दुनिया आज जिस अस्थिर और संवेदनशील दौर से गुजर रही है, उसने स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या मानवता तृतीय विश्व युद्ध की ओर अग्रसर है? बीसवीं सदी के दो महायुद्धों ने सभ्यता को जो घाव दिए, उनकी स्मृति अभी भी वैश्विक चेतना में जीवित है. किंतु इक्कीसवीं सदी की राजनीति, तकनीक और सैन्य शक्ति का स्वरूप कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है. आज युद्ध केवल सीमाओं पर सैनिकों के टकराव तक सीमित नहीं, बल्कि साइबर स्पेस, अंतरिक्ष, ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक वित्त और सूचना तंत्र तक फैल चुका है. यही कारण है कि क्षेत्रीय संघर्षों का विस्तार वैश्विक अस्थिरता में बदलने की आशंका को जन्म देता है.
यूरोप को भी लगा है झटका
सन् 2022 से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा संरचना को झकझोर दिया है. रूस और यूक्रेन के बीच यह संघर्ष प्रत्यक्ष रूप से दो देशों का युद्ध है, किंतु परोक्ष रूप से इसमें नाटो और विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका इसे महाशक्तियों के बीच शक्ति-संघर्ष का रूप देती है. पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए व्यापक आर्थिक प्रतिबंध और यूक्रेन को दी जा रही सैन्य सहायता ने यह संकेत दिया है कि यह केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा है. रूस द्वारा समय-समय पर परमाणु संकेत देना स्थिति को और अधिक गंभीर बनाता है. यद्यपि अब तक प्रत्यक्ष नाटो-रूस युद्ध टला हुआ है, किंतु तनाव की निरंतरता विश्व शांति के लिए चुनौती बनी हुई है.
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पश्चिम एशिया की स्थिति खतरनाक
पश्चिम एशिया की स्थिति और भी विस्फोटक प्रतीत होती है. अक्टूबर 2023 से प्रारंभ हुआ इज़राइल-हमास युद्ध केवल गाजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है. इज़राइल और हमास के बीच संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय ध्रुवीकरण को तेज किया है. सबसे चिंताजनक आयाम तब सामने आया जब ईरान और इजरायल के बीच प्रत्यक्ष हमले और जवाबी कार्रवाई की घटनाएं सामने आई. दशकों से चल रहा 'छाया युद्ध' अब खुले टकराव में बदलता दिखा. ईरान लंबे समय से क्षेत्रीय समूहों-जैसे हिज़्बुल्लाह को समर्थन देता रहा है, जबकि इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है. यदि यह टकराव पूर्ण युद्ध में बदलता है और अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से इज़राइल के पक्ष में सक्रिय होता है, तो स्थिति वैश्विक स्वरूप ले सकती है. फारस की खाड़ी विश्व ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है; वहां किसी बड़े सैन्य संघर्ष का अर्थ होगा तेल की कीमतों में उछाल, आपूर्ति संकट और वैश्विक मंदी का खतरा.
ताइवान को लेकर भी चिंता
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन और ताइवान के बीच बढ़ता तनाव भी व्यापक संघर्ष की आशंका को जन्म देता है. चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है, जबकि ताइवान लोकतांत्रिक शासन के साथ अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहता है. अमेरिका ताइवान को सामरिक समर्थन देता रहा है। यदि ताइवान जलडमरूमध्य में सैन्य टकराव होता है, तो जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी प्रभावित हो सकते हैं. इससे वैश्विक व्यापार, विशेषकर सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला, बुरी तरह प्रभावित होगी.
दुनिया में हो रहा है ध्रुवीकरण
इन सभी घटनाओं के बीच विश्व राजनीति में ध्रुवीकरण स्पष्ट दिखाई देता है. एक ओर अमेरिका और उसके सहयोगी देश हैं, दूसरी ओर रूस और चीन के बीच बढ़ता सामरिक समीकरण है. ब्रिक्स जैसे मंच वैश्विक शक्ति-संतुलन में परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं. आर्थिक प्रतिबंध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, साइबर युद्ध और अंतरिक्ष में सैन्य तैयारियाँ यह दर्शाती हैं कि संघर्ष का स्वरूप बहुआयामी हो चुका है. फिर भी यह भी सच है कि आज की दुनिया 1914 या 1939 जैसी नहीं है. परमाणु हथियारों की मौजूदगी ने बड़े युद्ध की कीमत असहनीय बना दी है. 'परस्पर सुनिश्चित विनाश' का सिद्धांत महाशक्तियों को प्रत्यक्ष टकराव से रोकता है. संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंच संवाद और कूटनीति के अवसर प्रदान करते हैं, भले ही उनकी प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते रहे हों.
वैश्विक बाजारों पर क्या असर?
आर्थिक परस्पर निर्भरता भी एक महत्वपूर्ण कारक है. अमेरिका और चीन जैसी प्रतिद्वंद्वी शक्तियां भी व्यापार और निवेश के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ी हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इज़राइल तनाव ने यह दिखाया है कि किसी क्षेत्रीय संघर्ष का असर तुरंत वैश्विक बाजारों पर पड़ता है- ऊर्जा कीमतों से लेकर खाद्य सुरक्षा तक. कोविड-19 महामारी के बाद विश्व अर्थव्यवस्था अभी पूर्ण रूप से स्थिर भी नहीं हो पाई है; ऐसे में व्यापक युद्ध किसी भी राष्ट्र के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है.
भारत ने अपनाई है संतुलित नीति
ऐसे जटिल समय में भारत जैसी उभरती शक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट दोनों में संतुलित कूटनीति अपनाई है. वह इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी रखता है और ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग भी बनाए हुए है। भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति उसे वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच संवाद सेतु बनने का अवसर देती है.
क्या दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रहा होगा?
अंततः यह कहना कठिन है कि विश्व अनिवार्य रूप से तृतीय विश्व युद्ध की ओर बढ़ रहा है. वर्तमान परिस्थितियां निस्संदेह चिंताजनक हैं- यूक्रेन का युद्ध, गाजा का संघर्ष, ईरान-इज़राइल टकराव और चीन ताइवान तनाव- ये सभी संभावित रूप से एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं. किंतु साथ ही परमाणु संतुलन, आर्थिक परस्पर निर्भरता और सक्रिय कूटनीति अभी भी वैश्विक विनाश को रोकने वाले कारक बने हुए हैं. मानवता के सामने विकल्प स्पष्ट है- संघर्ष की राह या सहयोग की दिशा. यदि विश्व नेतृत्व दूरदर्शिता, संयम और संवाद का मार्ग अपनाता है, तो तृतीय विश्व युद्ध केवल आशंका भर रहेगा. किंतु यदि राष्ट्र अहंकार और विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं में उलझे रहे, तो इतिहास स्वयं को दोहरा सकता है. आज की चुनौती यही है कि भय को यथार्थ न बनने दिया जाए.
(इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है )