अगस्त 2005 की बात है. माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया तथा कोंडापल्ली सीतारमैया की पीपुल्स वॉर ग्रुप का मिलकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया माओइस्ट की स्थापना हुए जल्द ही एक वर्ष पूर्ण होने वाला था. लिहाजा, अपने आप को माओइस्ट बताने वाले नक्सली कुछ बड़ा करने की ताक में हैं, यह जानकारी महाराष्ट्र पुलिस तक पहुंच चुकी थीं. महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और गोंदिया इलाकों के जंगल छत्तीसगढ़ से सटे होने के चलते वहां पुलिस ने चौकसी तेज कर दी थी. ऐसे में 21 अगस्त को गढ़चिरौली जिले के धानोरा तहसील में कोसमी के पास एक अनहोनी घटना हुई. महाराष्ट्र राज्य परिवहन निगम की ग्यारापत्ती से मुरूमगांव आ रही बस को छत्तीसगढ़ सीमा से कुछ किलोमीटर दूरी पर सशस्त्र नक्सलियों ने रोक लिया. चालक और वाहक समेत सभी यात्रियों को नीचे उतरने के आदेश दिए गए. करीब बीस सकपकाए यात्री एक-एक कर नीचे उतरे. उन्हें बस से दूर जाने के लिए कह दिया गया और बस में आग लगा दी गई. देखते ही देखते पूरी बस धू-धू कर जल उठी.
माओवादियों का ट्रैप!
यह घटना अनहोनी इसलिए भी थी क्योंकि, आम आदिवासी जनता को परेशानी का सामना उठाना न पड़े इस उद्देश्य से आम तौर पर सार्वजनिक उपयोग के साधनों को निशाना न बनाया जाए, ऐसा नक्सलियों के नेताओं का निर्देश हुआ करता था. फिर भी सड़कों और सार्वजनिक यातायात के साधनों को निशाना बनाया जाता था. यह घटना आम आदिवासियों को तथा राज्य सरकार दोनों को चेतावनी थी. लेकिन यह एक ट्रैप भी था, यह बाद में सामने आया.
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एक वक्त छत्तीसगढ़ सीमा पर नक्सलियों का था आतंक
एसपी ने कई शर्तों के साथ जाने की इजाजत दी
घटना की जानकारी मिलते ही मैने लोकेशन पर जाकर रिपोर्टिंग करने का तय किया और अपने संपादकों से बात कर कैमरामैन विनय शुक्ला के साथ अगले दिन गढ़चिरौली पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचा. पिछले ही वर्ष गढ़चिरौली का जिम्मा संभाले पुलिस अधीक्षक शिरीष जैन की एक बेहद प्रोफेशनल लेकिन कुछ मिलनसार अफसर के तौर पर छवि बन चुकी थी. मेरे आने का कारण सुनकर एक फौजी की तरह वे हंसे और हमसे चाय पी कर वहीं से रिपोर्टिंग कर वापिस लौट जाने के लिए कहा. मैने उन्हें घटना स्थल की रिपोर्टिंग जरूरी बताने की बात कही और वहां जाने का अपना निश्चय बताया. मैंने कहा कि पुलिस को सूचित किए बगैर वहां जाना उचित नहीं होगा इसलिए हमने आपसे मुलाकात की.उन्होंने शांत और दृढ़ स्वर में कहा, “ठीक है, मैं आपके प्रोफेशनल ड्यूटीज के बीच नहीं आऊंगा. लेकिन, यह समझने की कोशिश करें कि मात्र बस जलाना उनका मकसद शायद न हो, यह ट्रैप भी हो सकता है. उनकी यह सोच भी हो सकती है कि कुछ होस्टेज मिले तो जेल बंद साथियों को छुड़वाने की कोशिश भी सफल हो सकती है. आप जिद कर रहे हैं तो अपनी जिम्मेदारी को भी समझें. मेरा एसडीपीओ दर्जे का अफसर और एक टीम आपके साथ होगी और कुछ प्रोटेक्शन व्हीकल्स होंगे. स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन की एक टीम भी वहां जाना चाहती है. उन्हें बस को हुए नुकसान का अंदाजा लेना है. बस ध्यान रहे, आप लोकेशन पर पांच मिनट से ज्यादा नहीं रुकेंगे और मेरे अफसर की किसी बात को ओवर रूल नहीं करेंगे.”

हथियारों के साथ नक्सली (फाइल फोटो)
भारी सुरक्षा के बीच घटनास्थल के लिए रवाना हुए
सबसे आगे एंटी लैंड माईन व्हीकल्स, साथ में कुछ पुलिस वाहन और हमारी सफेद टवेरा के पीछे एस टी के अधिकारियों के वाहन और पुलिस की सी 60 कमांडोज से भरी बड़ी गहरी नीली लॉरी ऐसा उस काफिले का नजारा था. इतनी गाड़ियां और सुरक्षा मामले की गंभीरता को कुछ ज्यादा ही बढ़ा रहा था. आगे और पीछे बख्तरबंद गाड़ियां, उनके सनरूफ से बाहर देखते हेलमेट धारी सशस्त्र जवान थे. हमें लोकेशन पर पहुंचने में सामान्य से ज्यादा समय लगा क्योंकि बीच में जंगलों के स्थानों पर सी सिक्सटी के जवान उतरकर रोड क्लियरेंस में जुट जाते. खैर शाम होने के पहले हम उस सुनसान जंगल से घिरे स्थान पर पहुंचे जहां वह बस खड़ी थी. उस बस से अब भी कुछ धुआं दिखाई दे रहा था. काफिले के प्रमुख अधिकारी ने मुझे और राज्य परिवहन निगम के अधिकारीयों से दो टूक कह दिया, “जल्द ही शाम होने को है. आपके पास केवल पांच से दस मिनट हैं. फिर हमें लौटना होगा.”
गोलियों से गूंज उठा पूरा जंगल
परिवहन निगम की टीम ने फटाफट घूम-घूम कर कुछ तस्वीरें लीं, कुछ कागजात पर लिख कर दस्तखत किए और वापिस उनकी नीली जीप में आकर बैठ गए. हम भी हमारा काम शुरू कर चुके थे लेकिन, अच्छे शॉट्स को समय लगता ही है. मैं और कैमरामैन विनय ने बस के भीतर जा कर शॉट्स ले लिए. कई यात्रियों को अपने सामान तक उतारने का समय नहीं मिला था और कई पर्स, बैग राख हो चुके थे. करीब पंद्रह मिनट के बाद हम वहां में बैठे और वापिस निकले. कुछ दूरी पर रास्ते में कुछ झोपड़ियां दिखी जहां कुछ ग्रामीण महिलाएं थी. मुझे बस से जुड़ी घटना के फर्स्ट पर्सन अकाउंट चाहिए थे, लिहाजा मैंने उनसे बात करने की ठानी. खतरा जरूर था लेकिन दोनों तरफ का जंगल बिल्कुल सुनसान था. मैं गाड़ी रुकवाकर उन तक दौड़ कर पहुंचा, उनसे बात की. लेकिन उनका दावा था कि उन्होंने कुछ नहीं देखा था. शेष वाहन हमसे आगे निकल गए थे. इतने में एक बख्तरबंद गाड़ी तेजी से लौटकर हमारी ओर आई और हमें एक जवान ने चीख कर वापिस चलने के लिए कहा. हम दौड़ कर मुश्किल से अपनी टवेरा में बैठे ही थे कि तड़ातड़ गोलियों की आवाज से पूरा जंगल भर गया. ये आवाज कहां से आ रहे थे इसका कोई अंदाजा नहीं था, लेकिन निश्चित ही हमारे वहां पहुंचने पर जश्न के कोई पटाखे नहीं फूट रहे थे.

नक्सलियों का लाल झंडा (फाइल फोटो)
सरकारी गाड़ी में गोलियों के निशान थे
बख्तरबंद गाड़ी से जवाबी फायरिंग शुरू हो चुकी थी. ड्राइवर ने हमारी एस यू वी तेज दौड़ाई और शीशे ऊपर कर सर झुकाए बैठे रहे. कुछ ही देर में आगे काफिले से जुड़ गए. अब भी फायरिंग की आवाजें आ रहीं थी. जैसे-तैसे हम सब मुरूम गांव पुलिस थाने पहुंचे. यहां एक किले की तर्ज पर ऊंची आउटर वॉल बनी थी, उसपर लोहे के तार गोलाकार ढंग से लगाए गए थे. सैंडबैग्स भी रखी थीं, सेंट्री जवानों द्वारा देखरेख के लिए वॉच टावर थे. काफिले के लिए किले जैसे दरवाजे खुले और हम भीतर पहुंचे जहां पता चला कि राज्य परिवहन निगम की नीली जीप में छेद बन चुके थे और उनकी टीम के ड्राइवर तथा एक कर्मचारी को जिस्म में गोलियां लगी थी. बड़ा विचित्र सा वातावरण था. पुलिस और डॉक्टर्स की टीम अपना काम कर रही थी और हम रात होने का इंतजार करते रहे. फिर रात होते ही धीमी रफ्तार से हमारा काफिला गढ़चिरौली की ओर चल पड़ा. इस बार कुछ पुलिस के वाहन और एक एम्बुलेंस भी थी. अपने ही देश में एक युद्ध जैसा माहौल बेहद निराशाजनक बात थी. खुशनसीबी की बात यह भी थी कि उस हादसे में किसी की मौत नहीं हुई लेकिन एक बड़ी सीख अवश्य मिली. लौटने पर जैन साहब ने हंसते हुए हमसे मुलाकात की और बस इतना कहा, “देश, लोकतंत्र और संविधान की खातिर इतना तो करना बनता ही है.”