प्रियदर्शन की बात पते की : कब होते हैं इमरजेंसी जैसे हालात

प्रियदर्शन की बात पते की : कब होते हैं इमरजेंसी जैसे हालात

नई दिल्ली:

वे कोई और दिन थे जब न जीवन में आज जैसी रफ़्तार थी, न पत्रकारिता में। राजनीति और दुनिया की कुछ हलचलों के बीच सोया-सोया सा समाज चलता था, मंथर गति से ख़बरें चलती थीं। वह हिंदुस्तान के धीरे-धीरे चलने और बनने के दिन थे। लेकिन वह सोई-सोई सी दुनिया फिर भी आज के मुक़ाबले ज़्यादा जागी हुई थी। वह अपने नेताओं को पहचानती भी थी, पूजती भी थी, लेकिन नाराज़ होने पर बदल डालने का हौसला भी रखती थी।

यह सच है कि इमरजेंसी की पहली चोट के साथ वह सहम कर चुप हो गई। लेकिन इमरजेंसी के पहले और बाद इसी सोई-सोई दुनिया ने ऐसी अंगड़ाई ली थी, जिससे सत्ताएं थरथरा गई थीं। जैसे 1975 के देश को यक़ीन नहीं था कि इंदिरा गांधी इमरजेंसी लगा देंगी वैसे ही 1971 की इंदिरा गांधी ने सोचा नहीं होगा कि ये देश एक दिन उनका ताज उछाल देगा उनका तख़्त गिरा देगा।

1977 की जो ख़ामोश क्रांति हुई, उससे दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास का एक बेहतरीन दृश्य बना। ये अलग बात है कि महज तीन साल के भीतर उस जनक्रांति के साथ उसके नेताओं ने धोखा किया। उस धोखाधड़ी के सबसे बड़े जिम्मेदार लोगों में एक को आज इमरजेंसी का वह ख़तरा फिर से अगर याद आ रहा है तो इसके पीछे भले उसकी अपनी राजनीतिक मायूसी हो, लेकिन यह ज़माने का भी सच है।

इस बात के बावजूद कि इन चालीस बरसों में हिंदुस्तान कछुए से खरगोश बन चुका है और मीडिया अपनी दैनिक या साप्ताहिक लय को पीछे छोड़कर बिल्कुल चौबीस घंटे चलने वाली ऐसी चक्की बन चुका है, जिसमें दुनिया पिसती रहती है और ख़बरें निकलती रहती हैं, हम एक ज़्यादा बेख़बर और असुरक्षित मुल्क हैं। सबकी फिक्र करने वाला, पास-पड़ोस का ख़याल रखने वाला, और देश और दुनिया को अपना फ़र्ज़ समझने वाला मध्यवर्ग ख़त्म हो चुका है और उसकी जगह एक ऐसा आक्रामक उपभोक्ता वर्ग पैदा हो चुका है जो सिर्फ अपने खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने की सोचता है और किसी भी तरह की हिंसा, गैरबराबरी और नाइंसाफ़ी की धूल अपनी त्वचा पर पड़ने नहीं देता।

इसी दौर में मीडिया पर पूंजी का कब्ज़ा पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है और समांतर आवाज़ें पहले से ज़्यादा दबी हुई हैं। ऐसे समय में देशभक्ति का मतलब दुनिया में ताकतवर होने की हसरत भर है, विकास का मतलब कुछ लोगों के लिए समृद्धि भर है और नेतृत्व का मतलब आक्रामक तेवर में की गई बयानबाज़ी भर है।

विचारहीनता के इस दौर में फिर ऐसी व्यक्तिपूजा शुरू हो रही है जिसमें न उचित आलोचना की जगह है और न असहमति की। लोकतांत्रिक संस्थाएं या तो ख़त्म की जा रही हैं या बेमानी बनाई जा रही हैं। दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यक लगातार किनारे किए जा रहे हैं और खुदकुशी और गरीबी के विकराल आंकड़े देखने को कोई भी तैयार नहीं है।

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यही वह हालात होते हैं जिसमें कोई नेता ख़ुद को लोकतंत्र का पर्याय समझने लगता है। पहले वह उम्मीद जगाता है, फिर अपनी नाकामियां लोकतंत्र पर थोपता है और फिर अंत में इमरजेंसी लगाता है- ये अलग बात है कि अंत में वो भी मारा ही जाता है। लेकिन इतिहास की इस गलती को हम न दोहराएं- इसके लिए ज़रूरी है कि अपने लोकतंत्र पर लगातार नज़र रखें, अपने नेताओं के हमेशा इम्तिहान लेते रहें।