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This Article is From Mar 11, 2021

निजीकरण का विरोध हमेशा फ़ैसले के बाद क्यों होता है, अपनी-अपनी कंपनी का क्यों होता है?

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 11, 2021 16:55 pm IST
    • Published On मार्च 11, 2021 16:38 pm IST
    • Last Updated On मार्च 11, 2021 16:55 pm IST

सरकार बैंक से लेकर कंपनी तक बेचने जा रही है. इसके लिए तरह-तरह के वाक्य गढ़े गए हैं जिन्हें सुनकर लगेगा कि मंत्र फूंकने वाली है. विरोध-प्रदर्शन से जब कृषि क़ानून वापस नहीं हुए तो सरकारी कंपनियों में काम करने वाले लोगों को समझना चाहिए कि उनके आंदोलन पर मीडिया और राजनीति हंसेगी. ठठाकर हंसेगी. जब दूसरी कंपनियों को ख़त्म किया जा रहा था तब इस वर्ग के व्हाट्स एप ग्रुप में कुछ और चल रहा था. वही कि नेहरू मुसलमान हैं. मुसलमानों से नफ़रत की राजनीति ने दिमाग़ को सुन्न कर दिया है. हालत यह हो गई है कि हर दूसरा नेता धार्मिक प्रतीक का सहारा ले रहा है. इससे समाज को क्या लाभ हुआ, धार्मिक प्रतीकों की राजनीति की चपेट में आने वाले लोग ही बता सकते हैं. इससे धर्म और उसकी पहचान को क्या लाभ हुआ इसका भी मूल्यांकन कर सकते हैं. 

विशाखापट्टनम स्टील प्लांट के निजीकरण के ख़िलाफ़ 35 दिनों से धरना प्रदर्शन चल रहा है. इसे कोई नोटिस तक नहीं ले रहा है. इस हालत के लिए कुछ हद तक वे लोग भी ज़िम्मेदार हैं. आप सभी भी. आपने जिस मीडिया को बढ़ावा दिया, अब वह राक्षस बन गया है. मीडिया के ज़रिए किसी भी आंदोलन को करने और सरकार पर दबाव बनाने की आपकी चाह, प्रदर्शन करने वालों को पागल कर देगी. इसलिए मेरी राय में उन्हें किसी मीडिया से संपर्क नहीं करना चाहिए. मुझसे भी नहीं. आप इस आंदोलन के साथ साथ प्रायश्चित भी करें. क्यों आंदोलन कर रहे हैं इस पर गहराई से सोचें. क्योंकि दूसरे दल के लोग भी निजीकरण करते हैं. ठीक है मोदीजी ने थोक भाव में कर दिए. लेकिन निजीकरण को लेकर समग्र सोच क्या है? क्या आपकी सोच केवल अपनी कंपनी और अपनी नौकरी बचाने तक सीमित है तो उसमें भी कोई दिक़्क़त नहीं है. आप तुरंत 'नेहरू मुसलमान हैं' वाले मैसेज को फारवर्ड करने में लग जाएं. 

बौद्धिक पतन का भी अपना सुख है. न दूसरे के दुख से दुख होता है और न अपने दुख से दुख होता है. इस वक़्त आप सभी बौद्धिक पतन की प्रक्रिया को तेज़ कर दें. जब चुनाव आए तो धर्म की बात करें. नेता के लिए भी आसान होगा. दो चार मंत्र, दो चार चौपाई सुनाकर निकल जाएगा. आपको भी तकलीफ़ नहीं होगी कि आपने चुनाव में राजनीतिक कारणों से भाग लिया था. एक दिन होगा यह कि आप धार्मिक आयोजनों में राजनीति करेंगे, मारपीट करेंगे और राजनीतिक आयोजनों में धार्मिक बात करेंगे. इसी तरह एक नागरिक के रूप में आप किसी दल के लिए प्रभावविहीन हो जाएंगे. जिस दल को इस खेल में बढ़त मिली है ज़ाहिर है फ़ायदा उसी को होगा.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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