बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:
बिहार सीएम के नीतीश कुमार को पद से अयोग्य ठहराए जाने की मांग वाली याचिका को याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस याचिका में कोई मेरिट नहीं है. सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की तरफ से कहा गया की नीतीश ने 2012 के चुनावी हलफनामे में हत्या की एफआईआर का खुलासा किया था. इससे पहले चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है ये याचिका सुनवाई योग्य नहीं है इसे खारिज किया जाए. याचिका 'तुच्छ' है और गलत तथ्यों पर आधारित है. इसमें दी गई जानकारी गुमराह करने वाली है और ये अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
आयोग ने कहा कि नीतिश कुमार ने 2012 और 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था. इसी तरह उन्होंने 2013 में भी बिहार विधान परिषद भी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन पता नहीं याचिकाकर्ता एमएल शर्मा ने कहां से नीतीश कुमार के चुनावी हलफनामे हासिल कर लिए. इस मामले से याचिकाकर्ता के कोई मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हुआ है और जनहित याचिका दाखिल नहीं की जा सकती. याचिकाकर्ता को चुनाव याचिका या शिकायत पुलिस को देनी चाहिए थी. ये याचिका खारिज की जाए और याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माना लगाया जाए.
गौरतलब है कि वकील एमएल शर्मा ने याचिका दाखिल कर कहा है कि 2004 से 2015 के दौरान नीतीश कुमार ने हलफ़नामे में ये खुलासा नहीं किया कि 1991 में उन पर हत्या के मामले में एफआईआर दर्ज हुई थी. जिससे नीतीश कुमार अपने आपराधिक रिकॉर्ड को छुपाने के बाद संवैधानिक पद पर नहीं रह सकते हैं.
आयोग ने कहा कि नीतिश कुमार ने 2012 और 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था. इसी तरह उन्होंने 2013 में भी बिहार विधान परिषद भी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन पता नहीं याचिकाकर्ता एमएल शर्मा ने कहां से नीतीश कुमार के चुनावी हलफनामे हासिल कर लिए. इस मामले से याचिकाकर्ता के कोई मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हुआ है और जनहित याचिका दाखिल नहीं की जा सकती. याचिकाकर्ता को चुनाव याचिका या शिकायत पुलिस को देनी चाहिए थी. ये याचिका खारिज की जाए और याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माना लगाया जाए.
गौरतलब है कि वकील एमएल शर्मा ने याचिका दाखिल कर कहा है कि 2004 से 2015 के दौरान नीतीश कुमार ने हलफ़नामे में ये खुलासा नहीं किया कि 1991 में उन पर हत्या के मामले में एफआईआर दर्ज हुई थी. जिससे नीतीश कुमार अपने आपराधिक रिकॉर्ड को छुपाने के बाद संवैधानिक पद पर नहीं रह सकते हैं.
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