नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 12 साल पूरे कर लिए हैं. इस अवसर पर लिखे पहले लेख में मैंने 'मोदीनॉमिक्स' की नींव पर बात की थी यानी कि अर्थव्यवस्था का दोगुना होना, महंगाई पर काबू, घाटे पर नियंत्रण और कैपिटल एक्सपेंडिचर का छह गुना तक बढ़ जाना. वहीं दूसरे हिस्से में मैंने मोदी सरकार के सेमीकंडक्टर मिशन और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) की बात की. अब बारी है असली आकलन की, तिमाही नतीजों से हटकर यह सोचने की कि इन 12 सालों का असल नतीजा क्या रहा और सबसे जरूरी बात यह है कि अगले 12 साल की मांग क्या होगी.
किन सुधारों पर टिकी है मोदी सरकार में अर्थव्यवस्था
दरअसल 'मोदीनॉमिक्स' पांच अहम सुधारों पर टिका है, जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल कर रख दिया है. इनमें पहला है पहला है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी). इसे लागू करने में हुई गड़बड़ियों और दरों को लेकर चले विवाद के बाद भी इसने वह काम किया जो आजाद भारत के सात दशक में भी नहीं हुए थे. इसने राज्यों के अलग-अलग टैक्स को एक राष्ट्रीय बाजार में बदल दिया. दूसरा है इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी), जिसने उधार लेने वाले और उधार देने वाले के बीच शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया, कंपनियों के लिए बाजार से बाहर निकलना मुमकिन बनाया और बैंकों को अपनी उन बैलेंस शीट की साफ-सफाई करने का मौका दिया जो सालों से अटकी हुई थीं. तीसरा है आधार, यूपीआई और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर.यह वह सिस्टम है, जिसने अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाया, बिचौलियों को हटाकर लोगों तक सरकारी मदद पहुंचाई. विकासशील देशों में इसका एक मॉडल के तौर पर अध्ययन होता है. चौथा है मजदूरों को लकेर 29 उलझे हुए केंद्रीय कानूनों को चार कोड में बदल देना. यह इस दौर का सबसे अहम सुधार है, जिसे पांच साल तक अटके रहने के बाद नवंबर 2025 में लागू किया गया. अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाए, तो ये कोड भारतीय कंपनियों के लिए बड़े पैमाने पर काम करने और औपचारिक रूप से लोगों को नौकरी पर रखने को फायदेमंद बना सकते हैं, बजाय इसके कि वे सरकारी नियम-कानून से बचने के लिए खुद को छोटी बताती रहें. इससे बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं, जिनकी लंबे समय से कमी रही है. पांचवां है इंडस्ट्रियल पॉलिसी में बदलाव- 'मेक इन इंडिया' और 'प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव' (पीएलआई) के जरिए मैन्युफैक्चरिंग के किसी खास सेक्टर में निवेश करना. इससे पहले भारतीय नीति-निर्माताओं ने दशकों तक इसके लिए कई आधे-अधूरे प्रयास किए थे. इन पांच चीजों में एक बात कॉमन है, वह दिखावे की जगह असल काम पर जोर देना.'मोदीनॉमिक्स' की असली पहचान है, बिना दिखावे वाला काम, जैसे पाइप बिछाना, जिसकी अहमियत एक दशक बाद ही पता चलती है.

अपनी सरकार के 12 साल पूरे होने पर आयोजित कैबिनेट बैठक में साथियों का आभार जताते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
क्या चाहता है भारत का युवा
भारत एक युवा और महत्वाकांक्षी देश है, जहां अब उद्देश्य केवल राहत पाना नहीं, बल्कि आगे बढ़ना है. पूर्वांचल के किसी शहर का युवा सिर्फ सौ दिन की पक्की खुदाई का काम नहीं चाहता, वह ऐसी नौकरी चाहता है जिसके लिए उसे सूरत या लुधियाना जाने वाली ट्रेन न पकड़नी पड़े. जिस परिवार के पास अब बैंक अकाउंट, गैस कनेक्शन और पक्की छत है, वह गुजारे-लायक ज़िंदगी से आगे निकल चुका है और अब अगली चीजें चाहता है, ऐसा स्कूल जहां पढ़ाई हो, ऐसी क्लिनिक जो ठीक से काम करे, खेती के अलावा भी कमाई का जरिया और बेटी के लिए ऐसा भविष्य जो उसकी दादी के भविष्य जैसा न हो. 'मोदीनॉमिक्स' ने एक बुनियादी ढांचा तैयार किया है. अब ग्रामीण भारत को आगे बढ़ने के लिए सीढ़ियों की जरूरत है. सम्मान और विकास की मांग न कि सिर्फ सुरक्षा घेरा, यह उपलब्ध कराना आने वाले दशक की राजनीतिक और आर्थिक परीक्षा होगी.
इसे पूरा करने के लिए ऐसे सुधारों की जरूरत है, जो कल के भारत की तस्वीर बनाएंगे यानी 'सेकंड-जेनरेशन'(अगले दौर) के सुधार. जमीन अधिग्रहण, जो किसी भी फैक्ट्री या सड़क के लिए हमेशा से एक बड़ी अड़चन रहा है. यह एक ऐसे समाधान का इंतजार कर रहा है, जो अब तक किसी सरकार को नहीं मिल पाया है. खेती के क्षेत्र में मार्केटिंग से जुड़े सुधारों की जरूरत है, एक ऐसा सुधार जिसकी कोशिश इस सरकार ने भारी राजनीतिक कीमत चुकाकर की थी, लेकिन आखिरकार उसे पीछे हटना पड़ा. कॉन्ट्रैक्ट को लागू करना और अदालती कार्यवाही में देरी, जो हर निवेश के फैसले पर एक तरह का छिपा हुआ टैक्स है. ये ऐसी चीजें हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है और कोई भी इंसेंटिव स्कीम इनकी जगह नहीं ले सकती है. निजीकरण और एसेट मॉनेटाइजेशन (संपत्ति से कमाई) का अधूरा काम यह परखेगा कि क्या सरकार उन जगहों से पीछे हटने को तैयार है, जहां उसे अब लीड करने की जरूरत नहीं है. ये सुधार पहले दशक के सुधारों से ज्यादा मुश्किल हैं, क्योंकि ये ज्यादा राजनीतिक हैं, लेकिन यही वो अंतर है जो विकसित हो रही अर्थव्यवस्था और पूरी तरह बदल रही अर्थव्यवस्था में होता है.

नरेंद्र मोदी सरकार को अब भविष्य के भारत की बुलंद तस्वीर बनानी होगी.
क्या निवेशकों की पहली पसंद बनेगा भारत
इस सीरीज के आखिर में मुख्य बात यह है कि भारत को केवल सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि ग्लोबल कैपिटल (वैश्विक निवेश) की पहली पसंद बनने के लिए क्या करना होगा? कैपिटल हमेशा विकास और निश्चितता की ओर भागता है. जो देश लंबे समय के लिए टिकाऊ निवेश हासिल करता है, वह वही होता है जो बिना किसी अचानक बदले हुए पुराने टैक्स नियमों के, अनुमान लगाने लायक टैक्स सिस्टम, सालों के बजाय महीनों में विवाद सुलझाने की व्यवस्था, अपनी मर्जी से आने-जाने लायक मजबूत कैपिटल मार्केट और स्थिर रेगुलेटरी माहौल देता है. भारत के पास सही डेमोग्राफिक्स (जनसांख्यिकी), इंजीनियर, 'चाइना-प्लस-वन' का मौका और अब ट्रेड एक्सेस भी है. अब उसे बस एक कमी को पूरा करना है, वह है निश्चितता- टैक्स में अचानक बदलाव लाने और नीतियों को बदलने के दौर को पूरी तरह खत्म करना है, ऐसी न्यायपालिका जो बिजनेस की रफ्तार से कॉन्ट्रैक्ट लागू करे और ऐसी निरंतरता जिससे सिंगापुर का कोई फंड मैनेजर या स्टटगार्ट का कोई बोर्ड बिना किसी हिचकिचाहट के एक दशक के लिए निवेश करने का फैसला ले सके.
इन तीनों हिस्सों का निचोड़ यह है कि जिस अर्थव्यवस्था को इस सरकार के आने से ठीक एक साल पहले 'फ्रैंजाइल फाइव' (पांच कमजोर अर्थव्यवस्था) में गिना जाता था, आज दुनिया उसी को अपनाना चाहती है. यह कोई मामूली बदलाव नहीं है और न ही यह कोई इत्तेफाक था. इसे बहुत निरंतरता के साथ अंजाम दिया गया- मजबूत नींव बनाना, नई सीमाओं को छूना और ऐसे सिस्टम बनाना जो राजनीति से ऊपर उठकर टिके रहें. चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सफर केवल ग्रोथ रेट से तय नहीं होगा. यह लक्ष्य इस सरकार द्वारा शुरू किए गए सुधारों को पूरा करने और उन सुधारों को करने की हिम्मत दिखाने से हासिल होगा, जिन्हें अब तक टाला गया है. नींव मजबूत है और नई संभावनाएं बुला रही हैं, बस काम पूरा करने के जज्बे की जरूरत है. भारत महत्वाकांक्षा की कमी से नहीं लड़खड़ाएगा, लेकिन वह आगे तभी बढ़ पाएगा जब समृद्धि दूर-दराज के गांवों तक पहुंचे और निश्चितता दूर बैठे बोर्डरूम को भरोसा दिलाए. और अंत में यही लक्ष्य है.
(डिस्क्लेमर: गौरी द्विवेदी एनडीटीवी में राजनीतिक अर्थव्यवस्था की कार्यकारी संपादक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)