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छत्तीसगढ़ : माओवादियों के जाने के बाद क्या बीर सिंह अपने गांव लौट पाएगा, गांव वाले क्यों कर रहे हैं विरोध

शुभ्रांशु चौधरी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 01, 2026 18:43 pm IST
    • Published On जून 01, 2026 18:42 pm IST
    • Last Updated On जून 01, 2026 18:43 pm IST
छत्तीसगढ़ : माओवादियों के जाने के बाद क्या बीर सिंह अपने गांव लौट पाएगा, गांव वाले क्यों कर रहे हैं विरोध

मैं बीर सिंह को पिछले करीब 10 साल से जानता हूं. उन्हें अपना गांव छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. वे छत्तीसगढ़ के नारायणपुर कस्बे में एक अस्थायी आश्रय में रह रहे थे. उन्होंने मुझे बताया था कि माओवादियों ने एक जन अदालत में उनके दो मित्रों रामलाल और मंतर सलाम को सजा-ए-मौत दे दी थी.माओवादियों ने उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा था कि वे दोबारा कभी गांव से बाहर नहीं जाएंगे. उन्हें बताया गया था कि गांव वालों की जमानत पर ही उन्हें छोड़ा जा रहा है. उस जन अदालत में पांच गांवों के लोग मौजूद थे.

बीर सिंह को क्यों छोड़ना पड़ा था अपना गांव

उन्होंने बताया कि इस घटना के करीब एक सप्ताह बाद रात करीब एक बजे पुलिस उनके गांव आई थी. पुलिस ने मुझे जगाया और गांव के निवासी रामदर का घर दिखाने को कहा. रामदर माओवादियों की उस टोली का सदस्य था, जिसने जन अदालत में उनके दोस्तों की हत्या की थी. मैंने उन्हें घर दिखा दिया था. इसके बाद मैंने पुलिस से अनुरोध किया कि वे मुझे भी अपने साथ ले चलें और जेल में डाल दें. मुझे पता था कि इस घटना के बाद माओवादी मुझे निश्चित रूप से मार डालेंगे. पुलिस मुझे नारायणपुर ले आई.सरकार ने नया जीवन शुरू करने के लिए मुझे 30 हजार रुपये दिए.

बीर सिंह जैसे करीब एक हजार विस्थापित परिवार हैं, जो पिछले 10 साल से अधिक समय से जिला मुख्यालय नारायणपुर में रह रहे हैं. बीर सिंह धीरे-धीरे विस्थापितों के नेता बन गए. शांति तथा न्याय की मांग को लेकर आयोजित कई रैलियों और पदयात्राओं में वो शामिल रहे. हाल ही में उन्होंने मुझे फोन कर कहा,''अब माओवादी चले गए हैं और मुझे लगा था कि हमारे बुरे दिन खत्म हो गए हैं, लेकिन हमें और मदद की जरूरत है. अब हम अपने गांव लौटना चाहते हैं, लेकिन गांव वाले हमें वापस आने नहीं दे रहे हैं.''

गांव छोड़ने देने वालों को वापस क्यों नहीं आने देना चाहते हैं ग्रामीण

उन्होंने मुझे मंतर सलाम का नंबर दिया, जिनकी पत्नी मनीता छिनारी गांव की निर्वाचित सरपंच हैं. मंतर सलाम ने कहा, ''मेरी पत्नी केवल निर्वाचित सरपंच हैं. आप जानते हैं कि हमारे दूरदराज़ के गांवों में असली प्रभाव हमारे पारंपरिक नेताओं—गायता, गुनिया और पटेल का है. उन्होंने फैसला किया है कि विस्थापितों को वापस नहीं आने दिया जाएगा, इसलिए हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते.'' उन्होंने इस बात की भी पुष्टि की कि लौटना चाहने वाले सभी नौ परिवारों के पास अपनी जमीन के वैध दस्तावेज हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इन लोगों को रोकना कानूनन गलत है, लेकिन उन्होंने अपनी बेबसी भी जताई.

गांव की परिस्थितियों और पिछले कुछ दशकों में हुई घटनाओं को समझने के लिए मैंने सरपंच पति (स्थानीय भाषा में 'एसपी') मंतर सलाम से बातचीत जारी रखी. उन्होंने कहा,''हमारा गांव माओवादियों का गांव था और वे जो कहते थे, हमें वही करना पड़ता था. कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने गांव से बाहर न जाने का आदेश दिया था और पहले के सरपंच जयराम यादव को मारने की धमकी भी दी थी, क्योंकि उन्होंने उनकी बात नहीं मानी थी. वे हमारे गांव से भागने वाले पहले व्यक्ति थे.''

बच्चों की भी हत्या कर देते थे माओवादी?

मंतर सलाम ने बताया, ''उससे पहले माओवादियों ने हमारे पटेल की हत्या कर दी थी. यह हमारे गांव की पहली हत्या थी. मुझे सही साल याद नहीं, लेकिन यह 2004 से पहले की बात है. करीब दो साल बाद उन्होंने एक और व्यक्ति को पुलिस का मुखबिर बताकर मार दिया. फिर 2008 में पुलिस हमारे गांव आई और छह लोगों को मार दिया. हम बहुत डर गए और पुलिस को देखकर भाग गए. मारे गए लोगों में राजनू सलाम भी थे, जो केवल 12-13 साल के थे. हाँ, हम सब पार्टी के लिए काम करते थे, लेकिन हम पार्टी के सदस्य नहीं थे.''

उन्होंने कहा,''इसके बाद 2010 में माओवादियों ने बल्लीराम यादव को मुखबिर बताकर मार दिया और जो परिवार आज वापस लौटना चाहते हैं, उनमें से अधिकांश उसी डर के कारण गांव छोड़कर चले गए. फिर 2014 में जब बीर साई पोताई पुलिस के साथ चला गया, तो माओवादियों ने उसके छोटे भाई की हत्या कर दी, जो पास के धौड़ाई स्कूल में नौवीं कक्षा का छात्र था. हालांकि इस हत्या को लेकर कुछ भ्रम है कि वास्तव में उसे माओवादियों ने मारा था या नहीं.हमने माओवादियों के कहने पर ही स्कूल की इमारत तोड़ दी थी. इसलिए वह पढ़ाई के लिए धौड़ाई जाता था. माओवादियों को यह पसंद नहीं था क्योंकि उन्हें शक था कि वह रास्ते में सूचना देता होगा.''

कौन जोत रहा है गांव छोड़ने वालों की जमीन

उन्होंने मुझे बताया, ''हमारे गांव के आठ लोग माओवादी संगठन में शामिल हुए थे. पिछले दो सालों में उनमें से छह विभिन्न मुठभेड़ों में मारे गए,जिनमें रामदर भी शामिल था, जिसका घर बीर सिंह ने पुलिस को दिखाया था. बाकी दो लोगों ने आत्मसमर्पण कर दिया है. उनमें से एक रमेश यादव भी है, जो उन्हीं परिवारों से है जो वापस लौटना चाहते हैं. आत्मसमर्पण करने वाले लोग भी गांव लौटना चाहते हैं, लेकिन ग्राम सभा उनके लौटने का भी विरोध कर रही है. हां, कुछ गांव वाले इन परिवारों की खाली पड़ी जमीनों का उपयोग इतने वर्षों से करते आ रहे हैं.''

उन्होंने कहा,''गांव वालों का मुख्य आरोप यह है कि इन विस्थापित लोगों ने सक्रिय माओवादियों के बारे में पुलिस को सूचना दी थी. इसी के बाद पुलिस ने गांव के दस लोगों को गिरफ्तार किया था, हालांकि अब वे सभी वापस घर लौट चुके हैं.'' बीर सिंह इसका विरोध करते हुए कहते हैं, ''पूरा गांव माओवादियों के लिए काम करता था. मैं भी करता था. कोई दूसरा रास्ता नहीं था. हम वही करते थे जो वे कहते थे. फिर यह सवाल कहां से आता है कि हमने पुलिस को दस लोगों के नाम दिए? हमें लगा था कि अब माओवादी चले गए हैं तो हमारे 'अच्छे दिन' वापस आ गए हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन हमारी मदद नहीं कर रहा है. इसलिए हम आप सब लोगों से मदद की उम्मीद कर रहे हैं.''

मंतर सलाम कहते हैं, ''यह केवल छिनारी की कहानी नहीं है. पास के बागझर, बैलापाड़, छोटे फरसगांव, आतपाल और कालीबाटा गांवों में भी विस्थापित लोगों को वापस नहीं आने दिया जा रहा है. मैंने सुना है कि अबूझमाड़ के अंदरूनी इलाकों में भी ऐसा हो रहा है, हालांकि मुझे अधिक जानकारी नहीं है. हमारे गांव में 130 परिवार हैं. अब हमारे पास नया स्कूल, सड़क और बिजली है. पिछले कुछ दशकों में हमने हिंसा में 20 लोगों को खोया है. वह एक भयावह दौर था. मुझे उम्मीद है कि हम जल्द ही इस समस्या का समाधान निकाल लेंगे और हमारा गांव फिर से खुशहाल और एकजुट बन सकेगा.''

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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