमें इसके पहले भी कम से कम चार लोग मारे जा चुके हैं. ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें असीमित अधिकार दे दिए गए हैं. उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी हो रहे हैं. आईसीई के लोगों का कहना है कि रिनी गुड भी ऐसे प्रदर्शनों में शामिल थी. हालांकि उसके परिवार के लोग ऐसे प्रदर्शनों में उसकी शिरकत से इनकार करते हैं. इस मुहिम के तहत भारत भी कई लोग हथकड़ियों में जकड़ कर भेजे गए हैं.
इस हत्या की पूरे अमेरिका में तीखी प्रतिक्रिया हुई. लेकिन फेडरल एजेंसियों ने गोली चलाए जाने को सही ठहराया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा कि यह आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई थी- यह महिला पुलिसवाले को कुचलने का इरादा रखती थी. ट्रंप के मुताबिक पुलिसवाला अस्पताल पहुंच गया. हालांकि वीडियो बताते हैं कि यह भी ट्रंप का एक और झूठ भर है. जाहिर है, अमेरिका में घुसपैठ रोकने की अपनी ज़िद में ट्रंप नाजायज़ कार्रवाइयों को भी सही ठहरा रहे हैं.
डरावनी बात यह है कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रिनी गुड को ‘विक्टिम ऑफ लेफ्ट आइडियोलॉजी- वाम विचारधारा की शिकार' बताया है. रिनी गुड आप्रवासी नहीं थी. वह कोलोरैडो में पैदा हुई थीं. कंसास में रही. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में वह कनाडा चली गई थी, लेकिन फिर लौटकर उसने मिनीपोलिस को अपना घर बनाया था.

शायद उसे भरोसा होगा कि खुद को दुनिया का महानतम लोकतंत्र मानने वाले अमेरिका में वह सुरक्षित रहेगी. वह 37 साल की थी. तीन बच्चों की मां थी. दो बच्चे पहले पति से थे, तीसरा छह साल का बच्चा दूसरे पति से. दूसरे पति की मौत के बाद वह बेका गुड नाम की लड़की के साथ दंपती की तरह रह रह थी. नए अमेरिका में उसका लेस्बियन होना भी शायद आईसीई एजेंट्स की निगाह में एक गुनाह हो.
रिनी गुड को 2020 में कविता के लिए एक पुरस्कार भी मिला था. उसके देहांत के बाद अमेरिका के कई शहरों में प्रदर्शन हुए. उसकी स्मृति में संगीत के कई एलबम भी बनाए गए. आयरिश रॉक बैंड यू-2 ने पांच गीतों और एक कविता का एक अलबम भी निकाल दिया जिसमें रिनी गुड के अलावा कुछ और लोगों की स्मृति सामिल है.
लेकिन इस पूरे प्रसंग से हम क्या सीख सकते हैं? भारत में भी घुसपैठियों को बाहर करने का सवाल इन दिनों एक अहम राजनीतिक सवाल बना हुआ है. दिल्ली, मुंबई से लेकर कोलकाता तक इसको लेकर राजनीति बहुत तीखी है. उत्तर प्रदेश में ऑपरेशन टॉर्च चल रहा है. इसके अलावा एसआईआर को लेकर बहस जारी है. अमेरिका का प्रसंग बताता है कि लोगों की नागरिकता बहुत संवेदनशील मुद्दा है. कई बार वक़्त भी बहुत सारी नागरिकताएं तय कर देता है. और कई बार राजनीति बहुत सारी नागरिकताओं को बेदखल-विस्थापित करने में लगी रहती है. कोई रिनी गुड ऐसी ही प्रक्रिया की शिकार हो जाती है. ऐसी प्रक्रिया से देश मज़बूत नहीं होते, कमज़ोर पड़ते हैं. अपनी एक कवयित्री की मौत से अमेरिका मज़बूत नहीं हुआ, कुछ कमजोर ही दिख रहा है.
प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...
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