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कोरिया रिपब्लिक : फुटबॉल की दुनिया का एशियाई सितारा, कैसे हासिल किया मुकाम

अमित कुमार कड़वासरा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 30, 2026 14:17 pm IST
    • Published On जून 30, 2026 14:17 pm IST
    • Last Updated On जून 30, 2026 14:17 pm IST
कोरिया रिपब्लिक : फुटबॉल की दुनिया का एशियाई सितारा, कैसे हासिल किया मुकाम

कई बार खेल एक देश को इस तरह एकता और खुशी से बांधता है, जो फिर से दोहराना असंभव होता है. कुछ समय के लिए पूरे देश की एक ही पहचान बन जाता है, वो खेल. ऐसा ही कुछ फुटबॉल वर्ल्ड कप 2002 के दौरान साउथ कोरिया में देखा गया, जब साउथ कोरिया की टीम ने सेमीफाइनल में जगह बनाई थी. इसके बाद जून की गर्मी में सियोल शहर की सड़कें लाल रंग से रंग गई थीं, जब फैंस साउथ कोरियन फूटबाल टीम के मशहूर समर्थकों वाली जर्सी 'रेड डेविल्स' पहन कर उतरें. उस भीड़ में बच्चे, बूढ़े और जवान सब शामिल थे. जो उस भीड़ में शामिल नहीं हो पाए, वो अपनी टीवी स्क्रीन के सामने चिल्ला रहे होंगे, 'Dae-han Min-guk', जो कि साउथ कोरिया का कोरियन भाषा में नाम है. पोलैंड, पुर्तगाल, इटली और स्पेन जैसी ताकतवर टीमों को हराकर सेमीफाइनल तक का सफर साउथ कोरियन फैंस के लिए ही नहीं पूरे दुनिया के लिए अविश्वसनीय था. 

कोरियाई टीम का सबसे अच्छा विश्व कप कौन सा था

साल 2002 का वर्ल्ड कप कोरियन फुटबॉल के लिए निश्चित रूप से सबसे बड़ा क्षण था. उन्होंने जापान के साथ मिलकर इस वर्ल्ड कप की मेजबानी की थी. साल 1990 के दशक के आर्थिक संकट से उभर रहे कोरिया की जनता को इस क्षण ने एक साथ जश्न मनाने और गर्व करने का सुनहरा मौका दिया था.

फुटबॉल इस वर्ल्ड कप से पहले भी देश में मशहूर था. लेकिन 2002 वर्ल्ड कप वो पल था, जिसकी सफलता ने साउथ कोरिया के फुटबॉल पावरहाउस बनने में अहम किरदार निभाया. 2002 के बाद साउथ कोरिया के फुटबॉल कल्चर में बड़ा बदलाव देखने को मिला. इसने फुटबॉल में एक बड़ी जगह हासिल करने की उनकी उम्मीदों को बढ़ा दिया. इसके कारण एशिया में सफलता के बाद अब यूरोप में भी कोरियन फुटबॉल की मौजूदगी देखी जा सकती है. इसका एक उदहारण 2024 में देखने को मिला, जब एशियन कप में सफलता नहीं मिली तो टीम के वापस लौटने पर टीम मैनेजर यर्गन क्लिंसमन से रिपोर्टर का पहला सवाल था,''क्या आप इस्तीफा देने का प्लान बना रहे है?'' जबकि टीम ने सेमीफाइनल में जगह बनाई थी. 

साल 2002 के क्वार्टर फाइनल में स्पेन को हराने का जश्न मनाते कोरिया के खिलाड़ी.

साल 2002 के क्वार्टर फाइनल में स्पेन को हराने का जश्न मनाते कोरिया के खिलाड़ी.

कोरिया में कब शुरू हुआ था फुटबॉल

कोरिया में फुटबॉल की शुरुआत 1882 में हुई जब ब्रिटिश सेना का जहाज एचएमएस फ्लाइंग फिश पहली बार फुटबॉल खेल कोरिया लेकर आया. उसके बाद जापानी कोलोनियलिज्म 1910 से 1945 और कोरियन युद्ध 1950 से 1953 के दौरान की कठिन परिस्थितियों में फुटबॉल नहीं पनप पाया. इसलिए 1954 में वर्ल्ड कप डेब्यू के बाद 1986 तक साउथ कोरिया को वर्ल्ड कप में लौटने का इंतजार करना पड़ा. उसके बाद साउथ कोरियन इकॉनमी के साथ-साथ कोरियन फुटबॉल भी उभरकर सामने आया. फुटबॉल इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिया गया और 1983 में घरेलू फुटबॉल की K लीग को शुरू की गई. जल्द ही इसका परिणाम भी देखने को मिला और 1986 के बाद से साउथ कोरिया हमेशा वर्ल्ड कप में उपस्थित रहा है. इसी बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर का नतीजा रहा की 2002 में उनको जापान के साथ वर्ल्ड कप मेजबानी का मौका मिला और साउथ कोरिया वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में जगह बनाने वाली पहली एशियाई टीम बनी. 

कोरिया का स्टार फुटबॉलर

साल 2002 के बाद सबसे खराब वर्ल्ड कप साउथ कोरिया के लिए 2014 का था. जहां उन्होंने एक भी मैच नहीं जीता. पिछली बार ऐसा 1998 में हुआ था. इसी के साथ 2014 में उनकी रैकिंग भी 69वें स्थान तक गिर गई थी. जो उनके लिए रैकिंग शुरू होने के बाद सबसे निचला स्थान था. उस टीम में कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जो टॉप यूरोपीय टीम में खेलता हो. लेकिन उस टीम में 21 साल का एक खिलाड़ी था,जिसका नाम सोन हुंग-मीन था. वह साउथ कोरिया का सबसे बड़ा स्टार बनने वाला था. सोन के अलावा इस वर्ल्ड कप में टीम में दो ऐसे खिलाड़ी भी हैं, जो टॉप यूरोपीय क्लबों में खेलते हैं. पेरिस सेंट-जर्मेन से ली कांग-इन और बायर्न म्यूनिख से किम मिन-जे हैं. यह फुटबॉल वर्ल्ड में साउथ कोरिया के उभर कर एक बड़ी ताकत बनने को दर्शाता है.

सोन हुंग मीन दक्षिण कोरिया के सबसे सफल फुटब़लर में से एक हैं, वो इंग्लिश प्रिमियर लीग में गोल्डन बूट जीत चुके हैं.

सोन हुंग मीन दक्षिण कोरिया के सबसे सफल फुटब़लर में से एक हैं, वो इंग्लिश प्रिमियर लीग में गोल्डन बूट जीत चुके हैं.

सोन जैसी लोकप्रियता कम ही खिलाड़ी हासिल कर पाते हैं. कम ही खिलाड़ी होंगे जिन्होंने पिछले 10 सालों में अपने देश के फुटबॉल को उस तरह बदला हो जिस तरह सोन ने बदला है. उन्होंने विश्व स्तर पर इस बात को गलत साबित कर दिया कि एशियाई खिलाड़ी वर्ल्ड क्लास फुटबॉलर नहीं हो सकते हैं. विश्व की सबसे कठिन लीग इंग्लिश प्रीमियर लीग में उन्होंने 'गोल्डन बूट' जीता. जब सोन ने प्रीमियर क्लब टोटेनहम हॉटस्पर के लिए खेलना शुरू किया तो उनकी वजह से लाखों लोग इस क्लब के फैन बन गए.बॉर्डकास्टर्स को अपने प्रोग्राम हॉटस्पर टीम के मैचों के अनुसार बदलने पड़े. सोन की लोकप्रियता इतनी अधिक है कि साउथ कोरिया में कोई भी खेल इवेंट हो वहां पर सोन की फुटबॉल जर्सी पहने लोग जरूर नजर आएंगे. साल 2020 में हुई एक स्टडी में अनुमान लगाया गया था कि सोन के नाम से चलने वाले व्यवसायिक इकनॉमी की कीमत करीब 1.5 अरब डॉलर होगी.

कोरिया में क्यों लोकप्रिय है फुटबॉल

साउथ कोरिया के लोगों को फुटबॉल से इतना लगाव को लेकर एक्सपर्ट्स की राय दिलचस्प है. उनका मानना है कि कोरिया का कल्चर साझा इतिहास और सामाजिक एकता को बहुत अहमियत देता है. कोरियाई लोगों में एक सामूहिक एकता है, इसलिए फुटबॉल लोगों के बीच काफी मशहूर है. कोरियाई टीम का स्लोगन है Pilseung Korea, जिसका अर्थ होता है-हम जीतेंगे.इसमें भी सामूहिक एकता की भावना को देखा जा सकता है. 

इसके अलावा हर वर्ल्ड कप के लिए समर्थक एक ऑफिशियल स्लोगन अपनाते हैं, जिसकी शुरुआत बहुत पॉपुलर 'बी द रेड्स' से हुई. इसे 2002 में ऑफिशियल सपोर्टर्स क्लब, द रेड डेविल्स के जरिए बहुत ज्यादा पहचान मिली. 2006 के लिए 'रेड्स गो टुगेदर' और 2010 के लिए  'रोड ऑफ विक्ट्री, यूनाइटेड कोरिया' था. 2014 में ब्राजील में ‘एन्जॉय कोरिया' था लेकिन जैसा प्रदर्शन उनका रहा उसे देखते हुए तो किसी ने भी एन्जॉय नहीं किया होगा. 2018 में 'वी आर द रेड्स' और पिछले वर्ल्ड कप में 'हॉटर, द रेड्स' था.

इस विश्व कप में मिली असफलता के बाद कोरिया के कोच ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

इस विश्व कप में मिली असफलता के बाद कोरिया के कोच ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

इस वर्ल्ड कप में साउथ कोरिया ने एक जीत और दो हार के बाद ग्रुप स्टेज में तीसरे स्थान पर टूर्नामेंट खत्म किया. दूसरी टीमों के परिणाम उनके पक्ष में जाते तो वो अंतिम 8 के रुप में नाकआउट स्टेज के लिए क्वालीफाई कर सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वो टूर्नामेंट से बाहर हो गए. भले ही नाकआउट में वो इंटर नहीं कर पाए हो लेकिन वर्ल्ड कप में लगातार उनकी उपस्थिति उनकी वर्ल्ड फुटबॉल में उनकी बड़ी ताकत को दर्शाता है.इस निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कोरियाई फुटबॉल में बड़े बदलाव देखे जाएंगे जिनकी शुरुआत टीम कोच होंग मंयुगबो के इस्तीफे से हो चुकी है. 

(डिस्क्लेमर: लेखक फ्रीलान्स राइटिंग और स्पोर्ट्स कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में पिछले छह साल से काम कर रहे हैं. उनकी दिलचस्पी क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों को फॉलो करने के साथ-साथ खेल और खिलाड़ियों का विश्लेषण करने में रही है. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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