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भारतीय लोकतंत्र में 'हीरो' बनते नेता और जनता का सवाल पूछने का अधिकार

सुभाष कुमार ठाकुर
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 27, 2026 18:41 pm IST
    • Published On जुलाई 27, 2026 18:41 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 27, 2026 18:41 pm IST
भारतीय लोकतंत्र में 'हीरो' बनते नेता और जनता का सवाल पूछने का अधिकार

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा है, ​''अब मुझे हीरो मत बनाना, एक शख्स को हीरो बनाने की वजह से ही देश बर्बाद हुआ है.'' यह सिर्फ दीपके की व्यक्तिगत आपत्ति नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और समाज की मनोवृत्ति पर एक चौंकाने वाली टिप्पणी है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में हमारी पहचान तो पूरी दुनिया में है, लेकिन जब हम इसके भीतर की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली और नागरिकों की मानसिकता को गहराई से देखते हैं, तो एक अजीब सी विरोधाभासी तस्वीर सामने आती है. लोकतंत्र की बुनियाद इस विचार पर टिकी है कि सरकार जनता की है, जनता द्वारा है और जनता के लिए है. यानी नागरिक इस व्यवस्था के केंद्र में हैं और जनप्रतिनिधि उनके प्रतिनिधि मात्र हैं. लेकिन व्यावहारिक धरातल पर दृश्य बिल्कुल उल्टा नजर आता है. हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह बन चुकी है कि हमने सरकारों को नीतियों और प्रदर्शन की कसौटी पर आंकना छोड़ दिया है. उल्टे हमने राजनेताओं को भगवान का दर्जा दे दिया है.

यह प्रवृत्ति किसी एक पार्टी या विचारधारा तक सीमित नहीं है. किसी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में ईश्वर का रूप दिखता है, तो किसी को राहुल गांधी में उम्मीद का मसीहा. राज्यों के स्तर पर देखें तो क्षेत्रीय राजनेताओं के प्रति भी समर्थकों का रवैया किसी पंथ के अनुयायियों जैसा ही होता है. ऐसे में दोष केवल राजनेताओं में नहीं है, बल्कि उस मानसिकता में भी है जो एक हाड़-मांस के इंसान और जनप्रतिनिधि को आराध्य बना देती है.

लोकतंत्र में जनता के सवाल

सवाल यह है कि जब आप किसी इंसान को अपना आराध्य या पूजनीय बना लेते हैं, तो क्या आप कभी उससे सवाल पूछ सकते हैं? उत्तर है, नहीं. क्योंकि ईश्वर के फैसलों पर तर्क नहीं किए जाते, उन्हें केवल स्वीकार किया जाता है. और यही मानसिकता जब राजनीति में प्रवेश करती है तो लोकतंत्र की आत्मा का दम घुटने लगता है. वही लोकतंत्र धीरे-धीरे तानाशाही की ओर चल पड़ता है. आस्था में सवाल पूछना अपराध माना जाता है, जबकि लोकतंत्र में सवाल न पूछना सबसे बड़ा अपराध है. जब समर्थक अपने नेता को हर गलती के बावजूद सही ठहराने के लिए कुतर्क करने लगते हैं, जब सत्ता या विपक्ष के नेताओं की नाकामियों को 'मास्टरस्ट्रोक' या 'मजबूरी' का नाम देकर सही ठहराया जाता है, तब जवाबदेही वहीं हो जाती है. जब आप सवाल ही नहीं करेंगे, तो फिर किसी नेता से यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वह अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाए?

पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं के खिलाफ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करती जनता.

पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं के खिलाफ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करती जनता.
Photo Credit: PTI

इसी अंधभक्ति का परिणाम है कि हमारे देश में 'जनसेवक' शब्द सिर्फ राजनीतिक भाषणों तक सिमट कर रह गया है. जनता के इसी भक्ति भाव ने राजनेताओं को यह अहसास करा दिया है कि वे जनता के सेवक नहीं, बल्कि उसके मालिक हैं. जब किसी राज्य या शहर में कोई राजनेता दौरा करता है, तो जनता उनके स्वागत में सड़कें बंद कर देती है. इतना ही नहीं, सड़कों को फूलों की पंखुड़ियों से पाट दिया जाता है. जनता घंटों तक इंतजार करती है, और यदि येन-केन-प्रकारेण किसी आम व्यक्ति को नेताजी के साथ हाथ मिलाने या सेल्फी खिंचवाने का मौका मिल जाए, तो वह इसे अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मान बैठता है. लोग उस तस्वीर को सोशल मीडिया पर गर्व से साझा करते हैं, जैसे उन्हें कोई दुर्लभ वरदान मिल गया हो. कुछ लोग तो उस फोटो की फ्रेमिंग करवाकर घरों में ऐसी जगह लटकाते हैं, जहां हर आने-जाने वाले व्यक्ति की नजर पड़े.

किसी राजनेता की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह जनता के बीच जाए, उनसे संवाद करे, उनकी समस्याओं को सुने और उनका समाधान निकाले. नागरिकों के वोट से ही राजनेताओं को ताकत मिलती है. जनता के टैक्स से ही राजनेताओं को वेतन, वीआईपी सुरक्षा, गाड़ियां और बड़े-बड़े बंगले मिलते हैं. इसके बावजूद अपने ही जनप्रतिनिधि से मिलने के लिए हमें एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है.

लोकतंत्र में सतर्क और जागरूक जनता

इस स्थिति के लिए केवल राजनेता दोषी नहीं हैं. राजनेता तो केवल उस माहौल का फायदा उठाते हैं, जो हम उन्हें परोसते हैं. जब एक नागरिक अपनी हैसियत भूलकर खुद को केवल किसी दल का झंडा उठाने वाला कार्यकर्ता या किसी राजनेता नेता का भक्त मान लेता है, तब वह अपनी नागरिकता के सबसे बड़े अधिकार यानी सवाल पूछने के अधिकार का खुद ही समर्पण कर देता है. सत्ता में बैठा व्यक्ति चाहे कितना भी जनहितैषी होने का दावा करे यदि उस पर जनता के दबाव और सवालों की तलवार नहीं लटकी रहेगी, तो उसका निरंकुश होना तय है.

एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र को अंधभक्तों की नहीं, बल्कि जागरूक और सतर्क नागरिकों की जरूरत होती है. नागरिक वह है जो चुनाव के वक्त अपना वोट सोच-समझकर दे और चुनाव जीतने के बाद अपने चुने हुए प्रतिनिधि की आंखों में आंखें डालकर पूछ सके कि पांच साल में रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए क्या काम हुआ.

जन भागीदारी का उदाहरण

दुनिया में ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं, जहां लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार मतदान करने तक सीमित नहीं है. ब्राजील के पोर्टो एलेग्रे नगर ने नागरिक भागीदारी का ऐसा ही एक सफल मॉडल पेश किया है. साल 1989 से वहां नागरिक स्वयं सार्वजनिक बैठकों में भाग लेकर यह तय करते हैं कि नगर निगम के बजट का एक बड़ा हिस्सा किन कार्यों पर खर्च होगा. महापौर और पार्षद अपनी इच्छा से धन खर्च नहीं कर सकते; उन्हें जनता द्वारा तय प्राथमिकताओं का पालन करना पड़ता है. परिणामस्वरूप स्थानीय शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी, गरीब इलाकों तक आधारभूत सुविधाएं अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचीं और बाद में इस मॉडल को दुनिया के कई शहरों ने अपनाया.

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान हुए लाठी चार्ज में छूटे लोगों के जूते-चप्पल की प्रदर्शनी.

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान हुए लाठी चार्ज में छूटे लोगों के जूते-चप्पल की प्रदर्शनी.
Photo Credit: PTI

भारत ने भी जवाबदेही की दिशा में सोशल ऑडिट जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था विकसित की है. इसने आम नागरिक को पहली बार सरकारी योजनाओं, सार्वजनिक धन के उपयोग और जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से खुले तौर पर सवाल पूछने का संस्थागत मंच प्रदान किया. इस व्यवस्था ने लोकतंत्र को केवल मतदान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नागरिक को शासन की निगरानी का अधिकार भी दिया. इसके बाद भी इसकी एक सीमा है. सोशल ऑडिट की शुरुआत, उसका आयोजन और उसकी प्रक्रिया आज भी मुख्यतः राज्य द्वारा स्थापित संस्थागत ढांचे State Social Audit Unit (SSAU) पर निर्भर है. नागरिक इसमें सहभागी तो हैं, लेकिन प्रक्रिया का वास्तविक नियंत्रक नहीं. यदि किसी कारण से यह संस्थागत तंत्र निष्क्रिय या कमजोर पड़ जाए, तो आम जनता स्वयं सोशल ऑडिट प्रारंभ नहीं कर सकती है.

यहीं ब्राजील और भारत के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है. भारत में नागरिक प्रायः सरकारी योजनाओं के पूरा होने के बाद सोशल ऑडिट के माध्यम से सवाल पूछते हैं, जबकि पोर्टो एलेग्रे में नागरिक योजना बनने से पहले ही निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं. वे केवल यह नहीं पूछते कि पैसा कहां खर्च हुआ, बल्कि यह भी तय करते हैं कि पैसा कहां खर्च होना चाहिए. लोकतंत्र की वास्तविक परिपक्वता तब मानी जाएगी, जब नागरिक केवल सरकार द्वारा आयोजित सोशल ऑडिट में भाग लेने वाले सहभागी न रहें, बल्कि स्वयं उसकी पहल करने, अभिलेखों तक सहज पहुंच प्राप्त करने, सार्वजनिक सुनवाई आयोजित कराने और जनप्रतिनिधियों से नियमित रूप से जवाब मांगने में सक्षम हों. जिस दिन जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को आराध्य नहीं, बल्कि उत्तरदायी जनसेवक मानकर निरंतर प्रश्न पूछने लगेगी, उसी दिन लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ साकार होगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के बाबासाहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के राजनीति विज्ञान विभाग में रिसर्च स्कॉलर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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