विज्ञापन

बिहार के लिए क्यों जरूरी है जलवायु-अनुकूल खेती, इसके रास्ते की बाधाएं क्या क्या हैं

शाश्वत शुक्ला
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 22, 2026 13:14 pm IST
    • Published On अप्रैल 22, 2026 12:51 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 22, 2026 13:14 pm IST
बिहार के लिए क्यों जरूरी है जलवायु-अनुकूल खेती, इसके रास्ते की बाधाएं क्या क्या हैं

बिहार को जलवायु-अनुकूल खेती को उच्च प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि अप्रत्याशित मौसमी घटनाएं अब कृषि वास्तविकताओं को बदल रही हैं. कभी सूखा, कभी बाढ़ और कभी तूफान से फसलों को होने वाले नुकसान की घटनाएं सामने आती रहती हैं. बढ़ती गर्मी से गेहूं जैसी फसलें प्रभावित हुई हैं. पहले से ही कर्ज और खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे छोटे किसानों के लिए, ऐसे झटके अब असहनीय हो गए हैं. इसलिए, कृषि की जलवायु से जुड़े झटकों का सामना करने की क्षमता (Climate Resilience) को मजबूत बनाए बगैर खाद्य सुरक्षा को मजबूत नहीं किया जा सकता है.  

जलवायु अनुकूल खेती क्या होती है

ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के संदर्भ में, 'जलवायु-अनुकूल कृषि' को एक ऐसी समावेशी और लैंगिक समानता के प्रति संवेदनशील प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसके जरिए बदलते जलवायु परिवेश में खेती और संबंधित क्षेत्रों का संचालन और प्रबंधन किया जा सके. इसका मुख्य उद्देश्य पोषण सुरक्षा मजबूत बनाना और पर्यावरण व आर्थिक रूप से सततशील आजीविकाएं सुनिश्चित करना है. लेकिन खेती में यह लचीलापन इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार उन स्थानीय संस्थानों में कितनी तेजी से निवेश करती है, जिन पर किसान भरोसा करते हैं, जैसे किसान उत्पादक संगठन (FPOs). अभी ये एफपीओ इस श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी बने हुए हैं.

बिहार में जलवायु-अनुकूल खेती की संस्थागत क्षमता का आकलन करने के लिए, 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) ने दोनों प्रमुख कृषि-जलवायु क्षेत्रों के कुल चार जिलों- बाढ़ से प्रभावित होने वाले मधुबनी और दरभंगा और सूखे से प्रभावित होने वाले भागलपुर और बांका में फील्डवर्क और मूल्यांकन किया. इसमें आशाजनक प्रगति और कमियां दोनों ही मिलीं. इसमें पाया गया कि अगर किसान सामूहिक रूप से काम करें तो वे बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं. उदाहरण के लिए मधुबनी के सुकेत में एक स्थानीय एफपीओ ने सूखा प्रतिरोधी बीजों की सामूहिक खरीद, आपसी समन्वय के साथ सूक्ष्म-सिंचाई का उपयोग और एकीकृत कीट प्रबंधन जैसे कई काम कर दिखाया है. लेकिन ऐसी सफलताओं में तब तक बिखराव बना रहेगा, जब तक इनसे मिलने वाली सीख को व्यवस्थित रूप से संस्थागत ढांचे में नहीं लाया जाता है.

सूखा-प्रतिरोधी बीज क्या है

सूखा-प्रतिरोधी बीज कम नमी वाले वातावरण को सहन करने में सक्षम होते हैं. इन्हें ब्रीडिंग या बायोटेक्नोलॉजी के जरिए विकसित किया जाता है. इनकी जड़ें गहरी होती हैं और फसल कम समय में तैयार हो जाती है. ऐसे बीज पानी की कमी के दौरान खेती का जोखिम घटाते हैं.

अनुभवी किसान होने के बावजूद एफपीओ के संचालक अक्सर व्यावसायिक नियोजन, डिजिटल रिकॉर्ड के रखरखाव और सरकारी कार्यक्रमों को समझने के लिए औपचारिक प्रशिक्षण का अभाव महसूस करते हैं. इनमें मदद करने के लिए बनाए गए क्लस्टर-आधारित व्यवसायिक संगठन (सीबीबीओ) शायद ही कभी पेशेवर सीईओ की नियुक्ति या वित्तीय रोडमैप बनाने जैसे कामों में मदद करते हैं. इसके अलावा, किसानों की फसलों की बिक्री के लिए प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस) पर निर्भरता है, जो बेहतर मूल्य मिलने की संभावना और जलवायु अनुकूल फसलों की स्वीकार्यता को सीमित कर देती है. 

ऐसी चुनौतियां राज्य भर में दिखाई देती हैं. जिलों में कृषि विज्ञान केंद्र सिर्फ चार वैज्ञानिकों के साथ काम करते हैं, जिससे किसानों को आवश्यकता के अनुरूप प्रशिक्षण सीमित हो जाता है. कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसियों और जिला कृषि-विपणन इकाइयों के सामने कम फंडिंग की भी समस्या रहती है. कई किसानों की फसल बीमा तक पहुंच नहीं है. फसल कटाई के बाद के नुकसान को घटाने और बेहतर मूल्य पाने के लिए फसलों का मूल्यवर्धन सुनिश्चित करने वाले भरोसेमंद बुनियादी ढांचे का अभाव इस समस्या को और बढ़ा देता है. इससे जलवायु-अनुकूल कृषि के प्रयासों की व्यवहार्यता भी घट जाती है.

क्यों लोकप्रिय नहीं हो रही हैं जलवायु-अनुकूल खेती

यह भी एक सच्चाई है कि संस्थानों में बदलाव की तुलना में जलवायु तेजी से बदल रही है. वैश्विक मॉडल 2050 तक उत्तर-पश्चिम भारत के तापमान में तेज बढ़ोतरी का अनुमान लगाते हैं. भागलपुर के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने जलवायु-अनुकूल चावल की किस्में विकसित की हैं. लेकिन सक्षम एफपीओ नेटवर्क के अभाव में किसानों तक इनकी पहुंच सीमित बनी रहेगी. इस चक्र को तोड़ने में ये तीन कदम मददगार हो सकते हैं- 

पहला, सिर्फ भौतिक ढांचा नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता का भी विकास हो. सीबीबीओ को एफपीओ संचालकों को सुव्यवस्थित तरीके से कृषि-व्यवसाय के बारे में प्रशिक्षण (structured agribusiness training) देना चाहिए. ऐसे प्रशिक्षण के लिए प्रदर्शन के आधार पर फंडिंग (performance-linked funding) की व्यवस्था अपनानी चाहिए. सफल एफपीओ के जरिए दूसरे एफपीओ को मार्गदर्शन देने का प्रयास प्रशिक्षण में प्रासंगिकता और निरंतरता जोड़ सकता है. एफपीओ नेटवर्कों के लिए विशेष रूप से तैयार 'जलवायु-अनुकूल कृषि-व्यवसाय' (क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर एग्री बिजनेस) पाठ्यक्रम को मानक के रूप में लागू किया जाना अनिवार्य है. इसके लिए राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) और कृषि विश्वविद्यालयों के बीच साझेदारी होनी बहुत जरूरी है.

दूसरा, वित्त उपायों और बाजार से संपर्क को मजबूत बनाना चाहिए. कितने समूहों तक बीमा, ऋण और सब्सिडी जैसी सुविधाएं पहुंच रही हैं, इसकी निगरानी करना बहुत जरूरी है. नाबार्ड जिला विकास प्रबंधकों के प्रदर्शन मूल्यांकन को एफपीओ के साथ उनके संपर्क से जोड़ सकता है. कृषि प्रौद्योगिकी कंपनियों (एग्रीटेक फर्मों) और निजी प्रोसेसर्स के साथ साझेदारियों के माध्यम से एफपीओ को पीएसीएस की निर्भरता से मुक्त करने की जरूरत है. ऋण, सब्सिडी और बीमा जैसे विभिन्न वित्तीय उपायों की सुलभता छोटे किसानों को नई कृषि पद्धतियों में पूरे भरोसे के साथ निवेश करने में मदद कर सकती है.

तीसरा, उत्तरदायित्व निर्धारण को एक व्यवस्थित आकार देना चाहिए. विशेष रूप से समर्पित संसाधनों और नियमित संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से सीबीबीओ-एफपीओ के बीच संपर्क (Engagement) को औपचारिक रूप से अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. एक निगरानी व्यवस्था भी बनानी चाहिए, जो सीबीबीओ की गतिविधियों की तीन-तीन माह पर निगरानी करे.

क्यों जरूरी है एफपीओ का सशक्त होना

ऐसे सुधार न केवल एफपीओ को सशक्त बनाएंगे, बल्कि जमीनी स्तर से लचीलापन विकसित करने के उपायों को नई परिभाषा भी देंगे. जलवायु-अनुकूल कृषि केवल नई फसल किस्मों या ड्रिप लाइनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध इसके प्रबंधन (Governance) से है. जब स्थानीय संस्थान सामूहिक रूप से योजनाएं बनाने, संसाधन जुटाने और लाभ कमाने में सक्षम हो जाते हैं, तो लचीलापन स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाता है. इसलिए सरकार के कृषि सुधारों के अगले दौर का आधार व्यक्तिगत सब्सिडी की जगह पर संस्थागत क्षमता निर्माण होना चाहिए. एफपीओ को मजबूत करने में खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया अनुकूलन पद्धतियों की तेज स्वीकार्यता, ग्रामीण आय में वृद्धि और खाद्य प्रणालियों में अधिक स्थिरता के रूप में कई गुना रिटर्न देता है. कुल मिलाकर, जलवायु परीक्षा में बिहार की सफलता या असफलता उसके खेतों में तय होगी, जहां एफपीओ अग्रिम रक्षा-पंक्ति के रूप में हैं.

(डिस्क्लेमर: लेखक नई दिल्ली स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) नाम के थिंक टैंक में रिसर्च एनालिस्ट हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com