दिल्ली में विकास के नाम पर दशकों से लाखों गरीबों के आशियाने उजड़ते रहे हैं. दिल्ली का भव्य इंडिया हैबिटेट सेंटर, नेहरू पार्क, मौर्या शेराटन और ताज होटल जैसी इमारतें कई झुग्गी बस्तियों को तोड़कर बनी हैं. राजधानी में झुग्गियां हटाने का सिलसिला लंबे समय से चल रहा है. सवाल उठता है कि दशकों से आबाद झुग्गियों को क्यों हटाया जाता है? क्या कोई ठोस, मानवीय नीति नहीं बन सकती? शीला दीक्षित और आम आदमी पार्टी की सरकारों ने प्रयास किए, लेकिन समस्या बनी रही. आज भी शहर की सड़कों, नालियों के किनारे और रेलवे पटरी के आसपास बसी झुग्गियां विकास की राह में बाधा मानी जाती रही हैं.
दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड की हालिया बैठक में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने झुग्गीवासियों के लिए राहत भरा ऐलान किया. सरकार ने एक जनवरी 2025 तक बसी झुग्गियों को पक्का मकान देने का फैसला किया है. इससे करीब 20 लाख लोगों की जिंदगी बदल सकती है. केंद्र सरकार की 2026 नई नीति के तहत आधुनिक फ्लैट दिए जाएंगे.
दिल्ली सरकार का यह फैसला दिल्ली के शहरी विकास में एक सकारात्मक और दूरदर्शी कदम है. पिछले दशकों में विकास अक्सर अमीर-गरीब की खाई को चौड़ा करता रहा, लेकिन रेखा गुप्ता सरकार ने गरीबों को विकास का हिस्सेदार बनाने का प्रयास किया है. यह नीति सिर्फ घर देने तक सीमित नहीं, इसमें रोजगार लिंकेज, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामुदायिक भागीदारी शामिल है. इससे पहले की योजनाओं में पुनर्वास दूर-दराज इलाकों में होता था, जहां लोग रोजगार खो बैठते थे. नई नीति स्थायी समाधान पर जोर देती है, जो वास्तव में सराहनीय है.
दिल्ली की कितनी आबादी झुग्गियों में रहती है
दिल्ली की 20-30 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती है. इन्हें नजरअंदाज करना शहर की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन दोनों के लिए हानिकारक था. आधुनिक फ्लैट, बेहतर बुनियादी ढांचा और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के जरिए ये परिवार मुख्यधारा में आएंगे. इससे अपराध, स्वास्थ्य समस्याएं और सामाजिक तनाव कम होंगे. इसके साथ ही केंद्र-राज्य समन्वय से यह योजना अधिक प्रभावी बनेगी.
सोशल वर्कर प्रीतम धारीवाल कहते हैं कि सफलता क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी.पारदर्शी सर्वे, भ्रष्टाचार मुक्त आवंटन, समयबद्ध निर्माण और लोकल समुदायों की भागीदारी जरूरी है. अगर यह नीति सही तरीके से लागू हुई तो दिल्ली एक समावेशी मॉडल बन सकती है, जहां विकास सबका हो.
स्वतंत्रता के बाद दिल्ली में बसी झुग्गियां
स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण मजदूरों की बड़ी संख्या दिल्ली आई. निर्माण कार्यों, कारखानों और घरेलू नौकरियों की तलाश में आए ये लोग शहर के खाली पड़े इलाकों, नालियों के किनारे और रेलवे लाइनों के आसपास झुग्गियां बसाने लगे. 1956 के स्लम एरिया एक्ट के तहत क्लियरेंस अभियान शुरू हुआ. इमरजेंसी (1975-77) के दौरान तुर्कमान गेट, कल्याणपुरी और अन्य इलाकों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ हुई. अनुमान के मुताबिक इसमें हजारों परिवार बेघर हो गए.
आंकड़ों के मुताबिक 1990 से 2003 के बीच 51,461 झुग्गियां तोड़ी गईं, जबकि 2004-07 में यह संख्या 45,000 से ज्यादा पहुंच गई. वर्तमान में दिल्ली में 675 से अधिक झुग्गी क्लस्टर हैं, जहां लाखों लोग बिना बुनियादी सुविधाओं के जीवन यापन कर रहे हैं. ये आंकड़े विकास की चकाचौंध के पीछे छिपे मानवीय संकट को उजागर करते हैं.
इमरजेंसी में जब तुर्कमान गेट इलाके में चला बुलडोजर
साल 1975 में इमरजेंसी के दौरान तुर्कमान गेट में बुलडोजर चले. सैकड़ों घर ध्वस्त हुए और कई लोग मारे गए. छह जनवरी 2026 की रात फिर इसी इलाके में अतिक्रमण हटाने का अभियान चला. इससे पुरानी यादें ताजा हो गईं. अब भी कई उम्रदराज उन दिनों की कहानियां सुनाते हैं कि कैसे रातोंरात उनके घर उजड़ गए और वे बेघर हो गए. यह घटना दर्शाती है कि झुग्गी समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और ऐतिहासिक भी है.
विस्थापन का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है. बच्चों की शिक्षा बाधित होती है, महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षित रोजगार नहीं मिल पाता. दिल्ली की अर्थव्यवस्था अनौपचारिक मजदूरों पर काफी हद तक टिकी हुई है– निर्माण, फेरी, घरेलू काम और छोटे उद्योग. फिर भी उन्हें समस्या माना जाता है. विस्थापन के बाद कई परिवार दोबारा झुग्गियां बसाने को मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि नया स्थान रोजगार से दूर होता है. इससे गरीबी का चक्र चलता रहता है.
पहले की सरकारों ने झुग्गियों के लिए क्या किया
शीला दीक्षित सरकार ने 2007 में फ्लैट स्कीम शुरू की. इसमें झुग्गीवासियों को पुनर्वासित किया गया. आम आदमी पार्टी सरकार 2015 में अपनी पॉलिसी लाई. प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत भी प्रयास हुए, लेकिन क्रियान्वयन की कमी और भ्रष्टाचार ने इन योजनाओं को पूरी तरह सफल नहीं होने दिया. कई बार पुनर्वासस्थल बिना बिजली, पानी और परिवहन सुविधा के तैयार किए गए. इससे लोग वापस पुरानी जगहों पर लौट आए.
साल 2025 कट-ऑफ पर आधारित पारदर्शी सर्वेक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और मास्टर प्लान 2041 में स्लम क्षेत्रों को विकास का अंग बनाने की जरूरत है. दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और दिल्ली विकास प्राधिकरण को समन्वय बनाकर काम करना होगा. स्किल डेवलपमेंट सेंटर्स, माइक्रोफाइनेंस, स्वास्थ्य क्लीनिक और स्कूलों को पुनर्वास स्थलों के साथ जोड़ा जाना चाहिए.
रेखा गुप्ता के ऐलान को आगे बढ़ाते हुए सरकार को ऐसी नीति बनानी होगी कि विकास की आंधी में कोई आशियाना न उजड़े. हर दिल्लीवासी अपने शहर पर गौरव महसूस करे. इसमें पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और सस्टेनेबल शहरीकरण को भी शामिल करना होगा.
इसके अलावा, जागरूकता अभियान चलाकर झुग्गीवासियों को उनके अधिकारों के बारे में बताया जाना चाहिए. एनजीओ, सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों को योजना की निगरानी में शामिल किया जाए. यदि यह मॉडल सफल रहा तो न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश के लिए एक उदाहरण बनेगा.20 लाख से ज्यादा लोगों को पक्का आशियाना मिलने से दिल्ली अधिक समावेशी, मजबूत और मानवीय बनेगी. यह ऐतिहासिक पहल पुरानी गलतियों को सुधारने और एक नई शुरुआत करने का अवसर है.
दिल्ली में तमिलों की झुग्गी-झोपड़ियां
दिल्ली जब देश की राजधानी बनी, तब यहां तमिल लोग सरकारी नौकरियों की तलाश में पहुंचने लगे. उनके पीछे-पीछे तमिलनाडु के सेलम और उसके आसपास के जिलों से सैकड़ों परिवार भी रोटी-रोजी की तलाश में दिल्ली आ पहुंचे. हर परिवार में पति-पत्नी और एक-दो बच्चे थे. इन परिवारों की महिलाओं ने सरकारी कालोनियों में मेड का काम संभाल लिया. तमिल पुरुष नगर निगम (एमसीडी) और नई दिल्ली नगर पालिका (NDMC) में मजदूरी करने लगे. गठीले बदन वाले ये तमिल मजदूर सड़क निर्माण जैसे भारी-भरकम कामों में भी जुट गए.
जहां आज नेहरू पार्क और इंडिया हैबिटेट सेंटर का सुंदर परिसर है, वहां उस वक्त ढेरों मद्रासी परिवार झुग्गी-झोपड़ियों में रहते थे. जीवन कठिन था, लेकिन इन परिवारों को एक गहरी तसल्ली थी कि उनके बच्चे स्कूल जा रहे थे. भविष्य बेहतर बनाने की उम्मीद जगी हुई थी. इसी उम्मीद को सहारा देने के लिए दिल्ली तमिल एजुकेशन एसोसिएशन (DTEA) के स्कूल इन तमिल मेहनतकशों के बच्चों के लिए वरदान साबित हुए. इन स्कूलों ने बिना फीस लिए इन बच्चों को दाखिला दिया और उन्हें शिक्षा जारी रखने के लिए हरसंभव प्रोत्साहन दिया.इन ठोस प्रयासों का फल मीठा निकला. तमिल मजदूरों के बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़े, सरकारी और निजी क्षेत्र में अच्छी नौकरियां पाईं, अच्छी कमाई करने लगे. धीरे-धीरे उनका सामाजिक वर्ग चरित्र बदल गया. जब मां-बाप मेहनत से थक चुके, तो ये संतानें उन्हें सहारा देने खड़ी हो गईं. वे अपने माता-पिता की तरह निरक्षर नहीं रहीं. आज वे दिल्ली के समाज का अभिन्न अंग बन चुके हैं. वे मद्रासी बस्तियां भी अब नहीं रहीं, जहां उन्होंने अपना बचपन गुजारा था. झुग्गियां हट गईं, स्कूलों की किताबें जीवन बदल गईं और मेहनतकश परिवारों की पीढ़ी ने दिल्ली की मुख्यधारा में अपनी जगह बना ली.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)