बिहार ने 5 अप्रैल 2016 को पूर्ण शराबबंदी लागू कर एक साहसिक और सामाजिक प्रयोग की शुरुआत की थी. इस निर्णय को उस समय सामाजिक सुधार, महिला सशक्तिकरण और जनस्वास्थ्य के संदर्भ में ऐतिहासिक कदम माना गया था. आज, जब इस नीति के 10 साल पूरे हो गए हैं, तब यह जरूरी हो जाता है कि इसके प्रभावों का तथ्यात्मक और संतुलित विश्लेषण किया जाए. यह देखने की कोशिश की जाए कि क्या यह नीति अपने उद्देश्यों में सफल रही है या इसके परिणाम अपेक्षा पर खरे उतरे हैं या नहीं.
शराबबंदी से बिहार का राजस्व कितना कम हुआ
इस नीति की पृष्ठभूमि 2015 के विधानसभा चुनावों से जुड़ी है, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांगों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शराबबंदी का वादा किया था. नवंबर 2015 में सत्ता में आने के बाद सरकार ने एक अप्रैल 2016 से शराबबंदी कानून लागू किया और 5 अप्रैल 2016 से इसे पूर्ण रूप से प्रभावी कर दिया. यह निर्णय गांधीवादी विचारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों से प्रेरित था. हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इससे पहले राज्य की नीति इसके बिल्कुल विपरीत थी. साल 2005 में बिहार का कुल बजट करीब 27 हजार करोड़ रुपये का था. बिहार के पास राजस्व के सीमित स्रोत थे. ऐसे में सरकार ने शराब की बिक्री को बढ़ावा देने का रास्ता अपनाया. इसका परिणाम यह हुआ कि 2006-07 में शराब की दुकानों की संख्या 3,436 से बढ़कर 2012-13 में 5,467 हो गई थी. ग्रामीण इलाकों में शराब की दुकानों में 200 फीसदी से अधिक वृद्धि दर्ज की गई. इस विस्तार ने राज्य के उत्पाद शुल्क राजस्व को भी तेजी से बढ़ाया, 2006 में करीब 500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2015 तक यह 6,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया.
यहीं से नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है. जो क्षेत्र कभी राज्य के राजस्व का प्रमुख स्रोत था, वही अचानक पूरी तरह समाप्त कर दिया गया. 2015-16 में बिहार को उत्पाद शुल्क से 3,142 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे. लेकिन शराबबंदी लागू होने के बाद 2016-17 में यह घटकर मात्र 46 करोड़ रुपये रह गया और 2017-18 में यह लगभग शून्य हो गया. अनुमानतः राज्य को हर साल करीब चार हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है.

शराबबंदी का फायदा पड़ोसी राज्यों ने कितना उठाया
इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि इस नुकसान का अप्रत्यक्ष लाभ पड़ोसी राज्यों को मिला. बिहार की सीमाएं झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल से लगती हैं, जहां शराब की बिक्री जारी रही. उदाहरण के तौर पर, झारखंड का उत्पाद शुल्क राजस्व 2015-16 में 912 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-18 में 1,600 करोड़ रुपये हो गया. वहीं पश्चिम बंगाल का राजस्व 4,014 करोड़ रुपये से बढ़कर 5,781 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यह दर्शाता है कि मांग समाप्त नहीं हुई, बल्कि भौगोलिक रूप से स्थानांतरित हो गई.
कानूनी दृष्टि से बिहार निषेध और उत्पाद शुल्क अधिनियम को काफी कठोर बनाया गया. प्रारंभिक प्रावधानों में शराब के सेवन पर सामूहिक जुर्माना, यहां तक कि परिवार के सभी वयस्क सदस्यों की गिरफ्तारी जैसे प्रावधान शामिल थे. हालांकि, समय के साथ इस कानून में तीन बार संशोधन किए गए और अब पहली बार अपराध करने वालों को 2,000 से 5,000 रुपये तक के जुर्माने पर छोड़े जाने की व्यवस्था की गई है. यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सरकार को भी इसके क्रियान्वयन में व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद, अवैध शराब का कारोबार पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका. राज्य में समय-समय पर जहरीली शराब से मौत के मामले सामने आते रहे हैं, जो इस नीति की सबसे गंभीर विफलताओं में से एक माने जा सकते हैं. एनसीआरबी के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2015 से 2022 के बीच अवैध शराब के सेवन से कुल 224 मौतें दर्ज की गई हैं. बिहार 2022 में पूरे देश में अवैध शराब से संबंधित मौतों के मामले में शीर्ष पर रहा. हालांकि इन्हीं आंकड़ों में इस बात का भी उल्लेख है कि 2017 और 2018 में राज्य में जहरीली शराब से एक भी मृत्यु दर्ज नहीं की गई.
शराब से होने वाली मौतों के गड़बड़झाला
मौतों का यह आंकड़ा एक गंभीर विरोधाभास को उजागर करता है. साल 2018 में बेगूसराय में जहरीली शराब के सेवन से चार व्यक्तियों की मृत्यु की घटनाएं सामने आई थीं, जबकि 2017 में रोहतास जिले में नकली शराब के कारण चार लोगों की कथित मौतें हुईं. इन घटनाओं का एनसीआरबी के आधिकारिक आंकड़ों में अभाव, डेटा की विश्वसनीयता और संकलन प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है. स्पष्ट है कि जमीनी वास्तविकता और सरकारी आंकड़ों के बीच एक गहरी खाई मौजूद है. यह अंतर न केवल आंकड़ों की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि नीति-निर्माण और क्रियान्वयन की प्रभावशीलता पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता को रेखांकित करता है.
प्रतिबंध ने शराब की खपत को समाप्त करने के बजाय उसे भूमिगत कर दिया. इससे न केवल कानून-व्यवस्था की चुनौतियां बढ़ीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम उत्पन्न हुआ. शराबबंदी का एक अप्रत्याशित प्रभाव नशे के स्वरूप में बदलाव के रूप में सामने आया. साल 2017 में तीन डॉक्टरों की एक टीम द्वारा किए गए एक पायलट अध्ययन में पाया गया कि 25 फीसद से अधिक नियमित शराब पीने वाले लोग ताड़ी, गांजा और चरस जैसे अन्य मादक पदार्थों की ओर मुड़ गए. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के आंकड़े इस प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं. बिहार में गांजा की जब्ती 2015 में 14 किलोग्राम से बढ़कर 2016 में 10,800 किलोग्राम और 2021 में 27,395 किलोग्राम हो गई. यह करीब 2700 फीसदी की वृद्धि दर्शाती है. इसी तरह, हशीश की जब्ती 2015 में शून्य से बढ़कर 2016 में 115 किलोग्राम और 2021 में 363 किलोग्राम तक पहुंच गई.
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि केवल शराब पर प्रतिबंध लगाने से नशे की समस्या समाप्त नहीं होती, बल्कि उसका स्वरूप बदल सकता है. ऐसे में नशामुक्ति और पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था अनिवार्य हो जाती है. सरकार ने राज्य के 38 जिलों में 10-10 बिस्तरों वाले नशामुक्ति केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई, यानी कुल 380 बिस्तर. लेकिन यह संख्या राज्य में नशे की लत से जूझ रहे हजारों लोगों की तुलना में बेहद कम प्रतीत होती है.
क्या शराबबंदी से बिहार में कम हुआ महिलाओं के खिलाफ अपराध
सामाजिक प्रभावों की बात करें तो शराबबंदी का एक प्रमुख उद्देश्य घरेलू हिंसा में कमी लाना था. हालांकि, आंकड़े इस दिशा में अपेक्षित सुधार का संकेत नहीं देते. 2015-16 में जहां 40.2 फीसद महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार थीं, वहीं 2019-20 में यह आंकड़ा बढ़कर 40.6 फीसद हो गया. इसी प्रकार, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों की संख्या 2015 में 13,891 से बढ़कर 2021 में 17,950 हो गई. यह दर्शाता है कि सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल एक नीति के माध्यम से संभव नहीं है.

बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पांच अप्रैल 2016 को राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी.
शराबबंदी की वर्तमान स्थिति यह भी बताती है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यवहारिक रूप से लागू नहीं हो पाया है. अनुमानतः बिहार के करीब 17 फीसद (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 आंकड़ा) पुरुष आज भी शराब का सेवन करते हैं. यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि नीति का अनुपालन पूर्ण रूप से सुनिश्चित नहीं किया जा सका.
ऐसे में यह कह सकते हैं कि बिहार की शराबबंदी नीति एक नेक इरादे और सामाजिक सुधार की भावना से शुरू हुई थी. लेकिन 10 सालों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जटिल सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल प्रतिबंध के माध्यम से संभव नहीं है. राजस्व में भारी गिरावट, अवैध कारोबार का विस्तार, नशे के वैकल्पिक रूपों का प्रसार और सामाजिक-आर्थिक असंतुलन-ये सभी इस नीति की सीमाओं को उजागर करते हैं. आज एक संतुलित और बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है, जिसमें कठोर कानून के साथ प्रभावी क्रियान्वयन, नशामुक्ति और पुनर्वास की सुदृढ़ व्यवस्था और प्रभावित समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर शामिल हों. बिहार की यह दस साल की यात्रा हमें यह सिखाती है कि नीतियां केवल अच्छे इरादों से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों से आंकी जाती हैं.
डिस्क्लेमर: लेखक में दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करते हैं और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के लिए अलग-अलग मुद्दों पर लेख लिखते रहते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.
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