टीका अभियान सुस्त, विज्ञापन से नहीं होता जीवन यापन सरकार

दूसरी लहर के बाद सरकार अब इस तरह के बयान नहीं दे रही है कि भारत ने कोरोना को हरा दिया, इस बार चेतावनियां खूब जारी हो रही हैं

टीका अभियान सुस्त, विज्ञापन से नहीं होता जीवन यापन सरकार

मौसम विभाग की आलोचना हो रही है कि उसकी बताई कई तारीखों पर दिल्ली में मानसून नहीं आया. दिल्ली के लोगों ने पेट्रोल के दाम कम होने का इंतज़ार छोड़ मानसून का शुरू कर दिया है. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के विद्वानों के बीच यह दलील चल रही है कि दिल्ली में पेट्रोल 101 रुपया भी हो रहा है तो विकास भी तो हो रहा है. तो क्या शहडोल और गंगानगर में भी दिल्ली से ज़्यादा विकास हो गया है? मध्य प्रदेश का शहडोल जिला देश के अति पिछड़े ज़िलों में आता है. यहां के लोग 111 रुपया 71 पैसे लीटर पेट्रोल ख़रीद रहे हैं. गंगानगर के लोग 112 रुपया 49 पैसा लीटर पेट्रोल ख़रीद रहे हैं. यह अहसास होना चाहिए कि पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम लोगों पर कितना बोझ बढ़ा है. ऐसा है तो सरकार विज्ञापन छाप दे कि 110 रुपया लीटर पेट्रोल देश के लिए ज़रूरी है. जैसे टीकाकरण के विज्ञापन छापे जा रही है. 

एक अखबार के पहले पन्ने पर उत्तराखंड सरकार का विज्ञापन छपा है कि टीकाकरण अभियान तेज़ी से चल रहा है. उत्तराखंड सरकार कोरोना से सावधान है. एक दूसरे अखबार के भीतर उत्तराखंड की ही ख़बर छपी है कि पहाड़ के सेंटरों में तीन दिन से टीका नहीं है. नैनीताल में टीका ख़त्म. अखबार लिखता है कि टीका एक भी नहीं, धन्यवाद पोस्टर हर तरफ. फिर इस तरह के विज्ञापन का क्या मतलब रह जाता है. विज्ञापन का सच अलग है, खबरों का सच अलग है. आगे से टीका न मिले तो टीके की जगह विज्ञापन लगवा लें.

इंडियन एक्सप्रेस में गृहमंत्री अमित शाह के अहमदाबाद दौरे की ख़बर छपी है. अमित शाह के बयान से इस खबर की हेडलाइन बनाई गई है कि कोविड से लड़ने का यही तरीका है कि नागरिक टीका लगवाएं. इसे देखकर लगेगा कि टीका है मगर नागरिक टीका नहीं लगवा रहे हैं. इस खबर के अनुसार अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे गांव-गांव जाकर सुनिश्चित कराएं कि एक भी आदमी बिना टीके के न हो. गुजरात में मुख्यमंत्री रुपाणी के नेतृत्व में विस्तृत टीका अभियान चल रहा है. गुजरात की तारीफ के लिए एक नया एंगल निकाला गया है कि टीका लगाने वाले दस लाख लोगों में गुजरात नंबर वन पर है.

छह करोड़ से अधिक आबादी है गुजरात की. अभी तक कुल 2.78  करोड़ डोज़ लगे हैं. कोविन की साइट से पता चलता है कि गुजरात में केवल  63 लाख 70 हज़ार लोगों को ही दोनों डोज़ लगी हैं. सरकारें जानबूझकर सिंगल डोज़ की संख्या बताती हैं क्योंकि पौने तीन करोड़ की संख्या बड़ी लगती है. सात जुलाई को गुजरात में 6,452 टीके लगे थे. आठ जुलाई को 7081 टीके और नौ जुलाई को 5996 टीके ही लगे.

21 जून के बाद वीके पॉल ने कहा था कि हम टेस्ट कर रहे थे कि हमारी क्षमता कितनी है. हम एक दिन में कितने टीके लगा सकते हैं. टेस्टिंग हुए 20 दिन हो गए हैं लेकिन क्षमता के अनुसार टीके नहीं लग रहे हैं. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया है कि 11 जून से 20 जून तक हर दिन 34 लाख डोज़ लगी हैं. 21 जून से 30 जून के बीच हर दिन 56 लाख डोज़ लगी हैं.1 जुलाई से 10 जुलाई के बीच हर दिन 40 लाख डोज़ लगी हैं. 31 दिसंबर तक अगर 18 वर्ष से ऊपर के सभी को टीका लगाना है तो हर दिन 86.5 लाख से अधिक टीके लगाने होंगे.

दूसरी लहर के बाद एक बदलाव आया है. सरकार अब इस तरह के बयान नहीं दे रही है कि भारत ने कोरोना को हरा दिया है और पूरी दुनिया हैरानी से देख रही है. ये बयान प्रधानमंत्री मोदी का ही था. इस बार चेतावनियां खूब जारी हो रही हैं. लोग भी भीड़ की तस्वीरों को साझा कर सरकार और समाज दोनों को आगाह कर रहे हैं. यह समय याद रखने का भी है कि मार्च और अप्रैल के महीने में क्या हुआ था. 
टीकाकरण की रफ्तार धीमी है इसलिए ख़तरा वैसे ही बना हुआ है. दिल्ली के बाजारों में उमड़ रही भीड़ की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है. लोगों की लापरवाही और सरकार की सुस्ती को उजागर करने के लिए. यह एक अच्छा बदलाव आया है. दिल्ली में 23 अप्रैल से लेकर 7 जुलाई के बीच 3 लाख लोगों पर जुर्माना लगाकर 51 करोड़ से अधिक की राशि वसूली गई है. तब भी बाज़ारों में कोविड के लिए तय उचित व्यवहार दिखाई नहीं दे रहा है. दिल्ली सरकार ने भी जून और जुलाई में अभी तक कई बार बाज़ारों को कुछ दिनों के लिए बंद किया है. भीड़ के कारण दिल्ली सरकार ने रविवार को सदर बाजार के बाराटूटी चौक से लेकर कुतुब रोड के मार्केट इलाके को 3 दिन के लिए बंद कर दिया. सदर बाज़ार के रुई मंडी मार्केट को भी भीड़ के कारण बंद किया जा चुका है. बंद होने वाले बाज़ारों में लक्ष्मी नगर बाज़ार भी शामिल है. विकास मार्ग से लवली पब्लिक स्कूल तक फैले लक्ष्मी नगर मेन बाज़ार के अलावा आस-पास के अन्य बाज़ार जैसे मंगल बाज़ार, विजय चौक, सुभाष चौक, जगतराम पार्क, गुरु रामदास नगर को भी बंद किया गया. यही नहीं लाजपत नगर सेंट्रल मार्केट, गफ्फार मार्केट, नाईवाला बाज़ार, मदनगीर सेंट्रल मार्केट, नांगलोई का पंजाबी बस्ती बाज़ार, जनता मार्केट को बंद कर दिया गया.

अभी भी भारत में 58 ज़िले ऐसे हैं जहां संक्रमण के फैलने की दर 10 प्रतिशत से अधिक है. इनमें से केरल और मणिपुर के 8-8 ज़िले हैं और अरुणाचल प्रदेश के 5 ज़िले हैं. राजस्थान में दस ज़िले हैं. ज़ाहिर है ख़तरा टला नहीं है. जब एक व्यक्ति से कई लोगों को संक्रमण होने लगता है तो उस दर को R-value कहते हैं. भारत में फिर से R-value बढ़ने लगी है.

अभी भी आयोजनों के मामलों में सरकारों के फैसलों में एकरूपता नज़र नहीं आ रही है. कहीं पर धार्मिक आयोजनों को इजाज़त नहीं दी जा रही है तो कहीं पर धार्मिक आयोजन हो इसके लिए सरकार मुकदमा लड़ रही है. कहीं पर सीमित रूप में आयोजन को अनुमति है लेकिन उसमें न तो सामाजिक दूरी है और न सतर्कता.

अहमदाबाद में रथ यात्रा में मुख्यमंत्री भी शामिल हुए हैं. इस बार पहले जैसी भीड़ नहीं है लेकिन एक साथ एक जगह होने के कारण जुटान बड़ा हो गया है. बिना मास्क के भी लोग नज़र आ रहे हैं. सामाजिक दूरी नहीं है. गुजरात के गृहमंत्री का बयान छपा है कि केवल बीस खलासी होंगे जो रथ को खींचेंगे और उनका RTPCR टेस्ट होना अनिवार्य है. क्या यहां बीस ही लोग हैं? कम लोग होने के बाद भी यहां भीड़ की स्थिति बन गई है. सामाजिक दूरी नहीं है. कई लोग बिना मास्क के भी हैं. इसी अहमदाबाद में अप्रैल और मई के महीने में क्या हुआ था, याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है. ओडिशा के पुरी में भी यात्रा के दौरान केवल पंडा हैं और पुलिस हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आम श्रद्धालुओं को रथ यात्रा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी है. यहां पर जो भी मौजूद है उनका RTPCR टेस्ट हुआ है तब भी सामाजिक दूरी न तो संभव है और न है. फिर भी रथ यात्रा के लिए तो और भी बेहतर व्यवस्था बनाई ही जा सकती थी जिससे यात्रा भी हो जाती और कोरोना के नियम भी नहीं टूटते.

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने चार धाम की यात्रा को रद्द कर दिया था लेकिन राज्य सरकार इस फैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई. सरकार चार धाम यात्रा और कांवड़ यात्रा पर एक झटके में बैन लगाने से बच रही है. तब भी जब अप्रैल महीने में हुए हरिद्वार कुंभ को लेकर गंभीर सवाल उठे थे. इस सवाल का पुख्ता जवाब किसी के पास नहीं है कि किन वैज्ञानिक कारणों को देखते हुए कुंभ के आयोजन की अनुमति दी गई, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए. यही नहीं कुंभ में जिस कंपनी को RTPCR करने का ठेका दिया गया उसने लोगों को निगेटिव रिपोर्ट फर्ज़ी दे दी. टाइम्स आफ इंडिया और वायर की रिपोर्ट है कि घोटाला करने वाला बीजेपी नेताओं का करीबी था. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रचारक कई लोग इन दिनों कुंभ की तस्वीरों को ट्वीट कर रहे हैं कि पश्चिमी मीडिया ने कुंभ को बदनाम किया लेकिन अपने यहां हो रहे यूरो कप को लेकर सवाल नहीं उठाए. दोनों ही बातें गलत हैं. पश्चिमी मीडिया जब कुंभ की तस्वीरें लगा रहा था तब क्या हालात थे याद कीजिए. क्या भारत में लोग बिना आक्सीजन के नहीं मर रहे थे, क्या भारत में लोग बिना वेंटिलेटर और अस्पताल के नहीं मर रहे थे, क्या श्मशानों में भीड़ नहीं थी और सरकार मरने वालों की संख्या नहीं छुपा रही थी? इन सब ख़बरों के बीच अगर धार्मिक आयोजन और चुनावी रैली होगी तो पश्चिमी मीडिया क्या करता, ताली बजाता?

हमें याद रखना चाहिए कि 7 मार्च को उस समय के स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा था कि हम महामारी की समाप्ति के कगार पर हैं. कुछ ही दिनों बाद महामारी का वीभत्स कहर टूट पड़ा. जब तक हम एक नज़र और नज़रिये से काम नहीं करेंगे किसी चेतावनी का लाभ नहीं. प्रशासन भीड़ के कारण बाज़ार बंद कर देता है लेकिन धर्म के नाम पर हज़ारों लोग जमा होते हैं तो वह रोक नहीं पाता है.

हर की पैड़ी पर शनिवार के दिन पर्यटकों का तांता लग गया. यूरो कप की छोड़िए, ऐसे आयोजनों से नुकसान भारत को होगा या फिनलैंड को. बेशक उत्तराखंड सरकार ने RTPCR की जांच कर कई लोगों को वापस लौटा दिया लेकिन कौन बता सकता है कि यहां स्नान कर रहे लोगों ने टीके की दोनों डोज़ ले ली हैं. सरकार अभी तक ऐसा कोई तरीका नहीं बना पाई है कि इस तरह की भीड़ भी न हो और पर्यटन भी चलता रहे. अगर दिल्ली के बाज़ार में भीड़ ख़तरनाक है तो ऐसे धार्मिक आयोजनों में भी भीड़ ख़तरनाक है. धार्मिक आयोजन के नाम पर आस्था का पक्ष लेने की मजबूरी हर बार प्रशासन को दुविधा में डाल रही है. कैरवैन पत्रिका की रिपोर्ट छपी थी कि कुंभ का विरोध करने के कारण त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया. उनके बाद आए तीरथ सिंह रावत ने कहा था कि मां गंगा के आशीर्वाद से कोरोना नहीं होगा. नए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान इंडियन एक्सप्रेस में छपा है कि कांवड़ यात्रा श्रद्धा और आस्था का मामला है. भगवान नहीं चाहेंगे कि कोई मरे. तीन तीन मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी यह नज़रिया नहीं बदला है. नए मुख्यमंत्री कांवड़ यात्रा चाहते हैं जबकि पुराने मुख्यमंत्री ने इस पर रोक लगा दी थी.

11 अप्रैल के दैनिक जागरण में एक विज्ञापन छपा है जिसकी याद ज़रूरी है. इस विज्ञापन में तब के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर, स्नान के लिए श्रद्धालुओं के आने की विनती कर रहे हैं. बाक़ायदा शाही स्नान की तारीखें प्रकाशित की गई हैं. विज्ञापन के सबसे ऊपर छपा है सुंदर स्वच्छ सुरक्षित महाकुंभ हरिद्वार. कुम्भ नगरी हरिद्वार में आपका स्वागत है. विज्ञापन के सबसे निचले हिस्से में एक पतली सी पट्टी में छोटे अक्षरों में लिखा है कि, कोरोना से बचाव का रखें ध्यान.

11 अप्रैल को सरकार विज्ञापन दे रही थी कि शाही स्नान में आईए. लोग आए भी. 12 और 15 अप्रैल को शाही स्नान हुआ. लेकिन 11 अप्रैल वह दिन था जिस दिन महामारी के एक साल के दौरान सबसे अधिक नए मामले सामने आए थे. 11 अप्रैल को भारत में 1,69,899 नए मामले आए थे और उसी दिन लाखों लोगों को कुंभ में बुलाने का विज्ञापन छपा. उसके छह दिन बाद 17 अप्रैल को प्रधानमंत्री अपील करते हैं कि सांकेतिक कुंभ होना चाहिए. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वालों को पता है कि लोग अब अप्रैल का भूल गए होंगे तो उन्हें यूरो कप की तस्वीर दिखा कर भरमाया जाए कि पश्चिम का मीडिया कुंभ और भारत को बदनाम कर रहा था.

हमने यूरोप के अलग अलग शहरों में हुए यूरो कप फुटबॉल के पश्चिमी मीडिया में हुए कवरेज़ को खंगाला. CNN,AFP, रायटर, गार्डियन, इन सब पर तमाम ख़बरें मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि यूरो कप के दौरान कोरोना को लेकर खूब विरोध हुआ और सवाल उठाए गए. 

ब्रिटेन में कोविड से बचाव के नियमों को हटाने के खिलाफ 4000 से अधिक वैज्ञानिकों, डाक्टरों और नर्सों ने लांसेट पत्रिका को पत्र लिखा है जिस पर उन सभी के हस्ताक्षर हैं. इन वैज्ञानिकों ने दर्शकों के साथ मैच की इजाज़त देने को लेकर ब्रिटेन की सरकार की आलोचना की है और कहा कि इस नाज़ुक वक्त में नियम हटाना ख़तरनाक और अनैतिक काम किया गया है. पश्चिमी मीडिया में बाकायदा ऐसी खबरें छपी हैं कि मैच देखकर जिन शहरों में दर्शक लौटे हैं वहां पर कोरोना के मामले बढ़े हैं. इन खबरों में यह भी जानकारी है जो भी मैच देखने गया था उनकी कांटेक्ट ट्रेसिंग की जा रही है.

बहरहाल, CNN ने रिपोर्ट किया है कि जैसे ही डेल्टा वेरिएंट के केस बढ़ने लगे, कई देशों ने यूरो कप का विरोध किया है. इटली के प्रधानमंत्री ने कहा कि उस देश में फाइनल नहीं होना चाहिए जहां पर संक्रमण के तेज़ गति से फैलने का ख़तरा बहुत ज़्यादा है. जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति ने भी मैचों को देखने के लिए अनुमति दिए जाने की आलोचना की है. WHO ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि स्टेडियम तक पहुंचने से पहले ये लोग शहर की भीड़ में घुलते-मिलते पहुंचते हैं, इसी तरह लौटते हैं. इस तरह की भीड़ के आने से मेज़बान शहर में कोरोना के मामले दस प्रतिशत बढ़ गए हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि यूरो कप के मैचों में हज़ारों दर्शकों को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी. ठीक है कि वहां टीके की दोनों डोज़ के बाद स्टेडियम में आने की अनुमति दी गई लेकिन पश्चिमी मीडिया यह भी रिपोर्ट कर रहा है कि इसका सख़्ती से पालन नहीं किया गया. और दोनों डोज़ लग जाने से कोविड नहीं फैलेगा, इसके ठोस सबूत रिसर्च में नहीं मिले है. आप व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वालों से सावधान रहें. ये हर उस मौके की तलाश में हैं जिसके सहारे मार्च-अप्रैल और मई के नरसंहार से सरकार को जवाबदेही से बचाया जा सके. यह बात पूरी तरह गलत है कि यूरो कप को लेकर वहां का मीडिया और समाज चुप रहा.

विंबलडन की खबरों को भी आप देख सकते हैं. स्टेडियम में उन्हीं को आने की अनुमति दी गई जिन्होंने टीके की दोनों डोज़ ली हैं. तब भी RTPCR टेस्ट कराना अनिवार्य था और इस तरह के कई और नियम बनाए गए. तब भी एनबीसी न्यूज़ में खबर छप रहा है कि ऐसे समय में जब ब्रिटेन में डेल्टा वेरिएंट सर उठा रहा है, विबंलडन के लिए दर्शकों को अनुमति देना कितना सही है. बाकायदा खबर छपी है कि कोरोना के नए मामलों में 58 प्रतिशत का उछाल आ गया है. विबंलडन देखने वालों में वो वैज्ञानिक भी शामिल थीं जिन्होंने आक्सफोर्ड के टीके की खोज की है. जहां दर्शकों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया था.

एक सवाल और है. यूरो कप के मैच कोरोना के लिए खतरनाक हो सकते हैं. जब इटली फ्रांस और जर्मनी के प्रमुख बोल सकते हैं तब भारत को इस तरह के आयोजनों पर बोलने से किसने रोका है. क्या यही हमारी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति है कि हम केवल अनुपस्थित रहें. विंबलडन और क्रिकेट के मैच के दर्शकों के व्यवहार में आप कोई तुलना ही नहीं कर सकते हैं. 12 मार्च को अहमदाबाद में क्रिकेट मैच हुआ, पहले मैच में 57,000 दर्शक आए, जब हंगामा हुआ तब जाकर बिना दर्शकों के मैच का आयोजन हुआ. आखिर विंबलडन की तरह क्रिकेट मैच के आयोजकों ने क्यों नहीं सोचा कि जिन्होंने टीका नहीं लिया है उन्हें टिकट नहीं दिया जाएगा.

पिछले साल टीका नहीं था तो विंबलडन का मैच नहीं हुआ था. किस वैज्ञानिक आधार पर अहमदाबाद में हज़ारों लोगों को स्टेडियम में आने दिया गया? कुंभ को बदनाम करने का सवाल वो लोग उठा रहे हैं जो कोरोना की हर नाकामी पर चुप थे और क्रिकेट मैच से लेकर कुंभ तक पर भी चुप थे. उसके बाद अहमदाबाद का क्या हाल हुआ, आप कम जानते हैं क्योंकि नोएडा से चलने वाले गोदी मीडिया ने ठीक से कवर ही नहीं किया.


हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बादल फटने के कारण सैलाब आ गया है. मांझी नदी के बहाव के रास्ते में आने वाले गांवों को भारी नुकसान पहुंचा है. किनारे खड़ी गाड़ियां बह गई हैं. हिमाचल प्रदेश में पहले से ही सैलानियों की भीड़ पहुंच गई है. ऊपर से इस तबाही के कारण कोरोना के फैलने का भी खतरा हो गया है.

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