अगर आप गंगा के घाटों के किनारे खड़े होकर थोड़ी देर शांत मन से सुनें, तो अचानक पानी की सतह पर उठती एक सांस और छींटों की धीमी आवाज़ आपको चौंका सकती है. यह कोई साधारण आवाज़ नहीं, बल्कि यह गंगा डॉल्फ़िन की उपस्थिति का संकेत है. स्थानीय लोग इसे प्यार से 'सुसु' कहते हैं. देखने में लगभग अंधी यह डॉल्फ़िन ध्वनि तरंगों (ईकोलोकेशन) के सहारे अपना रास्ता ढूंढती है और शिकार करती है.
कभी गंगा और उसकी सहायक नदियों में बड़ी संख्या में पाई जाने वाली डाल्फिन की यह प्रजाति आज संकट में है. वन्यजीव संस्थान (WII) और प्रोजेक्ट डॉल्फ़िन के एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कि उत्तर प्रदेश में बहने वाली नदियों—गंगा, घाघरा, यमुना और चंबल में आज केवल करीब 2,400 गंगा डॉल्फ़िन ही शेष हैं. इस सर्वेक्षण में 3,453 किलोमीटर नदी क्षेत्र को कवर किया गया. इसमें चंबल की भिंड–पचनदा धारा में प्रति किमी पर 2.68 डॉल्फ़िन और गंगा की कानपुर–विंध्यांचल धारा में प्रति किमी 1.89 डॉल्फ़िन को सबसे समृद्ध हिस्से के रूप में दर्ज किया गया. वहीं, नरोरा से कानपुर तक का 366 किलोमीटर का लंबा खंड लगभग डॉल्फ़िन विहीन पाया गया. इसका मुख्य कारण पानी की गहराई में कमी है.
कहां कहां पाई जाती है गंगा डाल्फिन
डॉल्फ़िन आमतौर पर संगम, गहरे मोड़ों, द्वीपों और सहायक नदियों के संगम क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जहां शिकार की उपलब्धता अधिक होती है. लेकिन इनका जीवन आसान नहीं. मछली पकड़ने के जाल, बांध और बैराजों से टूटा हुआ आवास, औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण और जहाज़ों का बढ़ता शोर इनके अस्तित्व पर भारी पड़ रहा है.
इन चुनौतियों से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग ने टीएसए (Turtle Survival Alliance) फाउंडेशन इंडिया और नमामि गंगे कार्यक्रम के सहयोग से डॉल्फ़िन के रेस्क्यू, पुनर्वास और संरक्षण के क्षेत्र में ऐतिहासिक पहल की है. इसके तहत पिछले 12 सालों (2013–2025) में 40 से अधिक फंसी हुई डॉल्फ़िन को सफलतापूर्वक बचाकर उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया है. यह कार्य आईयूसीएन सेटेशियन स्पेशलिस्ट ग्रुप द्वारा अनुमोदित डॉल्फ़िन बचाव हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया गया.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर की एक नहर में फंसी गंगा नदी डॉल्फ़िन का रेस्क्यू करते टीएसए फ़ाउंडेशन इंडिया की टीम और स्थानीय लोग.
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संरक्षण के इन प्रयासों में समुदाय की भागीदारी, जनजागरूकता और क्षमता निर्माण को विशेष महत्व दिया गया है. अब तक 1,000 से अधिक वनकर्मी, 10,000 समुदाय सदस्य और 200 से अधिक विद्यालयों के 72 हजार छात्र इन गतिविधियों से जुड़े हैं. इसके अतिरिक्त, ध्वनि ट्रैकिंग (Acoustic Telemetry) और पिंगर तकनीक का उपयोग कर डॉल्फ़िन के व्यवहार, जीवित रहने की प्रवृत्ति और नहरों में फंसने की घटनाओं पर शोध कार्य भी चल रहा है.
कितना जरूरी है गंगा डाल्फिन को बचाना
फिर भी उम्मीदें जीवित हैं. टीएसए फाउंडेशन इंडिया की अरुणिमा सिंह और उनकी टीम ने कई बार फंसी हुई डॉल्फ़िन को बचाकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है. लखनऊ के पास नहरों में फंसी छह डॉल्फ़िन को 12 घंटे लंबे प्रयास के बाद बचाकर घाघरा नदी में छोड़ा गया. ऐसे प्रयास न केवल डॉल्फ़िन के जीवन को बचाते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों में भी जागरूकता पैदा करते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा डॉल्फ़िन एक 'अम्ब्रेला प्रजाति' है. इसका संरक्षण करने का अर्थ है पूरी नदी की जैव विविधता और उससे जुड़े अन्य जीवों को बचाना. यही कारण है कि इसे भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है. गंगा डॉल्फ़िन केवल एक जीव नहीं, बल्कि नदी की धड़कन है. यह हमें बताती है कि हमारी नदियां कितनी स्वच्छ और जीवंत हैं. यदि गंगा डॉल्फ़िन बची रहेगी तो न केवल नदी बचेगी, बल्कि उस पर निर्भर लाखों लोगों का जीवन भी सुरक्षित रहेगा. इसकी रक्षा करना दरअसल हमारी सांस्कृतिक धरोहर, हमारी नदियों और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करना है.
टीएसए फाउंडेशन इंडिया की संरक्षण विशेषज्ञ अरुणिमा सिंह के मुताबिक गंगा डॉल्फ़िन संरक्षण का यह मॉडल विज्ञान, समुदाय और त्वरित बचाव तंत्र को एक साथ जोड़ता है. गंगा डॉल्फ़िन केवल एक जीव नहीं, बल्कि मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का सूचक है. उत्तर प्रदेश वन विभाग, टीएसए इंडिया और नमामि गंगे की साझेदारी ने डॉल्फ़िन संरक्षण को नई दिशा दी है.
डिस्क्लेमर: प्राची हाटकर एक समुद्री जीवविज्ञानी और समुद्री संरक्षण वैज्ञानिक हैं. वर्तमान में वे एडवांस रिसर्च सेंटर फॉर इकॉलॉजी एंड कंज़र्वेशन, डीईएस पुणे विश्वविद्यालय में सीनियर रिसर्च ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असमत होना जरूरी नहीं है.