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OPINION
This Article is From Dec 03, 2015

राकेश कुमार मालवीय : क्या पेरिस से मिलेगा भोपाल गैस त्रासदी के सवालों का जवाब

आपदाओं पर हम बेहद आसानी से कह देते हैं कि यह कुदरत का कहर है। जलवायु बदल रही है। बदलती जलवायु पर दुनिया बेहद संवेदनशील है। पेरिस में दुनियाभर के लोगों का जमावड़ा है। पर क्या हम गंभीरता से इस बात को सोच रहे हैं कि जिन्हें हम आपदाएं कह रहे हैं वह त्रासदियां हैं।

आपदाओं पर हम बेहद आसानी से कह देते हैं कि यह कुदरत का कहर है। जलवायु बदल रही है। क्लाइमेट चेंज। बदलती जलवायु पर दुनिया बेहद संवेदनशील है। पेरिस में दुनियाभर के लोगों का जमावड़ा है। चिंतन हो रहा है। पर क्या हम गंभीरता से इस बात को सोच रहे हैं कि जिन्हें हम आपदाएं कह रहे हैं वह त्रासदियां हैं।

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ऐसी त्रासदियां जो हमने खुद ही बुनी हैं, जिनकी जड़ों में हम खुद हैं। वह हिरोशिमा, नागासाकी से शुरू होकर केदारनाथ तक आ टिकती हैं। त्रासदियां जो एक पल में हजारों जानें ले लेती हैं। त्रासदियां जो अंधाधुंध विकास की उपज हैं। ऐसी ही एक त्रासदी की आज बरसी है। भोपाल गैस त्रासदी। 15 हजार लोगों को एक रात में खत्म कर देने और उसके बाद पांच लाख लोगों की जिंदगी को बद से बदतर बना देने वाली यह त्रासदी सौ प्रतिशत मानव जनित है।

हर बड़े कारखाने के पीछे दिखाते हैं सब्‍जबाग
31 साल पहले दिसम्बर महीने की दो-तीन तारीख के पहले तक खूबसूरत भोपाल की छाती पर यह कारखाना सैकड़ों लोगों के लिए उम्मीदों का कारखाना होता था। जैसे कि हमें हर बड़े कारखाने के पीछे यही सब्जबाग दिखाया जाता है कि कारखाना आने से हजारों हजार लोगों को रोजी-रोटी का जरिया मिलेगा, लेकिन जिनकी जमीनों पर कारखाने, बांध या ऐसी ही कोई विकास योजना जब आकार लेती है तब उसके इस अध्ययन की परंपरा ही नहीं है कि आखिर उससे कितने लोगों का भला हुआ ? कितने लोगों को रोजगार मिल गया, अथवा वहां के मूल निवासियों के जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ ?

तमाम प्रभावितों की एक जैसी व्‍यथा
हिंदुस्तान में ऐसे तमाम प्रभावित लोगों से आज इस वक्त भी मिल लें तो आप पाएंगे कि उनके हिस्से में शून्य ही आया है। सत्तर के दशक में मध्यप्रदेश के बरगी बांध से प्रभावित लोगों से मिल लीजिए, होशंगाबाद जिले में तवा बांध के विस्थापितों से मिल लीजिए जो तीन-तीन बार अपनी जगह से विस्थापित हुए हैं। वे तीन दशक बाद आज भी आंसू बहाते हैं या 2006 के बाद इंदिरा सागर से विस्थापित हरसूद के विस्थापित लोगों से मिल लीजिए। इसी तरह कारखानों-खदानों से प्रभावित लोग। बालाघाट जिले में मलाजखंड के लोग जो कि खदानों के कारण प्रभावित हैं, उनकी भी वही कहानी है।

क्‍या ऐसे विकास पर हमने कभी सोचा है
भोपाल गैस त्रासदी और इन सभी योजनाओं का जुड़ाव थोड़ा अटपटा जरूर है, लेकिन यह सब उस विकास की बहस का हिस्सा है जिसके कड़े अनुभवों को हम देश में जगह-जगह महसूस करते हैं। किसने सोचा था कि एक कारखाना रात के केवल एक हिस्से में, कुछ घंटों में पंद्रह हजार लोगों को मौत की नींद में ले जाएगा। किसने ? और इन कटु अनुभवों के बाद भी। क्या हम चेत पाएं हैं। क्या ऐसे विकास पर हमारी नीतियों ने कभी सोचा है। हमारे देश में अब भी बड़े बांध बनाए जा रहे हैं जबकि कई देशों में बड़े बांधों की बजाए छोटे बांधों पर जोर दिया जा रहा है। वहां ऐसी परियोजनाओं के बारे में सोचा जा रहा है जिनमें जंगल-जमीन का कम नुकसान हो।

क्‍या हम चीन जैसे देश से सीखेंगे
क्या हम सोच सकते हैं कि चाइना जैसे देश में हाईवे का रास्ता केवल एक घर के लिए मोड़ दिया जाता है क्योंकि वह अपनी जगह से विस्थापित नहीं होना चाहता, और हमारे देश में तो हम लोगों को अपनी जगह से हटाने के लिए किस हद तक नहीं जाते। हम चुटका में परमाणु बिजली संयत्र स्थापित करते हैं जबकि जानते हैं परमाणु संयंत्रों के कटु अनुभवों के बाद जापान ने इनसे तौबा कर ली है।

न्‍याय की बाट जोहता रह जाता है इंसान
इंसानों की जान की हमारे यहां जैसे कीमत ही नहीं होती। इन त्रासदियों का न्याय उसे मिल ही नहीं पाता। एंडरसन मर ही गया। भोपाल का गुनहगार एंडरसन। पंद्रह हजार लोगों के कातिल को हम अपने देश वापस लाने का दबाव भी नहीं बना पाए। पर इंसानों की जान की हमारे यहां जैसे कीमत ही नहीं होती। इन त्रासदियों का न्याय उसे मिल ही नहीं पाता। और तो और कारखाने के जहरीले कचरे से अब भी भोपाल की फिजा को जहरीला ही बना रहे हैं। कचरे को निपटाने का कोई कारगर तरीका, उचित जगह अब भी नहीं खोज पाए हैं जिस पर सभी की एक राय हो।

इस बड़ी त्रासदी से सबक लेना होगा
हम केवल साल में एक बार यह रस्म निभाते हैं। एक सर्वधर्म सभा जिसमें मुख्यमंत्री शामिल होकर संवेदना व्यक्त करते हैं, मीडिया में कुछ खबरें, भोपाल शहर की उन गलियों से एक मशाल रैली और शाहजहांनी पार्क में एक धरना और सभा। क्या दुनिया की एक भीषणतम त्रासदी का सबक सिर्फ यही होना चाहिए। क्या पेरिस जैसे जलवायु सम्मेलनों से इन सवालों का हल मिल पायेगा... ?

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