मोदी से मुकाबले को फ्रंटफुट पर खेल रहीं ममता क्या कांग्रेस को पहुंचा रही हैं नुकसान?

बड़ा सवाल है कि क्या पश्चिम में बीजेपी के गढ़ गुजरात से निकले मोदी-शाह की जोड़ी को मात देने के लिए पूरब से निकलीं ममता दिल्ली तक पहुंच पाएंगी?

मोदी से मुकाबले को फ्रंटफुट पर खेल रहीं ममता क्या कांग्रेस को पहुंचा रही हैं नुकसान?

तृणमूल कांग्रेस अगले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के मुकाबले में ममता बनर्जी को विपक्ष के मजबूत चेहरे के तौर पर पेश करने की मुहिम को लेकर खुलकर सामने आ गई है. गोवा, दिल्ली और अब महाराष्ट्र में ममता बनर्जी के तेवरों ने साफ कर दिया है कि अगर ऐसा कांग्रेस को कमजोर करने की कीमत पर भी हो, तो उन्हें इससे गुरेज नहीं है.

ममता बनर्जी ये संकेत दे रही हैं कि जिस तरह पश्चिम बंगाल में वाम दलों के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए उन्हें कांग्रेस से अलग होकर जमीनी स्तर पर लेफ्ट के काडर से सीधे मोर्चा संभालने वाली तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया था. उनके रणनीतिकारों का तर्क है कि ममता ने चुनाव दर चुनाव बंगाल में तीसरी बार सत्ता हासिल की है, जीत के दायरे के साथ उनका कद भी बड़ा होता चला गया है. मोदी की तरह ही मुख्यमंत्री के तौर पर लंबे कार्यकाल के बाद केंद्रीय राजनीति में उनकी भूमिका में कुछ भी गलत नही है.

ममता बनर्जी को विपक्ष का दमदार चेहरा बनाने के गेमप्लान में पर्दे के पीछे अहम भूमिका चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की भी रही है. इस संयुक्त विपक्षी मोर्चे में पहले कांग्रेस को लाने की कवायद भी थी. प्रशांत किशोर जब शरद पवार जैसे विपक्षी नेताओं से मिल रहे थे तो उन्होंने राहुल गांधी-प्रियंका गांधी से भी मुलाकात भी की थी. संसद के मानसून सत्र के दौरान जुलाई में ममता बनर्जी खुद सोनिया गांधी से मिली थीं और उस बैठक में राहुल भी थे. लेकिन बीजेपी से सीधे मुकाबले के बजाय गठबंधन या मोर्चे का प्रस्ताव कांग्रेस को शायद नहीं सुहाया. खासकर केंद्रीय राजनीति में कांग्रेस इसके लिए एकदम तैयार नहीं है. इसके बाद यह कवायद गैर कांग्रेस गैर बीजेपी मोर्चा को आकार देने में बदल गई है. इस बार ममता जब दिल्ली आईं तो उनकी न सोनिया-राहुल से कोई मुलाकात हुई और न केजरीवाल से.

यही वजह है कि इस बार कांग्रेस नेताओं और उनकी अगुवाई में बैठकों से टीएमसी ने दूरी बनाए रखी. संसद के शीतकालीन सत्र में निलंबन मुद्दे पर कांग्रेस औऱ तृणमूल कांग्रेस की राहें अलग-अलग नजर आई हैं. दोनों में जुबानी जंग तेज है-इससे सत्तापक्ष की बांछें खिली हुई हैं, जो किसान आंदोलन, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर खुद को घिरा पा रही थी.

ममता के समर्थक और चुनावी विश्लेषक बंगाल चुनाव के बाद से लगातार यह तर्क दे रहे हैं कि अगर बंगाल में बीजेपी मजबूत हुई भी है तो कांग्रेस और लेफ्ट दलों की कीमत पर. जबकि ममता की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ी है. उनका कहना है कि हिन्दुत्व, विकास मॉडल और जमीनी पकड़ वाले बीजेपी के करिश्माई नेता मोदी का मुकाबला करना है तो वैसा ही मंझा और मुखर चेहरा ही सामने लाना होगा. केंद्र में कांग्रेस की पकड़ कमजोर होने के बाद जब भी बीजेपी के खिलाफ मोर्चा बनाने की बात आई तो सर्वमान्य नेता पेश करना विरोधी दलों के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा साबित हुआ है. ऐसे में इस बार कोशिश चेहरे के साथ विपक्षी मोर्चे को आगे करने की है.  

ममता की इस मुहिम को खुलकर या पर्दे के पीछे समर्थन दे रहे दलों के अपने तर्क हैं. इनमें सबसे बड़ी वजह, जो बताई गई कि वर्ष 2014 और 2019 में मोदी बनाम राहुल के चुनाव का हश्र वो देख चुके हैं. ऐसे में मोदी मैजिक के दौर में भी मजबूत होकर उभरे क्षेत्रीय नेता को अब मौका मिलना चाहिए. लिहाजा इस बार भी कांग्रेस को अगुवाई का मौका देकर वो मोदी को वॉकओवर देने के मूड में कतई नहीं हैं. इस तर्क के समर्थक कई ऐसे दल भी हैं, जो यूपीए का हिस्सा रहे हैं. इनमें एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की भूमिका सबसे मुखर है. जिन्हें सोनिया गांधी की जगह यूपीए का अध्यक्ष बनाने की चर्चा भी चली थी. लेकिन कांग्रेस की बेरुखी के बाद कोशिश है कि महाराष्ट्र में बीजेपी की चुनौती को ध्वस्त कर जिस तरह शरद पवार एक बेमेल गठबंधन को आकार देने में सफल रहे, वैसा ही कुछ केंद्रीय राजनीति में किया जाए. ममता को चेहरा बनाने की एवज में पवार की मेंटर की भूमिका से टीएमसी को भी ऐतराज नहीं है. शिवसेना समेत कई दल इस रणनीति में फिट बैठते हैं.

बिहार में राजद ने भले ही इस मुहिम का खुलकर समर्थन न किया हो, लेकिन हालिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस से गठबंधन न कर हर सीट पर अपना उम्मीदवार उतारने वाली राजद ने भी इन्हीं तर्कों का सहारा लिया. उसने साफ कहा कि कांग्रेस को सीट देकर वो मुकाबले को कमजोर नहीं करना चाहती. भले ही लालू यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बात कर दरारों को मिटाने की कोशिश की हो, लेकिन कमान अब तेजस्वी यादव के हाथों में है. ऐसे में कांग्रेस राजद को लेकर भी ज्यादा उम्मीद पाले नहीं रह सकती.

अगर सियासी गणित को परे रखकर मोदी को कहीं से भी चुनौती देने वाले नेताओं की बात की जाए तो सामान्य तौर पर दो-तीन विकल्प नजर आते हैं.

प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर राहुल-प्रियंका की अगुवाई वाली कांग्रेस, दिल्ली में लगातार बीजेपी को धूल चटाने वाली आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल और पूरब के आखिरी छोर को तृणमूल का अभेद्य दुर्ग बनाने वाली ममता बनर्जी. मोदी से मुकाबले की बात किनारे रखकर अगर इन्हीं तीनों नेताओं में मिलान किया जाए तो ममता अपने राजनीतिक अनुभव, कौशल औऱ प्रदर्शन के बलबूते अन्य पर भारी पड़ती दिख रही हैं. जबकि गांधी परिवार को लगातार दो आम चुनावों में करारी पराजय मिली, बल्कि परिवार की परंपरागत सीट अमेठी पर स्वयं राहुल की हार ने उनके नेतृत्व की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया. पिछले साढ़े सात सालों में राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव की बात करें तो राहुल-प्रियंका के आक्रामक अभियानों के बावजूद पार्टी को निराशा हाथ लगी है.

मुकाबले में खुद को आगे साबित करने की कोशिश में जुटे दो अन्य नेता केजरीवाल और ममता हैं, जो खुद न केवल मोदी की तरह मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अपना प्रशासनिक कौशल साबित कर चुके हैं, बल्कि बीजेपी को सीधे मुकाबले में और मोदी के आक्रामक प्रचार के बावजूद लगातार अपनी राजनीतिक साख को मजबूत करने में कामयाब रहे हैं.

आम आदमी पार्टी पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, हिमाचल जैसे छोटे राज्यों में कांग्रेस या बीजेपी के मुकाबले तीसरे विकल्प के तौर पर खुद को पेश कर रही है. केंद्र में उसकी संभावनाओं का सबसे बड़ा इम्तेहान कुछ महीनों बाद पंजाब में है, जहां अगर वो दिल्ली के बाद कांग्रेस को हटाने में सफल रहती है तो 2024 की रेस के लिए वो गंभीरता से तैयारी कर सकती है.

ममता के मामले में रणनीतिकार मानते हैं कि टीएमसी 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बंगाल में 18 सीटों पर मिली जीत की टीस को भूली नहीं है. अगर ममता को प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर पेशकर आगे बढ़ती है तो बंगाली अस्मिता और भावना को भुनाते हुए राज्य में क्लीनस्वीप कर सकती है. साथ ही असम, त्रिपुरा, मेघालय जैसे पूर्वोत्तर औऱ गोवा जैसे छोटे राज्यों को मिलाकर वो 50 के आंकड़े को पार कर सकती है. साथ ही केंद्र में गैर बीजेपी सरकार को समर्थन देने को तैयार दलों के साथ ममता को पीएम बनाने का ख्वाब पूरा किया जा सकता है. जिनके पास रेल मंत्री के तौर पर केंद्रीय राजनीति का भी अनुभव है. ऐसे में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा अन्य दलों में ममता बनर्जी अपनी स्वीकार्यता कायम करने के प्रयासों में अभी से जुट गई हैं.  

ममता के नेतृत्व या विपक्ष की अगुवाई के अघोषित अभियान को कांग्रेस से समर्थन मिलने की कोई भी संभावना न देखते हुए टीएमसी ने आक्रामक मुहिम छेड़ दी है. अब बात स्वस्थ्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रही है.असम में सुष्मिता देव, गोवा में पूर्व मुख्यमंत्री लुइजिन्हो फलेरियो, मेघालय में पूर्व सीएम मुकुल संगमा समेत 12 कांग्रेस विधायकों को पाले में लाने के बाद बिहार में कीर्ति आजाद समेत कई नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल का दामन थाम लिया है. इरादा साफ है कि तृणमूल उन राज्यों या इलाकों में भरपूर ताकत लगाएगी, जहां बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस लगातार कमजोर रही है, स्वाभाविक है कि अगर इससे कांग्रेस को नुकसान पहुंचता है तो उसे अब इसकी परवाह नहीं है.

निस्संदेह टीएमसी की क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी साधेगी, जिनके नेता खुद केंद्रीय राजनीति में सीधे बीजेपी के खिलाफ चेहरा बनने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं रखते या वो ऐसी स्थिति में नहीं हैं. शरद पवार से पहले महाराष्ट्र विकास अघाड़ी की अगुवाई कर रही शिवसेना के नेता संजय राउत और आदित्य ठाकरे से भी मिली हैं. आश्चर्य नहीं होगा कि आने वाले वक्त में ममता बनर्जी तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन, तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव, ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक या बिहार में मजूबत विपक्ष का चेहरा बने तेजस्वी यादव से भी मुलाकात करें. केसीआर और पटनायक भले ही महत्वपूर्ण मुद्दों पर मोदी सरकार को समर्थन देते आए हों, लेकिन ओडिशा और तेलंगाना में बीजेपी जिस तरह मजबूत हुई है- उन्हें पता है कि ज्यादा अनदेखी उनके सियासी वजूद के लिए खतरा बन सकती है.

कांग्रेस को विपक्ष के नेतृत्व का मौका न देने वालों का तर्क यह भी है कि 2014 और 2019 में लगातार दो आम चुनाव में जिन सीटों पर कांग्रेस सीधे बीजेपी के मुकाबले टक्कर में थी, उनमें से 90 फीसदी सीटें भगवा दल की झोली में गिरी हैं. 2019 में कांग्रेस शासित राज्यों राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश में भी पार्टी बुरी तरह हारी. यानी मोदी के मुकाबले में कांग्रेस को जनता ने स्वीकार नहीं किया. भले ही विधानसभा चुनाव में अशोक गहलोत, अमरिंदर सिंह ( अब कांग्रेस छोड़ चुके हैं) के रूप में कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को जनता ने सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया. केरल में यूडीएफ गठबंधन की अगुवाई कर रही कांग्रेस ने सत्ता गंवाई जबकि झारखंड, तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां दूसरे दल कांग्रेस के हिस्सेदारी वाले गठबंधन की अगुवाई कर रहे थे, वहां कामयाबी मिली.

मौजूदा माहौल के हिसाब से 2024 में बीजेपी की खराब से खराब सियासी संभावनाओं के बारे में अगर सोचा जाए तो यही माना जा सकता है कि बीजेपी बहुमत से दूर अगर 160-170 से 210-220 के बीच कहीं अटक गई तो विपक्ष के लिए संभावनाएं बन सकती हैं. इन उम्मीदों का सबसे बड़ा सहारा है कि एनडीए- जिसमें कभी 20-21 दल हुआ करते थे, उसमें अब गिनी-चुनी राजनीतिक पार्टियां ही रह गई हैं. यानी अगर देश में सीधे बीजेपी के खिलाफ माहौल बनता है तो उसे आसानी से जमीन पर लाया जा सकता है.
 
तर्क यह भी है कि भले ही कांग्रेस मोदी विरोधी इस खेमे का अभी हिस्सा बनने को स्वीकार न करे, लेकिन  2024 के बाद कांग्रेस का कमोवेश यही प्रदर्शन रहता है तो कथित सेकुलर गठबंधन और बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए ममता के खेमे को समर्थन देने के अलावा कोई और चारा उसके पास नहीं रहेगा. ऐसी ही सियासी मजबूरी के तहत कांग्रेस महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी के साथ गठबंधन सरकार चला रही है. फिर चाहे इसका सबसे ज्यादा सियासी नुकसान उसे ही उठाना पड़ रहा हो.

इस दौड़ में एक अन्य दावेदारी अखिलेश यादव की हो सकती है, अगर वो 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में मोदी और योगी के तौर पर बीजेपी की सबसे लोकप्रिय जोड़ी को हराकर सत्ता में पहुंचते हैं तो और उसी लोकप्रियता को कायम रखते हुए अखिलेश अगर 80 लोकसभा सीटों वाले राज्य में 50-60 सीटें जीतते हैं तो कद्दावर विपक्षी नेताओं की लड़ाई में बाजी उनके हाथ भी लग सकती है.

बहरहाल, यूपी में सपा-बसपा और सपा-कांग्रेस के राजनीतिक प्रयोग को झटका मिलने के बाद ही इन दलों का अलग होकर ताल ठोकना बीजेपी के लिए सबसे मुफीद साबित हो रहा है. सपा की ओर से जया बच्चन द्वारा बंगाल चुनाव में बीजेपी के खिलाफ प्रचार करना और अब टीएमसी द्वारा यूपी चुनाव में उसके प्रति सहानुभूति दिखाना  (सांकेतिक या प्रतीकात्मक ही सही) भी सोची समझी साझा रणनीति का हिस्सा है.

उधर, कांग्रेस ये दलील दे रही है कि आम चुनाव में बीजेपी को 33 फीसदी वोट के बाद उसे सबसे ज्यादा 20 फीसदी वोट हासिल हुए थे, भले ही उसे सीटों में फायदा न हुआ हो. लेकिन विरोधी कह रहे हैं कि कांग्रेस को इसमें ज्यादातर वोट बड़ी आबादी वाले उत्तर भारतीय राज्यों में मिला, जहां ज्यादातर जगहों उसका सीधा मुकाबला बीजेपी था. लेकिन जनता ने उसे विकल्प नहीं माना.

कांग्रेस भले ही नेतृत्व के मसले को यूपी चुनाव तक टालने में सफल रही हो लेकिन नतीजे उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहते हैं तो गांधी परिवार के लिए बीजेपी के विकल्प की स्वाभाविक दावेदारी को वैचारिक तौर पर भी आगे और खींच पाना दुष्कर होगा. यूपी के बाद उसे गुजरात में बीजेपी का सामना करना है, जहां ढाई दशकों से मोदी की पार्टी काबिज है और कांग्रेस के पास ऐसे मजबूत चेहरे नहीं बचे हैं, जो अपनी सीट भी बचा सकें.

इन तर्क-वितर्कों के बीच बड़ा सवाल है कि क्या पश्चिम में बीजेपी के गढ़ गुजरात से निकले मोदी-शाह की जोड़ी को मात देने के लिए पूरब से निकलीं ममता दिल्ली तक पहुंच पाएंगी?

(अमरीश कुमार त्रिवेदी ndtv.in में डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर हैं)

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