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This Article is From Nov 07, 2014

बात पते की : आखिर नौजवानों के भटकाव की क्या है वजह

Priyadarshan
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  • Updated:
    नवंबर 19, 2014 15:35 pm IST
    • Published On नवंबर 07, 2014 15:46 pm IST
    • Last Updated On नवंबर 19, 2014 15:35 pm IST

झारखंड के झरिया नाम की जगह में आखिर कुछ नौजवानों के भीतर हजारों मील दूर इराक और सीरिया में कहर ढा रहे बदनाम दहशतगर्द संगठन आईएसआईएस की शर्ट पहनने का जोश क्यों जागा होगा, बेशक वे उन साज़िशी दिमाग़ों से कम ख़तरनाक रहे होंगे जो ख़ामोशी से हिंसा और नफ़रत का खेल चलाते हैं और समुदायों और मुल्कों को बांटते हैं।

अगर उनके भीतर आईएस के समर्थन की कोई ठोस चाहत रही होती तो इसका मुहर्रम के जुलूस में प्रदर्शन करने की जगह वो यहां या वहां ऐसे ही किसी उन्माद में शामिल होने की कोशिश कर रहे होते। ऐसे दुस्साहसी तमाशे− जिनके पीछे बहुत गहरा विचार नहीं होता, पहले भी दिखते रहे हैं।

ग्रेट ब्रिटेन का राजकुमार प्रिंस हैरी हिटलर की नाज़ी निशानी स्वास्तिक लगाए दिख जाता है और बहुत सारे नौजवान भिंडरावाले की शर्ट पहने उसका स्टिकर अपनी कार के पीछे चिपकाए नज़र आते हैं। ये सब हिंसा या दहशत के समर्थक हों ये ज़रूरी नहीं, लेकिन समाज और इतिहास की इनकी कच्ची समझ इनको अक्सर ऐसे भटकावों में धकेल देती है, जिनका नतीजा इनके लिए भी ख़तरनाक होता है और कई बार समुदायों में भी खटास पैदा करता है। लेकिन क्या यह मामला सिर्फ चंद नौजवानों की नासमझ हरक़त का है या इसके पीछे समाज की भी कोई टूटन, कोई अराजकता, उसका कोई खालीपन होता है। इंसानी सभ्यता में हिंसा को लेकर हमेशा से एक हिचक रही है, जिसे कभी धर्म, कभी राष्ट्र या कभी किसी क्रांति के नाम पर सिर्फ जायज ही नहीं ठहराया जाता एक आकर्षक पैकेज में बदला जाता है− ऐसे पैकेज में जो समाज में किसी भी वजह से मायूस और हताश नौजवानों को खूब लुभाती है।

ऐसे नौजवानों को फटकार कर जेल में डाल कर हम रास्ते में नहीं ला सकते बल्कि यह देखना होगा कि वह कौन-सी ख़ला है, जो समाज से उनके दिलों में घर कर रही है और तरह−तरह के शैतानों के प्रति आकर्षण पैदा कर रही है। कहने की ज़रूरत नहीं कि भारतीय समाज में हाल के वर्षों में बहुत सारी वजहों से ऐसे हालात बने हैं, जो ऐसे अकेलेपन, ऐसी लाचारी और कभी−कभी ऐसे गुस्से को भी जन्म देते हैं, जिनमें नौजवान कभी आईएस की शर्ट पहन कर घूमते हैं कभी कोई दूसरा चोला ओढ़कर। जिस झरिया में ये विवाद उठा है वहां ज़मीन के भीतर बरसों से आग लगी हुई है। यह झुलसी हुई काली पड़ती हक़ीक़त हमारे समाज का हिस्सा न बने यह देखना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

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