तो एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है। वो दिन जब दुनिया की आधी आबादी, हमारे देश की आधी आबादी, उसको मिल रहे मान-सम्मान, अधिकार, सहूलियतों को टटोलती, उनको आंकती है। 1911 से 8 मार्च महिला दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है और आज 105 साल बाद भी कोशिशें और सघर्ष जारी है।
सरकारें अनेकों योजनाएं लाती रही हैं, कोशिशें करती रही हैं लेकिन उनका असर हमारे देश के ग्रामीण इलाकों तक पहुंचने का इंतजार लम्बा है। क्योंकि 8 मार्च आते आते तरह तरह के आंकड़े आने लगते हैं जो जमीन पर हो रहे महिलाओं के विकास और समाज में पुरुष सत्ता के दबाव को बनाए रखते हैं।
एक सर्वे के अनुसार 90 प्रतिशत महिलाएं अपने जेंडर को देख कर अपना करियर चुनती हैं। शहरों में टीचिंग तो गांवों में खेती। ग्रमीण इलाकों में महिलाओं को किसान का दर्जा भी नहीं मिलता। खराब खेती के कारण अगर वो आत्महत्या भी कर लेती हैं तो उसको मुआवजा तक नसीब नहीं होता। एक अन्य आंकड़े के अनुसार ग्रमीण भारत में अगर 100 लड़कियां पहली कक्षा में दाखिला लेती हैं तो सिर्फ 1 ही 12वीं तक पंहुच पाती है। वहीं शहरो में 100 में सिर्फ 14 ही 12वीं तक की मंजिल तय कर पाती है।
पूरे देश में करीब 70 फीसदी लड़कियां 10वीं से पहले स्कूल छोड़ देती हैं। राजनीति की बात करें तो हमारी संसद में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 12 प्रतिशत है, दुनिया भर में 22 प्रतिशत से ज्यादा है।
लेकिन ऐसा नहीं है कि हमारे देश में महिलाएं सफलता के किसी पैमाने पर पीछे हैं। अब तो लगभग हर कार्यक्षेत्र में अव्वल दर्जा हासिल करती हैं लेकिन चिन्ता ये है कि इनकी संख्या बहुत कम है। हमारे देश में उड्डयन क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। दुनिया भर में उड्डयन क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 3 प्रतिशत है तो हमारे देश में करीब 12 प्रतिशत। आज तो घोषणा भी हो गई कि वायुसेना में जून 18 से महिलाएं लड़ाकू विमान भी चलाएंगी। प्रोफेशनल सेक्टर में महिलाएं 10 में से 1 कम्पनी में ही प्रमुख के तौर पर कार्यरत हैं लेकिन इनमें आधी वित्तीय क्षेत्र की हैं।
तो बराबरी की लम्बी दूरी तय करने में हौसला बना रहे इसलिए एक सोच के साथ बढ़ा जा सकता है कि हम उस हर दरवाजे पर दस्तक देते रहेंगे जो मदद दे। लेकिन तब तक जो महिलाएं अपने कार्यक्षेत्र में आगे निकल चुकी हैं, सफल हो चुकी हैं, वो अपने साथ और अपने पीछे खड़ी हुई महिलाओं के बारे में सोचें, उनकी सुनें, प्रोत्साहित करें, जिससे इनमें भरोसा और आत्मविश्वास बना रहेगा। चाहे वो ऑफिस में काम करने वाली साथी हो, दोस्त हो या फिर घर में आपके घर के काम को सम्भालने वाली। इसके लिए पैसों नहीं सिर्फ एक सकारात्मक सोच की ज़रूरत है, जिससे सफल होने का इंतजार आसान हो जाएगा।
(निधि कुलपति एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर हैं)
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This Article is From Mar 08, 2016
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : 105 साल बाद भी संघर्ष जारी
Nidhi Kulpati
- ब्लॉग,
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Updated:मार्च 08, 2016 22:02 pm IST
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Published On मार्च 08, 2016 21:53 pm IST
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Last Updated On मार्च 08, 2016 22:02 pm IST
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