एक ऐसा देश जहां अगले दिन का सूरज देखना इस बात पर निर्भर करता हो कि रात में गिरने वाले बम आपके घर पर ना गिरकर किस्मत से किसी और जगह पर जा गिरे. उस देश में फुटबॉल खेलना और एक सफल फुटबॉलर बनने का सपना देखना एक तरह से पागलपन की हद है. बोस्निया-हर्जेगोविना के कप्तान एडिन जेको ऐसी ही जगह पैदा हुए थे. जेको के बचपन में परिस्थितियां कितनी भयानक थीं, इस कहानी से पता चलता है.
मां की जिद से बची जान
1986 में जन्मे जेको का बचपन बोस्निया के शहर साराजेवो में बीता था जो सर्बियन युद्ध के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित शहर था. उनका घर तबाह हो गया था. उनके परिवार को मजबूरन ऐसे घर में रहना पड़ा जहां दरवाजों और दीवारों पर गोलियों के निशान थे. उनके परिवार को दोनों वक्त का खाना नसीब होगा या नहीं, यह सब किस्मत के भरोसे था. एक दिन जेको दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलने के लिए पार्क जाना चाहते थे. लेकिन उनकी मां बेलमा ने उनको रोक लिया. जेको की जिद काम नहीं आई और उनको रुकना पड़ा. उसी दिन जिस पार्क में फुटबॉल खेलने जेको जाने वाला था वहां बम गिरा और जेको के सारे दोस्त मारे गए. जेको आज भी उस दिन फुटबॉल खेलने से रोकने के लिए अपनी मां का धन्यवाद देते हैं. बेलमा की एक ना ने उस बच्चे को बचा लिया, जो आज बोस्निया का सबसे बड़ा फुटबॉल हीरो है.
यूगोस्लाविया के बिखरने के समय बोस्निया-हर्जेगोविना ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी थी. बोस्निया सर्बस ने साराजेवो शहर को सीज कर लिया था. युद्ध के दौरान साराजेवो के 14 हजार से ज्यादा लोगों को मार दिया गया. इनमें पांच हजार से ज्यादा आम नागरिक थे. चारों तरफ बम, गोले, बारूद और मौत का साया था. जेको के लिए हर समय बम के धमाकों और गोलियों के चलने की आवाज सुनाई देना एक आम बात थी. इसी माहौल के दौरान जेको अपने दोस्तों के साथ टेप से चिपकाई हुए एक पुरानी बॉल के साथ पार्क में फुटबॉल खेलते थे. जहां पार्क में घास से ज्यादा बारूद की परत जमी होती थी. ऐसा माहौल जहां जिंदगी की कीमत ना के बराबर थी, लेकिन ये माहौल भी जेको को अपना जुनून फॉलो करने से रोक नहीं पाया था.

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जेको का सपना क्या था
जेको ने कभी बहुत बड़ा फुटबॉल स्टार बनने का नहीं सोचा था ना ही फुटबॉल खेलकर बहुत सारे पैसे कमाने का सोचा था. उनको बस फुटबॉल पसंद था. वो हर हाल में फुटबॉल खेलना चाहते थे. फुटबॉल ही उनके लिए युद्ध जैसी परिस्थितियों से निकलने का एक जरिया था. युद्ध खत्म होने के बाद 1996 में जेको ने एफके ज़ेलजेज़्निकार साराजेवो क्लब जॉइन किया. क्लब की अकादमी से निकलकर जेको क्लब की सीनियर टीम तक पहुंच गए थे.
लेकिन अफसोस की बात ये रही कि वो क्लब के लिए सफल साबित नहीं हुए. उनके खेलने के तरीके पर सवाल उठने लगे. उनको आलसी बोला जाना लगा. उनकी खूबियों पर फोकस करने के बजाए फैन और मीडिया उनकी टेक्निकल कमजोरियों पर फोकस करने लगे. उनको 'क्लॉक' यानी लकड़ी का लठ्ठ बोला गया. जेको ने मिडफील्डर के तौर पर शुरुआत की थी लेकिन उनके लंबे शरीर की वजह से उनके खेल में वो तकनीकी क्षमता और लय नहीं थी, जो एक मिडफील्डर के तौर पर जरूरी होती है. उनको बोला गया तुम फुटबॉलर बनने लायक नहीं हो. लेकिन जो खिलाड़ी युद्ध जैसी कठिनाइयों से गुजरा हो, वो कहां हार मानने वाला था.
जेको को बोस्नियन डायमंड क्यों कहा जाता है
जेको ने फील्ड पर अपनी पोजीशन के अलावा देश भी बदला. वो चेक रिपब्लिक के क्लब एफके टेप्लिक के लिए स्ट्राइकर के तौर पर खेलने लगे. जेको को टेप्लिक ने 25 हजार यूरो में खरीदा था. इस क्लब के लिए खेलते हुए मिली सफलता के बाद जर्मनी के एक क्लब वोल्फ्सबर्ग ने उनको चार मिलियन यूरो में खरीदा. जर्मनी में जेको ने वोल्फ्सबर्ग को बुन्दसलीगा टाइटल जिताया और खुद एक सीजन में सबसे ज्यादा गोल दाग कर 'गोल्डन बूट' भी जीता. जेको को पहली बार मीडिया, फैन और फुटबॉल स्काउट से वो इज्जत मिलने लगी जिसके वो हकदार थे. साराजेवो के युद्ध क्षेत्र में किए संघर्ष का फल जेको को मिलने लगा. उनकी जो फुटबॉल क्षमता थी, उसके मुताबिक कोच उनको देखने लगे. अपने लंबे शरीर का उपयोग कर कैसे एक स्ट्राइकर के तौर गोल स्कोर किया जाए ये उनकी क्षमता थी. उनको जैसे पहले से पता हो कि वो बॉल कहां आएगी और वो बॉल रिसीव करने के लिए हमेशा मौजूद रहते थे.

जेको ने यूरोप के कई देशों के क्लबों के लिए फुटबॉल खेला है.
जेको को अब 'Bosanki Dijamant' यानी बोस्नियन डायमंड बुलाया जाने लगा. लगने लगा था की जेको अब फुटबॉल में एक बड़ा स्थान हासिल करेंगे. लेकिन उनके अगले इंग्लिश प्रीमियर लीग क्लब मैनचेस्टर सिटी के पड़ाव ने इस बात को गलत साबित कर दिया. उन्होंने क्लब को दो चैंपियनशिप जीतने में अहम योगदान दिया. लेकिन फैन और फुटबॉल वर्ल्ड के लिए वो अच्छे खिलाड़ी ही बने रहें, उनको कभी मेन प्लेयर या महान प्लेयर के तौर पर नहीं देखा गया. जब 2012 में कुन एग्वेरो ने मैनचेस्टर सिटी के लिए सीजन के आखिरी मैच के आखिरी मिनट में गोल दागकर कर टाइटल जीताया था, तब उससे पहले वाला जरूरी गोल स्कोर करने वाले खिलाड़ी जेको ही थे. लेकिन फुटबॉल की दुनिया में उस दिन एक ही हीरो था कुन एग्वेरो ना कि जेको.
जेको क्यों गए इटली
जेको को समझ आ गया था कि कोई भी टॉप क्लब उन्हें सपोर्ट प्लेयर से ज्यादा नहीं समझेगा.ऐसे में उन्होंने इंग्लैंड और जर्मनी के बाद इटली का रुख किया. वहां उन्होंने इटालियन क्लब रोमा जॉइन किया. 2021 तक वो रोमा के साथ रहे. अपने करियर में उन्होंने सबसे ज्यादा मैच रोमा के लिए ही खेले और क्लब के लीजेंड बने. रोमा की हर बड़ी जीत में उनका योगदान था.
इंटरनेशनल लेवल पर उनके पास जर्मनी और चेक रिपब्लिक जैसे कई देशों को रिप्रेजेंट करने का मौका था. लेकिन उन्होंने बोस्निया को ही चुना. जब वो अपने क्लब के लिए कोई ट्रॉफी जीतते थे तो उनके कंधे पर बोस्निया का ही झंडा दिखाई देता था. जेको जब भी बोस्निया के लिए गोल करते हैं तो ये हमेशा एक गोल से बढ़कर होता है. ये गोल उन सभी बोस्निया के लोगों के लिए होता है जो युद्ध के दौरान जेको जितनी किस्मत वाले नहीं थे. उन सभी दोस्तों के लिए होता है जिनके साथ खेलते हुए जेको ने फुटबॉल की शुरुआत की थी. लेकिन वो जेको की तरह आगे फुटबॉल नहीं खेल पाए. इस बार की चैंपियन इटली को हराकर इस बार बोस्निया ने जब क्वालीफाई किया था तो भी जेको ने बोस्निया के लोगों के सघंर्ष को याद किया था.

ए़डिन जेको 40 साल की उम्र में बोस्निया-हर्जेगोविना के टीम की कप्तानी कर रहे हैं.
बोस्निया के बच्चों के नाम पत्र
उन्होंने बोस्निया के बच्चों के नाम एक लेटर लिखा. इसमें उन्होंने कहा, ''हम लकी हैं कि हम बोस्नियाई हैं. मैं यह सिर्फ एक ऐसे आदमी के तौर पर नहीं कह रहा हूं जिसे अपना सपना जीने का मौका मिला, बल्कि एक ऐसे लड़के के तौर पर भी कह रहा हूं जो युद्ध से बच गया और जिसकी किस्मत बहुत आसानी से कुछ अलग हो सकती थी. मैं युद्ध के साथ बड़ा हुआ. अचानक, मैं परियों की काहानियों में जी रहा था. कुछ भी नामुमकिन नहीं है.'' आज जेको बोस्निया के लिए सबसे ज्यादा गोल स्कोर करने वाले खिलाड़ी हैं.वो 40 की उम्र में इस वर्ल्ड कप में टीम के कप्तान हैं.
जेको की कहानी कोई बैलोन डी'ओर या 'गोल्डन बॉल' पुरस्कार जीतने वाले या बहुत सारे वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाले फुटबॉलर की नहीं है. यह कहानी उस खिलाड़ी की है, जिसको हमेशा कम आंका गया. जिसने ऐसे माहौल में फुटबॉल खेला, जिसमें उसको पता भी नहीं था कि वो कल का सूरज देखेगा या नहीं. यह कहानी है उस खिलाड़ी की जिसके फुटबॉल के जूनून ने एक त्रासदी को हरा दिया और वो जानता है कि इस सफर में उसका किस्मत ने कितना साथ दिया. इसलिए वो कभी नहीं भूलता कि उसने ये सफर कहां से शुरू किया था और किन लोगों के लिए वो फुटबॉल खेलता है. जेको की कहानी किस्मत,जूनून और हौसले की कहानी है.
(डिस्क्लेमर: लेखक फ्रीलान्स राइटिंग और स्पोर्ट्स कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में पिछले छह साल से काम कर रहे हैं. उनकी दिलचस्पी क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों को फॉलो करने के साथ-साथ खेल और खिलाड़ियों का विश्लेषण करने में रही है. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)