बात करीब चार-पांच साल पहले की है. एक दिन राजधानी दिल्ली के बंगाली मार्केट की एक प्रमुख मिठाई की दुकान के बाहर एक इंसान को 15-20 लोगों ने घेरा हुआ था. लोग उस इंसान से आटोग्राफ लेने की कोशिश कर रहे थे. वो व्यक्ति बड़ी विनम्रता से आटोग्राफ देने से इनकार कर रहा था. उस व्यक्ति का नाम था नंदन मोहनराव नीलेकणी. वे आजकल खबरों में हैं.दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें परीक्षा सुधारों के लिए गठित उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का अध्यक्ष नियुक्त किया है. इससे उनकी यह भूमिका एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर आ गई है.पेपर लीक जैसी समस्या को जड़ से समाप्त करने और परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय, पारदर्शी और प्रौद्योगिकी-आधारित बनाने का यह दायित्व उनकी क्षमता और विश्वसनीयता का प्रमाण है.
कैसा था नंदन नीलेकणी का बचपन
भारत के डिजिटल युग की कहानी जब भी लिखी जाएगी, नीलेकणी का नाम उसके केंद्र में अवश्य होगा. वे केवल इंफोसिस के सह-संस्थापक या आधार परियोजना के वास्तुकार नहीं हैं. वे एक ऐसी विरल शख्सियत हैं, जिन्होंने निजी क्षेत्र की सफलता को सार्वजनिक सेवा में परिवर्तित कर दिया और तकनीक को सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया.
नंदन नीलेकणी के पिता मोहन राव नीलेकणी मैसूर और मिनर्वा मिल्स के जनरल मैनेजर थे. वो फैबियन समाजवादी विचारों से प्रभावित थे. माता दुर्गा गृहस्थी संभालती थीं. पिता की नौकरी में बार-बार स्थानांतरण के कारण उनका बचपन अस्थिर रहा. 12 साल की आयु में वे धारवाड़ में चाचा के पास रहने चले गए. इस अनुभव ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया. उन्होंने बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, सेंट जोसेफ हाई स्कूल धारवाड़ और कर्नाटक कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की. इसके बाद आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि ली. आईआईटी में वे एक औसत छात्र थे, लेकिन क्विज टीम के सितारे और सामाजिक नेता. यहीं एक क्विज प्रतियोगिता के दौरान उनकी मुलाकात रोहिणी से हुई, जिनसे उन्होंने 1981 में विवाह किया. उनके दो बच्चे हैं-निहार और जान्हवी.
नंदन नीलेकणी ने अपने करियर की शुरुआत किस कंपनी से की थी
करियर की शुरुआत 1978 में पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से हुई, जहां उनकी मुलाकात एनआर नारायण मूर्ति से हुई. साल 1981 में मात्र 250 डॉलर की पूंजी के साथ नीलेकणी, मूर्ति और पांच अन्य साथियों ने इंफोसिस की स्थापना की. इस कंपनी ने भारत को वैश्विक आईटी हब के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. नीलेकणी 2002 से 2007 तक कंपनी सीईओ रहे. उनके नेतृत्व में इंफोसिस
ने अरबों डॉलर का कारोबार हासिल किया. साल 2009 में वे इंफोसिस छोड़कर सार्वजनिक जीवन में आए.
तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आमंत्रण पर वे यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) के संस्थापक अध्यक्ष बने. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था. आधार ने एक अरब से अधिक भारतीयों को बायोमेट्रिक पहचान दी. यह विश्व की सबसे बड़ी डिजिटल पहचान प्रणाली बन गई. आधार ने फर्जी लाभार्थियों को हटाकर सरकारी खजाने में हजारों करोड़ रुपये बचाए, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) को संभव बनाया और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव रखी. यूपीआई, डिजिलॉकर जैसी व्यवस्थाएं इसी सोच की उपज हैं. नीलेकणी ने तकनीक को समावेशी विकास का माध्यम बनाया. आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने गोपनीयता और सुरक्षा पर जोर देते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया.
अपनी आधी संपत्ति दान करेंगे
दानवीरता नीलकेणी के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है. साल 2017 में पत्नी रोहिणी के साथ उन्होंने बिल गेट्स की गिविंग प्लेज पर हस्ताक्षर किए और अपनी संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा समाज के लिए दान करने का संकल्प लिया. वे अब तक आईआईटी बॉम्बे को सैकड़ों करोड़ का दान दे चुके हैं. रोहिणी नीलेकणी भी प्रमुख परोपकारी हैं. दोनों ने मिलकर शिक्षा, जलवायु और सुशासन पर काम करते हैं.
नीलेकणी की शख्सियत में व्यावहारिकता और दूरदर्शिता का अनूठा संगम है. उन्होंने 'इमैजिनिंग इंडिया' शीर्षक से एक किताब भी लिखी है. इसमें उन्होंने नवीनीकृत राष्ट्र की कल्पना की है. वे राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं. उन्होंने 2014 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु साउथ से लोकसभा चुनाव लड़ा था. लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद वो तकनीक और सार्वजनिक सेवा में लौट आए. इंफोसिस में 2017 में आए संकट के समय उन्होंने गैर कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में वापस आकर कंपनी को स्थिर किया.
वो जी-20 में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर बने टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष भी रहे. उनका व्यक्तित्व विनम्र, गहन विचारक और समस्या-समाधानकर्ता का है. वे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हाथ में लेते हैं, चाहे वह एक अरब लोगों की पहचान देने की बात हो या परीक्षा प्रणाली को लीक-प्रूफ बनाने की. मोदी सरकार की ओर से की गई हालिया नियुक्ति उनकी इसी क्षमता का सम्मान है. टास्क फोर्स में पूर्व इसरो अध्यक्ष एस सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी कामाकोटी समेत और दूसरे विशेषज्ञ शामिल हैं.
नीलेकणी तकनीक के जरिए संस्थागत सुधार लाने वाले व्यक्ति हैं. वे जानते हैं कि केवल सजा बढ़ाने से समस्या नहीं सुलझेगी, सिस्टम
डिजाइन को मजबूत करना होगा.
पे बैक टू सोसायटी
नीलेकणी ने साबित किया है कि उद्यमिता केवल मुनाफे तक सीमित नहीं है. सफलता के बाद समाज को वापस देना उनकी प्राथमिकता रही है. वे कहते हैं कि असमानता बढ़ रही है और युवा भविष्य को लेकर चिंतित हैं. इसीलिए वे दीर्घकालिक और रणनीतिक दान पर जोर देते हैं. उनकी जीवन यात्रा मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से वैश्विक मंच तक की है, लेकिन वे जमीनी समस्याओं से जुड़े रहे.
आज जब भारत डिजिटल महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है, नंदन नीलेकणी उस यात्रा के पथ प्रदर्शक हैं. इंफोसिस से आधार, दान
से परीक्षा सुधार तक-हर चरण में उन्होंने राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी. उनकी शख्सियत प्रेरणा का स्रोत है कि तकनीक और करुणा के मेल से बड़े परिवर्तन संभव हैं. वे न केवल भारत के डिजिटल आर्किटेक्ट हैं, बल्कि एक ऐसे नागरिक भी हैं जो निजी सफलता को सार्वजनिक भलाई में बदलने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं. पेपर लीक जैसी चुनौती का समाधान भी शायद इसी दृष्टिकोण से निकलेगा-पारदर्शिता, प्रौद्योगिकी और विश्वास के बल पर. नंदन नीलेकणी की कहानी जारी है और भारत उनका ऋणी है.
बंगाली मार्केट के उस रेस्तरां के मालिक,जिधर नीलकेणी कभी–कभी आते हैं, कहते हैं कि सज्जनता और विनम्रता में उनका कोई सानी नहीं है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)