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देहरादून में कौन लेकर आया था नीला गुलमोहर, कहां से आया था भारत

मेघा प्रकाश
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 13, 2026 15:20 pm IST
    • Published On मई 13, 2026 15:19 pm IST
    • Last Updated On मई 13, 2026 15:20 pm IST
देहरादून में कौन लेकर आया था नीला गुलमोहर, कहां से आया था भारत

जैकारंडा (Jacaranda) को औपनिवेशिक काल में अंग्रेज एक सजावटी पेड़ के रूप में उत्तराखंड लेकर आए थे. मूल रूप से दक्षिण अमेरिका का यह पेड़,1841 में कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के रास्ते भारत आया था. इन्हें मुख्य रूप से 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश निवासियों और प्रशासकों ने अपने विशाल बंगलों और बगीचों को सुंदर बनाने के लिए लगाया था.

आज के उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और आसपास के पहाड़ी इलाकों में जैकारांडा मिमोसिफ़ोलिया के विस्तार में डॉक्टर विलियम जेमिसन ने अहम योगदान दिया. वो एक स्कॉटिश सर्जन और बॉटनिस्ट थे. वो 1842 से 1875 तक सहारनपुर बॉटनिकल गार्डन के सुपरिटेंडेंट के रूप में तैनात रहे. जेमिसन के नेतृत्व में, सहारनपुर बॉटनिकल गार्डन उत्तर भारत में विदेशी पौधों को यहां के माहौल के अनुकूल बनाने का मुख्य केंद्र बन गया था. जेमिसन ने इस गार्डन का इस्तेमाल हज़ारों विदेशी पेड़ों की पौध उगाने और उन्हें वितरित करने के लिए किया. इनमें जैकारांडा भी शामिल था. उन्होंने खास तौर पर जैकारांडा को दून घाटी और निचले हिमालयी क्षेत्रों की उप उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए उपयुक्त पाया. उन्होंने वसंत के मौसम में छाया और सुंदरता दोनों देने के लिए सड़कों के किनारे और औपनिवेशिक इमारतों के परिसर में जैकारांडा लगाने को बढ़ावा दिया. वे इस इलाके में कंपनी बाग़ों (कंपनी गार्डंस) को बनाने और उनकी देखरेख में शामिल थे. इनमें मसूरी का कंपनी गार्डन भी शामिल है, जो इन विदेशी फूलों को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन केंद्र बन गया. 

सहारनपुर से कैसे फैला जैकारांडा 

जेमिसन ने सहारनपुर से लेकर उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में मौजूद ब्रिटिश प्रशासनिक चौकियों और पहाड़ी इलाकों तक जैकारांडा के बीज और पौधे पहुंचाने के लिए एक व्यवस्थित नेटवर्क तैयार किया. उनके प्रयासों की बदौलत ही मसूरी और शिमला जैसी ग्रीष्मकालीन राजधानियां यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी प्रजातियों के फूलों से सज-धज गईं. इससे वहां अंग्रेज़ी बाग़ों जैसा नज़ारा देखने को मिला.

जेमिसन की विरासत आज भी शहर के ऐतिहासिक औपनिवेशिक इलाकों में लगे सदियों पुराने जैकारांडा के पेड़ों के रूप में देखी जा सकती है. डालनवाला के जैकारांडा के पेड़ देहरादून की औपनिवेशिक विरासत की एक खास पहचान हैं. डालनवाला को मूल रूप से बड़े-बड़े भूखंडों वाले एक आवासीय क्षेत्र के रूप में बसाया गया था. इनमें से कई सबसे पुराने जैकारांडा के पेड़ या तो पुराने ज़माने के बंगलों के निजी अहातों में लगे हुए हैं या फिर कर्ज़न रोड और ओल्ड सर्वे रोड जैसी ऐतिहासिक सड़कों के किनारे कतारों में खड़े हैं.

कब खिलता है नीला गुलमोहर

मार्च के अंत से लेकर मई की शुरुआत तक, जब इन पेड़ों पर पूरे ज़ोर पर फूल खिलते हैं तो डालनवाला में पेड़ों की यह घनी जमावट एक जीवंत 'बैंगनी छतरी' का निर्माण करती है. यह छतरी इस क्षेत्र की शांत और हरी-भरी गलियों को पूरी तरह से ढक लेती है. इस इलाके के जाने-माने शिक्षण संस्थान जैसे कि वेल्हम बॉयज़ स्कूल और सेंट जोसेफ़ एकेडमी अपने ऐतिहासिक रास्तों के लिए मशहूर हैं. इनके दोनों ओर जैकारांडा के पेड़ लगे हैं. ईसी रोड से डालनवाला की ओर जाने वाला रास्ता फ़ोटोग्राफ़रों के बीच तब ज़्यादा लोकप्रिय हो जाता है. स्थानीय निवासी अक्सर इन गिरते हुए बैंगनी फूलों को बदलते मौसम का संकेत मानते हैं. इस अद्भुत प्राकृतिक घटना को प्यार से 'प्रकृति का बैंगनी उत्सव' (Nature's Purple Festival) नाम दिया गया है.

(डिस्क्लेमर: लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और देहरादून में रहती हैं. वो पर्यावरण और समाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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