8 लाख पद ख़ाली, भर्ती की याद क्‍यों नहीं आती?

क्या चुनावों के समय जाति और समुदाय के नेता ही नाराज़ होते हैं, उन्हें मनाने के नाम पर मंत्रियों की लाइन लगी रहती है लेकिन नौकरी मांग रहे छात्रों को नाराज़ क्यों नहीं माना जाता है, उन्हें मनाने के लिए कोई मंत्री उनके हास्टल या प्रदर्शन में क्यों नहीं जाता है?

क्या इस देश की जनता केवल धर्म और जाति के हिसाब से नाराज़ होती है? या उसकी दूसरी नाराज़गी पर पर्दा डालने के लिए जाति और धर्म के आधार पर उसकी नाराज़गी को हवा दी जाती है? क्या मीडिया ने मान लिया है कि लोग आर्थिक मुद्दों, महंगाई, बेरोज़गारी से नाराज़ नहीं होते है, अगर नहीं तो चैनलों और अखबारों में जनता की नाराज़गी जाति और धर्म के आधार पर प्रमुखता से क्यों पेश की जाती है? क्या इस देश के नौजवानों ने तय कर लिया है कि फार्म भर कर तीन तीन साल परीक्षा का इंतज़ार करेगा, बर्बाद हो जाएंगे लेकिन नाराज़ केवल जाति और धर्म के हिसाब से होंगे? धर्म और जाति के हिसाब से नाराज़ होकर मुलाकात करने वालों से ही नौजवानों को नौकरी मांग लेनी चाहिए.

गुरुवार के हिन्दी अखबारों की ये हेडलाइन बता रही है कि राजनीति और मीडिया की प्राथमिकता क्या है. किसी में अमित शाह को चौधरी कहा गया है तो किसी में अमित शाह के हवाले से यह भी छपा है कि उनका जाटों से साढ़े छह सौ साल का नाता है. 650 साल के ये संबंध किस आधार पर निकाले जा रहे है जब आप खबर पढ़ेंगे तो पता चलेगा. किस तरह से एक समुदाय के खिलाफ नफरत की राजनीति को हवा दी जा रही है. इस तरह से जाटों को मना लेने की खबरों को बड़ा किया गया है. जयंत चौधरी ने ट्वीट करके इंकार कर दिया कि अमित शाह के बुलाने पर नहीं गया, वो खबर छोटी खबर के रूप में छपी है. खबर कौन सी बड़ी है, जिसने अमित शाह का प्रस्ताव ठुकराया वो या जिसने मान लिया वो. जाटों की नाराजगी दूर करने के लिए अमित शाह कैराना ज़रूर जाएं, कभी कभी कोचिंग सेंटर भी जाएं जहां नौकरी को लेकर नौजवान अपनी जवानी फूंक रहा है.

क्या चुनावों के समय जाति और समुदाय के नेता ही नाराज़ होते हैं, उन्हें मनाने के नाम पर मंत्रियों की लाइन लगी रहती है लेकिन नौकरी मांग रहे छात्रों को नाराज़ क्यों नहीं माना जाता है, उन्हें मनाने के लिए कोई मंत्री उनके हास्टल या प्रदर्शन में क्यों नहीं जाता है?

हमारे सहयोगी सौरव शुक्ला ने 22 दिसंबर को एक रिपोर्ट की थी. तीन तीन साल केंद्र सरकार परीक्षा कराने में लगा दे रही है. कर्मचारी चयन आयोग ने 2018 में साठ हज़ार पदों की भर्ती निकाली थी. 55000 को ही नियुक्ति मिली और इसमें भी तीन साल लग गए. बाकी पांच हज़ार सीट खाली रह गई तो उन पर भर्ती के लिए देश भर से एसएससी जीडी के परीक्षार्थी दिल्ली आ गए कि सरकार इन खाली सीटों पर भी भर्ती करे. इनसे श्रम मंत्री से लेकर कार्मिक मंत्री में से किसी ने मुलाकात नहीं की. 

इसी तरह के सवाल रेलवे के परीक्षार्थियों के हैं. एक करोड़ फार्म भरे गए हैं. यानी जिस परीक्षा का संबंध एक करोड़ परीक्षार्थियों से हो क्या उसमें इतना वक्त लगना चाहिए? छात्र कहते हैं कि बीच में प्रक्रिया बदली गई, मंत्री कहते हैं बीच में नहीं बदली गई. तो क्या छात्र मनगढ़त बातों को लेकर सड़क पर उतर गए?

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव कहते हैं, “1 करोड़ से ज्यादा आवेदन. एजेंसी हायर करने में वक्त लगा. 6 महीने से ज्यादा वक्त लगा. फिर कोरोना आ गया. दिसंबर में प्रोसेस चालू किया गया. ग्रुप डी के बच्चे CAT में चले गए थे. करीब 5 लाख बच्चों के फोटो मैच नहीं कर रहे थे. फैसले के बाद एग्जाम के प्रोसेस को शुरू किया. हमारी सरकार, मोदी जी की मनसा है की maximise किया जाए रोजगार को. 2015 से पहले तक पीटी से 10 गुना लिया जाता था कैंडिडेट को. 2019 में इसे 20 गुना किया गया.''

लेकिन छात्र इसी पर सवाल उठा रहे हैं कि बीस लाख छात्रों का रिजल्ट नहीं आया है. एक ही छात्र का नाम अलग अलग लेवल में है. जबकि उनका चुनाव तो एक ही सीट पर होगा, इससे फिर से सीटें खाली रह जाएंगी. अगर मंत्री जी के हिसाब से ऐसा नहीं था तो फिर ये भ्रम क्यों फैलने दिया गया?

संसद में भी और बाहर भी सरकार ने बार-बार कहा है कि कोरोना की लहरों के कारण भर्ती परीक्षा नहीं हो सकी. लेकिन आप 2020 की खबरों को निकाल कर देखिए. इंजीनियरिंग, मेडिकल और सीबीएसआई के छात्र परीक्षा को लेकर कोर्ट गए थे. वहां सरकार ने दलील दी थी कि परीक्षा हो सकती है. परीक्षा कराने की तरह तरह की नई व्यवस्था बनाई गई. कोर्ट का भी आदेश आया और परीक्षा हुई.

तो फिर इन छात्रों को तीन साल का इंतज़ार क्यों करना पड़ा, क्यों नहीं इनके लिए रास्ते निकाले गए ताकि इनकी जवानी के तीन साल परीक्षा के इंतज़ार में बर्बाद होने से बच जाते. मौजूदा रेल मंत्री कह रहे हैं कि परीक्षा की एजेंसी तय करने में वक्त लग गया. क्यों वक्त लगा? फिर किस आधार पर जनवरी 2019 में भर्ती निकाल दी गई. क्या चुनाव था इसलिए? दो साल बाद फरवरी 2021 में राज्य सभा में रेल मंत्री पीयूष गोयल जवाब देते हैं कि इसके लिए परीक्षा कराने वाली एजेंसी नियुक्त हो चुकी है. इस दो साल की कीमत किसने चुकाई है, इन छात्रों ने या रेल मंत्री ने या रेल मंत्रालय ने? रेलवे की परीक्षा को लेकर और भी छात्रों के अलग अलग सवाल हैं. किसी को मेडिकल को लेकर आपत्ति है तो किसी को कुछ.

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव कह रहे हैं कि मोदी सरकार की मंशा है अधिक से अधिक नौकरी देना. उन्हें मंशा की जगह संख्या बतानी चाहिए कि कितनी नौकरी दी है और कितनी देने वाले हैं. उस मंशा का हिसाब हम आपको दे रहे हैं जो सरकार ने ही संसद में दिया है. 2 दिसंबर 2021 को राज्यसभा में कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया कि रेलवे भर्ती बोर्ड ने 2016 से 2020 के बीच केवल 2 लाख 4 हज़ार 945 नौकरियां दी हैं. ये रेलवे का पांच साल का रिकॉर्ड है. 2019 का चुनाव नहीं होता तो इतनी भर्ती भी नहीं होती. यह रिकॉर्ड यह भी बताता है कि चुनावी साल में जितना ज्यादा नौकरी की बात करेंगे, आपके बच्चो के लिए उतनी अधिक नौकरियां निकलेंगी. भले भर्ती कभी नहीं होगी. जाति की बात करेंगे तो दो चार नेता अपना करियर बनाकर आपके बच्चों के सपनों को बेच देंगे.

- 2016-17 - 27,538
- 2017-18 - 25,507
- 2018-19 - 17,680
- 2019-20 - 1,28,456, आप देखेंगे कि पिछले तीन साल की तुलना में चुनावी साल में कई गुना बहाली होती है.
- 2020-21- 5764

भर्ती नहीं निकलने से बहुत से छात्र ओवर एज होकर बर्बाद हो जाते हैं. अगुआ बरतुहार भी नहीं आते हैं, ये एक अलग सदमा है जो नौकरी के साथ जु़ड़ा हुआ है. नौजवान मुस्लिम विरोधी मीम और नेहरू से नफरत करने की मीम ही फारवर्ड करते रह गए और भर्तियां सूखती चली गईं. ये धोखा सरकारी कर्मचारियों के साथ भी हुआ. मीम फार्वर्ड करने में उनका भी काम टाइम गया ही होगा.

विजयिता सिंह की एक खबर है जो गुरुवार के हिन्दू अखबार में भीतर के पन्ने पर छपी है. केंद्रीय सचिवालय की नौकरियों में 2014 से प्रमोशन नहीं हुआ है जिससे अवर सचिव, उप सचिव और निदेशक स्तर के 30 प्रतिशत पद खाली हैं. कितने ही लोग अधिक सैलरी और प्रमोशन के इंतज़ार में रिटायर हो गए. कोर्ट में मामले के नाम पर प्रमोशन नहीं हुआ लेकिन क्या इतने लंबे समय तक मामला टाला जा सकता था जबकि इन्हीं कर्मचारियों का बयान है कि कोर्ट में केस होते हुए दूसरे विभागों में प्रमोशन हुए हैं. जब ऊपर प्रमोशन नहीं होगा तो नीचे वेकैंसी नहीं होगी. ज़ाहिर है भर्ती भी नहीं होगी. हमने कर्मचारियों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने मना कर दिया. 

प्रमोशन भी बंद और भर्ती भी बंद. मगर गोदी मीडिया और आईटी सेल के सहारे नफरती राजनीति की आपूर्ति निरंतर जारी है. अगर मीडिया एक महीना रोज़ रोज़गार पर बात कर दे तो इस देश के लाखों नौजवानों को नौकरी मिल जाएगी क्योंकि केंद्र सरकार के पास 8 लाख से अधिक नौकरी है. सोचिए क्या इस रास्ते से आरक्षण खत्म नहीं हो रहा है? जब भर्ती ही नहीं निकलेगी तो आरक्षण क्या हवा में लागू होगा? 2 दिसंबर 2021 को राज्यसभा में कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सांसद सुखराम सिंह यादव के सवाल के जवाब में कुछ जानकारी दी है. इसके अनुसार 1 मार्च 2020 तक केंद्र सरकार में 8 लाख 72 हज़ार पद खाली हैं. मंज़ूर पदों की संख्या 40 लाख से कुछ अधिक है. 21 प्रतिशत पद खाली हैं. रेलवे में 2,37,295 पद खाली है. मंज़ूर पदों की तुलना में 15 प्रतिशत पद खाली हैं. गृह मंत्रालय में 1,28,842 पद खाली हैं. यहां भी 12 प्रतिशत पद खाली हैं. साइंस और टेक्नालजी विभाग में 66 प्रतिशत पद खाली हैं. 12444 पद हैं, 4217 लोग ही काम कर रहे हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय में भी 26 प्रतिशत पद खाली हैं. जल संसाधन, नदी विकास और गंगा मंत्रालय में 4557 पद खाली हैं. 42 प्रतिशत खाली हैं. मां गंगा के नाम पर भी युवाओं को नौकरी मिल जाती. नीति आयोग का हाल देखिए. यहां 32 प्रतिशत पद खाली हैं.

कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह को यह भी बताना चाहिए कि ये पद कितने समय से खाली हैं, क्यों खाली हैं. आपको इतना डेटा सुनकर बोरिंग लगा होगा. ये सब गुड टेलिविजन नहीं है क्योंकि इसमें कोई गरमा गरम बयान नहीं है जिसे लेकर आप वायरल करा सकें.

प्रयागराज के एक लॉज में पुलिस ने बंदूक की बट से दरवाज़ा नहीं खोला होता तो इन छात्रों की गरीबी बाहर नहीं दिखती. इनके शरीर की कमज़ोरी से आप यूपी के 15 करोड़ गरीबों का सैंपल नहीं देख पाते. इन कमरों का किराया तीन हज़ार का होता है. अकेला एक छात्र नहीं दे पाता है तो चार चार छात्र मिलकर रहते हैं. घर से पैसा आने के इंतज़ार में ये छात्र कभी कम खाते हैं तो कभी नहीं खाते हैं. ये छात्र गरीब घरों के हैं इसलिए आईआईटी और मेडिकल के छात्रों की तरह सुप्रीम कोर्ट जाने का हौसला नहीं जुटा सके होंगे. इनकी क्या गलती है, सरकार के पास जब नौकरी है तो नौकरी की तैयारी ये क्यों नहीं करेंगे, क्या मिडिल क्लास के बच्चे आईआईटी की तैयारी नहीं करते हैं, क्या आपने सुना है कि एक साल आईआईटी की परीक्षा नहीं हुई? तो फिर रेलवे और कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा में बैठने वाले इन गरीब छात्रों के साथ ये मज़ाक क्यों हो रहा है? बेहद कम सुविधा में जीने वाले इन नौजवानों के साथ मज़ाक कौन कर रहा है, क्या आपको लगता है कि ये लोग मां बाप के पैसे पर यहां ऐसे अय्याशी कर रहे हैं? इससे कम में और कोई कैसे जी सकता है?

भर्ती परीक्षाओं में बैठने वाले आम तौर पर गरीब घरों के होते हैं. इनमें उस जाति के भी होते हैं जिस जाति के नाम पर दो चार नेता नाराज़ होते हैं और दल बदल करते रहते हैं. ये नेता अपनी जाति का भाव लगा लेते हैं और बेरोज़गार के सपने रद्दी के भाव भी नहीं बिक रहे हैं. इसके लिए ज़िम्मेदार बेरोज़गार ही हैं. 2017 में जब प्राइम टाइम में नौकरी सीरीज़ शुरू हुई थी और केवल इसी एक विषय पर हमने कई हफ्तों तक प्रोग्राम किया था. हम छात्रों से मिले, उनके ठिकानों पर गए लेकिन कइयों के भीतर नौकरी के नीचे नफरत की एक परत दिखती थी जो उस समय नेहरू और मुसलमान से नफरत के नाम पर बिछाई गई थी. छात्र ही बताते थे कि नौकरी सीरीज़ देखते तो हैं लेकिन इसके बाद भी लड़के मुझी को गाली देते हैं. इलाहाबाद के लड़के ये बात जानते हैं. जबकि नौकरी सीरीज़ उनकी जवानी बर्बाद होने से बचाने के लिए थी. 

चुनावों के समय आप यू ट्यूब पर बहुत से वीडियो को वायरल होता देखेंगे. बहुत से पत्रकार कैमरा लेकर जनता खोज रहे है. क्या कोई उन जगहों पर भी जा रहा है जहां पर ये छात्र रहते हैं औऱ कई कई साल से नौकरी खोज रहे हैं? एक और बात, 25 जनवरी की रात रेलवे की परीक्षाओं के छात्र इस तरह के वीडियो मुझे फार्वर्ड करने लगे. रात भर उनका यह सिलसिला जारी रहा. मैं समझ रहा था कि छात्र इस समय दहशत में होंगे. पुलिस उन्हें खोज रही होगी. उनके भीतर मची इस दहशत को महसूस करते वक्त मुझे उस दहशत की याद आ गई जब जामिया के छात्र दिसंबर 2019 में अचानक मुझे तरह तरह के वीडियो फारवर्ड करने लगे थे. जामिया की लाइब्रेरी के भीतर पुलिस इस तरह घुस आई थी, लाठियों ने लड़की देखी न लड़का. उसके बाद अपराधियों की तरह इन्हें हाथ उठाकर बाहर आने के लिए कहा गया. ठीक उसी तरह जैसे इस वीडियो में छात्रों से उठक-बैठक कराई जा रही ह. लॉज से निकाल कर पीटा जा रहा है. कई लोगों ने सवाल किया और यह सवाल जायज़ है कि जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया जेएनयू के छात्रों के साथ इस तरह का सलूक हुआ तब इन छात्रों और इनके परिवारों ने क्या जश्न मनाया था? इस सवाल का यह मतलब नहीं कि इनके साथ जो हुआ ठीक हुआ बल्कि यह समझना ज़रूरी है कि क्या छात्र और आप दर्शक पुलिस की हिंसा को सही गलत के आधार पर देखते हैं या हिन्दू या मुसलमान के आधार पर. Do u get my point. प्रयागराज की घटना के बाद यह बात ज़ोर देकर बताई गई है कि छह पुलिस वाले निलंबित कर दिए गए हैं. इसमें एक इंस्पेक्टर और दो सब इंस्पेक्टर शामिल हैं. क्या जामिया की घटना के बाद ऐसा कुछ हुआ था.

यह सवाल हवा में नहीं उठ रहा है. इस देश में पिछले कुछ वर्षों में कुछ और हुआ है. एक समुदाय के लोगों को टारगेट करने के लिए इस तरह के कानून लाए गए हैं कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा होने पर उनसे हर्जाना लिया जाएगा. आप अगर अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि हर्जाना वूसलने वाले इस कानून का इस्तमाल किस समुदाय के खिलाफ ज्यादा हुआ है? मज़हब के आधार पर हुआ या है या कानून के हिसाब से हुआ है.

22-23 जनवरी 2022 को अपूर्व विश्वनाथ और असद रहमान की रिपोर्ट आप इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ें।लखनऊ और कानपुर से फाइल की गई है. बताया गया है कि कैसे प्रशासन ने बिना सबूत पेश किए एकतरफा लोगों पर हिंसा के बदले हर्जाने का दंड लाद दिया है. इनमें दिहाड़ी मज़दूर हैं जो अपने हक के लिए हाईकोर्ट में चुनौती तक नहीं दे सके. पता चलता है कि हिंसा की एकतरफा व्याख्या की गई है. पुलिस की गोली से 22 लोग मारे गए थे. इस पर लोगों ने कई तरह के सवाल उठाए थे. लेकिन उसका क्या हुआ कुछ पता नहीं. कानपुर में नागरिकता विरोधी आंदोलन में हुई हिंसा के नाम पर रिक्शा चालक, तांगा चालक, फल विक्रेता, मुर्गा बेचने वाले, दूध बेचने वाले से पैसा वसूला किया गया. ऐसे लोगों से वसूला गया जिनकी कमाई दिन की 250 रुपये भी नहीं है. अगर नहीं देते तो घर की कुर्की हो जाती.

किसी भी आंदोलन में हिंसा नहीं होनी चाहिए लेकिन हिंसा किसने की इसे तय करने की प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी ही चाहिए. आप जानते हैं कि किसी आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए सरकार भी हिंसा करा सकती है. पुलिस भी हिंसा कर सकती है. क्या आपने शाहीन बाग के आंदोलन के समय नहीं देखा था कि बाहर से दो दो बार गोली चलाने की घटना हुई, आंदोलनकारियों के खिलाफ गोली मारने के नारे लगाए गए, क्या वो हिंसा नहीं थी? लेकिन उनका कुछ नहीं हुआ.

अब आप बिहार के गया से आई तस्वीर को देखिए. छात्रों ने ट्रेन में आग लगाकर सौ फीसदी गलत काम किय है. लेकिन इस हिंसा के बाद भी आपने किसी मंत्री को इन्हें दंगाई कहते नहीं सुना होगा. ललकारते नहीं सुना होगा जिस तरह से नागरिकता विरोधी आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ इस्तमाल किया जाता था. इस अंतर से किसी को सुविधा हो सकती है लेकिन इसी अंतर के सहारे आप देख सकते हैं कि राज्य का चरित्र किस तरह से बदल चुका है. आप देखिए कि रेल मंत्री इसके बाद भी संवेदनशीलता की ही बात कर रहे हैं. इनके खिलाफ UAPA लगाने की बात नहीं हो रही है.

छात्रों ने हिंसा और आगजनी का रास्ता लेकर गलत किया है लेकिन इस एक घटना से पूरे आंदोलन की छवि हिंसक नहीं बनाई जा सकती है. छात्रों को हताश किसने किया यह भी एक कारक है.

छात्रों ने अचानक प्रदर्शन शुरू नहीं किया. दिसंबर के महीने में इन्होंने ट्विटर पर हैशटेग जस्टिस फॉर रेलवे स्टुडेंट नाम से साढ़े तीन लाख से अधिक ट्वीट किए ताकि रेलवे बोर्ड का ध्यान जाए. तब रेलवे बोर्ड ने क्यों नहीं वही कदम उठाया जो आंदोलन के बाद उठाया. और जब उतरे तो रेलवे बोर्ड नोटिस जारी करता है कि जो हिंसा करेगा उसे नौकरी नहीं देंगे. ट्रेन की एक बोगी जली है वो सरासर गलत है लेकिन इन नौजवानों के सारे सपने जल गए हैं. इसका ज़िम्मेदार कौन है? मनीष कुमार इस सवाल पर बात करने के लिए पटना के मोइनुल हक स्टेडियम गए. स्टेडियम बंद है लेकिन बाहर सड़क पर नौजवान सिपाही की बहाली के लिए अभ्यास कर रहे हैं. अपनी तरफ से पूरी जान लगाकर मेहनत करने वाले इन जवानों के सपनों को हर दिन कुचला जा रहा है. क्या ये हिंसा नहीं है, उनके सपने फूंक दिए गए, क्या ये हिंसा नहीं है.

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बेरोज़गारों के पास एक रास्ता और है, वे अपनी नौकरी के लिए उन जाट नेताओं या ब्राह्मण नेताओं के पास जाएं जिनसे इन दिनों गृह मंत्री मुलाकात कर रहे हैं, ताकि वे मान जाएं. उन नेताओं से कहें कि कब तक जाति और धर्म के नाम पर नाराज़ होंगे, एक बार नौकरी के नाम पर भी नाराज़ हो जाइये. उससे पहले नौजवान खुद से एक सवाल कर लें. क्या अब वे नफरत के बिना राजनीति करने लायक बचे हैं? मौका मिलेगा तो ये वही करेंगे. लिख कर पर्स में रख लीजिए. नौजवानों की ज़्यादा चिन्ता मत कीजिए.