Bihar News: बिहार के मोकामा में इन दिनों एक अलग ही 'भौकाल' देखने को मिल रहा है. बाहुबली विधायक अनंत सिंह के जेल से जमानत पर छूटने के बाद उनके पैतृक गांव नदावां की रौनक दशकों बाद लौट आई है. मौका है 'बिहार केसरी' रहे विवेकानंद सिंह उर्फ विवेका पहलवान की पहली पुण्यतिथि का. इस अवसर पर 3 अप्रैल को एक ऐसा विराट अंतर्राष्ट्रीय महादंगल होने जा रहा है, जिसकी चर्चा पूरे बिहार में हो रही है. अनंत सिंह खुद इस पूरे आयोजन की मॉनिटरिंग कर रहे हैं. हाल ही में उन्होंने गांव पहुंचकर 10 बीघा में फैले आयोजन स्थल का जायजा लिया और दावा किया कि बिहार के इतिहास में ऐसा भव्य दंगल पहली बार देखने को मिलेगा.

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8 से 10 लाख लोगों के जूटने की संभावना
इस महादंगल की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दंगल के लिए पूरे 10 बीघा जमीन को समतल कर एक विशाल मैदान तैयार किया जा रहा है. दर्शकों के रोमांच को दोगुना करने और शानदार व्यू के लिए मैदान के बीचों-बीच जमीन से 5 फीट ऊंचा एक पारंपरिक अखाड़ा बनाया गया है. कार्यक्रम के आयोजक और विवेका पहलवान के छोटे भाई अरविंद पहलवान के मुताबिक, इस अभूतपूर्व दंगल का गवाह बनने के लिए लगभग 8 से 10 लाख दर्शकों के पहुंचने की संभावना है. इस अखाड़े में चुनौती भी एकदम विश्व स्तरीय होगी, जहां भारत (महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और बिहार) के चुनिंदा पहलवानों के अलावा ईरान समेत 3 देशों के नामी पहलवान मिट्टी में अपना दम-खम दिखाते नजर आएंगे.

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हल्दी, नीम और राई के तेल से सज रही लाल मिट्टी
यह कोई आम अखाड़ा नहीं है. इसे तैयार करने की प्रक्रिया बेहद खास और पारंपरिक है. नदावां गांव के ही मां ब्रह्मम्णी स्थान से विशेष लाल मिट्टी मंगवाई गई है. पहलवानों को दांव लगाते वक्त चोट न लगे और मिट्टी में पकड़ मजबूत रहे, इसके लिए मिट्टी को फावड़े से खोदा जा रहा है. फिर उसमें हल्दी, राई का तेल और नीम की पत्तियां मिलाकर उसे दंगल के लिए पूरी तरह 'चार्ज' किया जा रहा है.

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कौन हैं विवेका पहलवान?
यह पूरा आयोजन जिस 'बिहार केसरी' विवेका पहलवान की याद में हो रहा है, उनकी दिनचर्या आज के युवाओं के लिए किसी अचरज से कम नहीं है. अरविंद पहलवान जब अपने भाई की दिनचर्या बताते हैं, तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. विवेका पहलवान रात 8 बजे सो जाते थे, लेकिन अपने बिस्तर के पास 5 से 6 लीटर दूध रखते थे और रात भर में उसे पी जाते थे. इसके अलावा वह सिर्फ 2 रोटी और आधा से एक किलो सब्जी खाते थे. वह बिना रुके एक बार में 8,000 दंड-बैठक और 2,000 डिप्स लगाते थे. रात में बादाम का हलवा बनाकर रखते थे. व्यायाम के बाद उसे खाकर रोजाना 10 किलोमीटर की दौड़ लगाते थे और फिर अखाड़े में बादाम का शरबत पीकर घंटों कुश्ती लड़ते थे.

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जब 1 घंटा 2 मिनट तक चला था खूंखार मुकाबलासाल 1977 में 'बिहार केसरी' का खिताब जीतने वाले विवेका पहलवान ने उस दौर के एशिया चैंपियन सतपाल, करतार सिंह, सुखचैन और कदीम जैसे दिग्गजों से लोहा लिया था. सतपाल से वह महज एक पॉइंट से हारे थे. उनका सबसे रोचक मुकाबला पटना में लाल बाबू पहलवान के साथ हुआ था. उस वक्त विवेका पहलवान की उम्र महज 18 साल थी. तत्कालीन खेल मंत्री राम लखन सिंह यादव की मौजूदगी में दोनों के बीच 1 घंटा और 2 मिनट तक खूंखार कुश्ती चली थी, जिसमें विवेका पहलवान ने लाल बाबू को पछाड़ कर इतिहास रच दिया था.

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क्यों हो रहा है यह आयोजन?विवेका पहलवान के भतीजे जसवीर कुमार और भाई अरविंद सिंह का कहना है कि गांव-देहात से पहलवानी का शौक खत्म हो रहा है. आज के पहलवानों में पहले जैसा 'दम-खम' नहीं दिखता. इस महादंगल का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को मोबाइल और टीवी से निकालकर दोबारा मिट्टी के अखाड़ों से जोड़ना और इस पारंपरिक खेल को जिंदा करना है.
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