मंगलवार का दिन उनके नाम रहा, जिन्होंने मंत्री पद की शपथ ली। चूंकि ज़्यादातर नेता आस्तिक और कर्मकांडी होते हैं इसलिए वे इस दिन को किसी चमत्कार के रूप में भी देख रहे होंगे। जिसे संक्षेप में पुण्य प्रताप भी कहा जा सकता है। जो नहीं बन पाए वो उस ज्योतिष को खोज रहे होंगे जो कई दिनों से व्रत रखवा रहा होगा या पन्ना पुखराज पहनवा रहा था। जो बन गए उनके इलाके के लोग, ससुराल वाले, सगे संबंधी और चुनाव जिताने वाले कार्यकर्ता तरह तरह की यादें साझा कर रहे होंगे कि ऐसे जिताए तो वैसे जिताए। कोई कह रहा है कि भाग्य देखिये फलाने जी मंत्री बन गए। ये सब हमारी देसी राजनीतिक अभिव्यक्तियां हैं जिसका मज़ा टीवी में नहीं मिलेगा। मेरी तरफ से इन तमाम भाग्यशाली लोगों को बिना शर्त शुभकामनाएं। कर्म पर भी आ रहा हूं लेकिन थोड़ी देर में। एंकर पत्रकार शपथ लेने वाले मंत्री को जाति और जाति से बनने वाले समीकरण के हिसाब से देख रहे थे। जैसे महेंद्रनाथ पांडे शपथ लेने आए तो कहा जाने लगा कि यूपी में ब्राह्मण चेहरा हैं। चर्चाकार भूल गए कि पहले से कलराज मिश्र और महेश शर्मा इस कोटे से मौजूद हैं। महेंद्रनाथ को कुछ लोगों ने कहा कि कोई नहीं जानता, बाद में पता चला कि संघ इन्हें जानता है। केशव प्रसाद मौर्या से पहले ब्राह्मण नेता लक्ष्मीकांत वाजपेयी ही प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष थे। उनके अध्यक्ष बनने से क्या ब्राह्मण बीजेपी में नहीं आए जो महेंद्रनाथ पांडे को लाना पड़ा।
कई बार बहसों का पैमाना समझ नहीं आता है। अगर यूपी चुनाव के मद्देनजर महेंद्रनाथ ब्राह्मण कोटे से बने हैं तो मोदी मंत्रिमंडल में पहले से इतने ब्राह्मण हैं कि उन्हें लेकर समीक्षा की जा सकती है कि ये दिग्गज ब्राह्मणों की अखिल भारतीय राजनीतिक महत्वकांक्षा को तुष्ट क्यों नहीं कर पाते हैं। इनके रहते महेंद्रनाथ पांडे की ज़रूरत क्यों पड़ती है। कैबिनेट में ब्राह्मणों का जितना दबदबा है अगर उसी का प्रचार किया जाए तो यूपी में काम हो सकता है और सरकार का ऐसा ढांचा ऐसा दिख सकता है जो समाज से काफी मिलता जुलता है। जैसे गृह मंत्री राजपूत, कृषि मंत्रालय राजपूत, वित्त मंत्री ब्राह्मण, रक्षा मंत्री ब्राह्मण, विदेश मंत्री ब्राह्मण, रेल मंत्री ब्राह्मण, स्वास्थ्य मंत्री ब्राह्मण, सड़क परिवहन मंत्री ब्राह्मण, रसायन व ऊर्वरक मंत्री ब्राह्मण, लघु व मध्यम उद्योग मंत्री ब्राह्मण।
26 मई 2014 को शपथ लेने वाले मोदी मंत्रिमंडल के 24 कैबिनेट मंत्रियों में आधे यानी 12 अपर कास्ट और दो दलित कबीना मंत्री थे। स्वतंत्र प्रभार वाले 10 मंत्रियो में से पांच अपर कास्ट के थे। स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों में एक भी दलित नहीं था। पहली बार शपथ लेने वाले कुल 46 मंत्रियों में से 20 अपरकास्ट, 13 ओबीसी, 6 अनुसूचित जाति और 3 दलित थे। पूरे कैबिनेट में 3 दलित मंत्री। इस बार जिस यूपी के लिए राज्य मंत्री बनाए गए हैं वहां से इनके बगैर अमित शाह ने लोकसभा की 80 सीटों में से 71 पर अपने उम्मीदवार जिता दिये थे। अब ऐसा क्या हो गया है कि उस यूपी के लिए बीजेपी को दलित, ब्राह्मण और पिछड़ा, अति पिछड़ा करना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 17 है। इन सभी पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार जीते थे। तब तो बीजेपी को दलित चेहरे की ज़रूरत नहीं पड़ी थी। मोदी ही सबका चेहरा थे। बीजेपी के पास लोकसभा में सबसे अधिक 40 दलित सांसद हैं। आज जिन 19 सांसदों को राज्यमंत्री बनाया गया है उनमें से 5 दलित हैं। 2 आदिवासी हैं। मोदी मंत्रिमंडल के 27 कैबिनेट मंत्रियों में सिर्फ दो दलित सांसद हैं। एक दलित सांसद बीजेपी के कोटे से मंत्री हैं जिनका नाम थावरचंद गहलोत हैं। दूसरे, दलित सांसद लोकजनशक्ति पार्टी के कोटे से कबिना मंत्री हैं जिनका नाम रामविलास पासवान है। रामविलास पासवान खाद्यान्न व उपभोक्ता मामले के कैबिनेट मंत्री हैं। थावरचंद गहलोत समाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री हैं। जुएल ओराम अनुसूचित जनजाति के हैं और जनजाति मामलों के कबीना मंत्री हैं।
अब मेरा एक सवाल है दलित सांसद हमेशा सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री ही क्यों बनते हैं। वे वित्त मंत्री क्यों नहीं बनते, विदेश मंत्री क्यों नहीं बनते हैं। यह सवाल विधायक से लेकर सांसद बने दलितों को खुद से पूछना चाहिए, अपनी पार्टी से पूछना चाहिए और अपने मतदाता को भी बताना चाहिए। मतदाता को भी उसे पूछना चाहिए कि आप समाज के नाम पर राज्य मंत्री ही क्यों बनते हैं और कैबिनेट मंत्री बनते हैं तो सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री ही क्यों बनते हैं। मौजूदा राजनीति और मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान ही इकलौता ऐसा नाम है जो दलित होते हुए भी कभी सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री नहीं रहे। पासवान कई सरकारों में मंत्री रहे। वो रेल मंत्री, श्रम मंत्री,
संचार मंत्री, रसायन व ऊर्वरक मंत्री, इस्पात मंत्री, संसदीय कार्यमंत्री की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं।
पासवान का रिकार्ड शानदार है। पासवान से पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्हें भी कभी सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया गया था या वो इस मंत्रालय से कैसे बच गए। पिछली यूपीए सरकार में सुशील कुमार शिंदे गृह मंत्री थे, दो बार ऊर्जा मंत्री रहे। मीरा कुमार स्पीकर थीं मगर जब वे मंत्री थीं तो सामाजिक अधिकारिता मंत्री ही थीं। उनके पिता जगजीवन राम रक्षा मंत्री और उप प्रधानमंत्री थे। मीरा कुमार जब स्पीकर बनीं तो उनकी जगह मल्लिकार्जुन खड़गे सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री बने। इस वक्त मल्लिकार्जुन खड़गे लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। उनकी काबिलियत का पता ही नहीं चलता, अगर उन्हें लोकसभा में ये जिम्मेदारी न मिलती।
कहीं सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय दलित नेताओं के लिए पार्किंग तो नहीं है, जहां तमाम प्रतिभाशाली दलित नेताओं की गाड़ी वहीं खड़े खड़े जंग खाती रह जाती है। मोदी सरकार को इस मामले में भी यह धारणा तोड़नी चाहिए कि दलित सांसद सिर्फ समाज कल्याण मंत्रालय ही संभालेगा। यही हाल अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री का भी होता है। हाल ही में इलाहाबाद में जब बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी हुई थी तब पूर्व सांसद और बीजेपी नेता संजय पासवान ने कहा था कि संगठन को दलितों के साथ भोजन करने, मुलाकात करने के प्रतीकों और नारों से आगे जाना चाहिए। पार्टी को अंबेडकर और कांशीराम के योगदानों को सम्मान देने से आगे जाकर दलितों को देखना समझना चाहिए।
बीजेपी ने जिन पांच दलित सांसदों को राज्य मंत्री बनाया है क्या उन्हें छवि और प्रतीकों के खांचे से अलग देखा जा सकता है। मंत्रालय के वितरण से इस सवाल को और करीब से देखा जा सकेगा। प्रस्तावना लिखे जाने तक मंत्रालय की घोषणा नहीं हुई थी। हालांकि सरकार ने मीडिया से यही कहा कि इन मंत्रियों के चयन को जाति और धर्म के चश्मे से न देखा जाए। उनका चयन अंग्रेज़ी वर्णमाला के पांचवे वर्ण ई के हिसाब से किया गया है। Experience, Expertise और Energy।
पेशेवर अनुभव के आधार पर पी पी चौधरी राज्य मंत्री बने हैं जो सुप्रीम कोर्ट में चालीस साल वकालत कर चुके हैं।
सुभाष राम राव भामरे कैंसर सर्जन रहे हैं। एमजे अकबर वरिष्ठ संपादक और अंतर्राष्ट्रीय ख़्याति के पत्रकार रहे हैं।
अर्जुन राम मेघवाल आईएएस अफसर रहे हैं। अनिल माधव दवे ने हिन्दी में कई किताबें लिखी हैं।
अनिल माधव की किताब शिवाजी और सुराज अमेज़न पर उपलब्ध है। एमजे अकबर जी को मंत्री बनने पर विशेष रूप से बधाई। वो पत्रकार रहे, कांग्रेस से सांसद बने फिर पत्रकार रहे फिर बीजेपी के प्रवक्ता बने, फिर बीजेपी के सांसद बने और अब मंत्री बने हैं। सोशल मीडिया पर अकबर के पुराने लेखों को शेयर कर टारगेट किया जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे सोशल मीडिया पर कई लोग दूसरे पत्रकारों को टारगेट करते हैं कि आपकी ये बात बताती हैं कि आप फलां पार्टी के प्रवक्ता हैं। अकबर से पहले कई दलों ने कई अखबारों के मालिकों को राज्य सभा भेजा है। मालिक के साथ साथ पत्रकार ने भी अपना जुगाड़ किया है। ये अकबर के पहले प्राचीन काल में भी हुआ और अकबर के समय में भी हो रहा है और अकबर के बाद के अत्याधुनिक काल में भी होगा। फिर भी कोई राजनीति और पत्रकारिता के संबंधों पर बहस करना चाहता है तो पहले जाकर वो सारे ट्वीट डिलिट करे जो उसने ऐसे सवाल दूसरे पत्रकारों से किये हैं। सोशल मीडिया पर टारगेट होने वाले पत्रकार अकबर साहब को ढाल की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं और उनसे प्रेरणा भी ले सकते हैं। एम जे अकबर ने कई किताबें लिखी हैं। कई पसंद भी की जाती हैं। रायट आफ्टर रायट और नेहरू द मेकिंग आफ इंडिया। मैंने अकबर की कोई किताब नहीं पढ़ी है, इसलिए नहीं बता सकता कि नेहरू वाली किताब में आलोचना है या समालोचना या फिर वंदना।
सरकार की तरफ से बताया गया कि कई राज्य मंत्रियों का चयन राज्यों में मंत्री और विधायक रहने के अनुभव के आधार पर भी किया गया है। फगन सिंह कुलस्ते और विजय गोयल वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री रहे और इस अनुभव के आधार पर मोदी सरकार में भी राज्य मंत्री रहे। इन दोनों का 12 साल पहले का अनुभव ज़रूर खास रहा होगा कि 12 साल बाद भी ये राज्य मंत्री ही बनाए गए। मीडिया को बकायदा बताया गया कि मंत्री बनने का आधार कार्यक्षमता है न कि जाति और धर्म। आजकल इस कैटगरी के लिए सोशल डायवर्सिटी का इस्तेमाल होता है। इसलिए सोशल डायवर्सिटी के तहत बताया गया कि कितने दलित और कितने मुसलमान मंत्री बने हैं। इस गिनती के अनुसार- दो अनुसूचित जाति और पांच अनुसूचित जनजाति। दो अल्पसंख्यक और दो महिला को मंत्री बनाया गया है। दस राज्यों से 19 मंत्री बनाए गए हैं।
मिनिमम गवर्मेंट, मैक्सिम गवर्नेंस। मोदी सरकार ने जब शपथ ली थी कि तब खूब बातें हुई थी कि कई मंत्रालायों को मिलाकर नया मंत्रालय बनेगा और सरकार का आकार छोटा होगा। नियम के अनुसार 82 मंत्री ही हो सकते हैं। मंत्रियों की संख्या 78 हो गई है। मनमोहन सिंह की सरकार में 78 मंत्री थे जबकि वो गठबंधन की सरकार थी। गठबंधन की सरकार तो ये भी है मगर जो संदेश पहले दिया गया था उसकी जगह कुछ और दिया जा रहा है। मोदी मंत्रिमंडल में भी 78 मंत्री हो गए हैं। 19 राज्य मंत्रियों के लिए विस्तार हुआ है। इनमें से 6 राज्य मंत्री राज्य सभा के हैं और 13 लोक सभा के।
This Article is From Jul 05, 2016
प्राइम टाइम इंट्रो : मोदी मंत्रिमंडल में 19 नए मंत्री शामिल
Ravish Kumar
- ब्लॉग,
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Updated:जुलाई 05, 2016 21:24 pm IST
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Published On जुलाई 05, 2016 21:24 pm IST
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Last Updated On जुलाई 05, 2016 21:24 pm IST
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