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क्या है बिहार में सुशासन का नया मॉडल? जान लीजिए अंदर की बात

नए मॉडल में मुख्यमंत्री खुद मामलों की समीक्षा करेंगे. इससे यह संदेश जाएगा कि सरकार जनता की आवाज़ को गंभीरता से सुन रही है और फ़ाइलों में उलझाने के बजाय सीधा समाधान देना चाहती है.

क्या है बिहार में सुशासन का नया मॉडल? जान लीजिए अंदर की बात
सुशासन का नया मॉडल लाने की तैयारी में नीतीश कुमार
पटना:

बिहार की राजनीति और प्रशासन में सुशासन लंबे समय से एक प्रमुख शब्द रहा है. अब इसी सुशासन को ज़मीनी स्तर पर और मज़बूत करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक नई पहल शुरू की है. इस नए मॉडल के तहत मुख्यमंत्री अब हर सोमवार और शुक्रवार को आम लोगों की समस्याओं को सीधे सुनेंगे और समाधान की दिशा में तत्काल कार्रवाई करेंगे. सरकार का दावा है कि इससे न केवल शिकायतों का निपटारा तेज़ होगा, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी बढ़ेगी.अब तक आमतौर पर जनता की शिकायतें ज़िलों, प्रमंडलों और विभागों के ज़रिये ऊपर तक पहुंचती थीं. इस प्रक्रिया में कई बार देरी होती थी और शिकायतकर्ता को महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता था.

इस वजह से खास है नया मॉडल

नए मॉडल में मुख्यमंत्री खुद मामलों की समीक्षा करेंगे. इससे यह संदेश जाएगा कि सरकार जनता की आवाज़ को गंभीरता से सुन रही है और फ़ाइलों में उलझाने के बजाय सीधा समाधान देना चाहती है. सरकारी सूत्रों के अनुसार, सोमवार और शुक्रवार को मुख्यमंत्री सचिवालय में प्राप्त शिकायतों, जनसुनवाई के मामलों और ज़िलों से आई रिपोर्टों की समीक्षा करेंगे. जिन मामलों में निचले स्तर पर लापरवाही पाई जाएगी, वहां संबंधित अधिकारियों को तत्काल निर्देश दिए जाएंगे. गंभीर मामलों में मुख्यमंत्री स्वयं हस्तक्षेप कर समाधान की समय-सीमा तय करेंगे.

इस प्रक्रिया में तकनीक की भी मदद ली जा रही है. ऑनलाइन शिकायत पोर्टल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ज़िला प्रशासन से सीधे संवाद के ज़रिये समस्याओं को समझा जाएगा.इस पहल का सबसे बड़ा असर प्रशासनिक अमले पर पड़ने की उम्मीद है. अब अधिकारियों को यह पता होगा कि उनकी कार्यप्रणाली पर सीधे मुख्यमंत्री की नज़र है. इससे फाइलों को लंबित रखने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी. सरकार मानती है कि जब शीर्ष स्तर से नियमित निगरानी होगी, तो नीचे तक काम करने का दबाव बनेगा और जवाबदेही तय होगी.

सिर्फ प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं

यह पहल केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक राजनीतिक संदेश भी है. विपक्ष लंबे समय से सरकार पर यह आरोप लगाता रहा है कि ज़मीनी स्तर पर शिकायतों का समाधान नहीं हो रहा. ऐसे में मुख्यमंत्री का खुद सामने आकर समाधान करना यह दिखाता है कि सरकार जनता से कट नहीं रही है. आने वाले समय में इसका असर राजनीतिक माहौल पर भी पड़ सकता है.
यह पहली बार नहीं है जब नीतीश कुमार ने जनता से सीधे जुड़ने का प्रयास किया हो. इससे पहले भी “जनता दरबार” और समीक्षा बैठकों के ज़रिये

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं. लेकिन अब सप्ताह में दो दिन तय कर देना इस पहल को संस्थागत रूप देता है. इससे यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि नियमित व्यवस्था बन जाएगी. इस मॉडल का सबसे बड़ा लाभ आम लोगों को मिलने की उम्मीद है. गांवों, कस्बों और शहरों से आने वाली शिकायतें चाहे वह सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा या स्वास्थ्य से जुड़ी हों अब सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचेंगी. इससे लोगों का भरोसा बढ़ेगा कि उनकी बात सुनी जा रही है और समाधान की संभावना भी मजबूत होगी.

हालांकि, इस मॉडल के सामने चुनौतियां भी हैं. मुख्यमंत्री के सामने आने वाली शिकायतों की संख्या बहुत अधिक हो सकती है. ऐसे में हर मामले पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा. इसके लिए एक मजबूत फॉलो-अप सिस्टम की ज़रूरत होगी, ताकि निर्देशों का पालन हो और समाधान केवल कागज़ों तक सीमित न रहे. कुल मिलाकर, हर सोमवार और शुक्रवार को सीधा समाधान करने की पहल बिहार में सुशासन को नई दिशा देने की कोशिश है. अगर यह मॉडल सही तरीके से लागू होता है और ज़मीनी स्तर पर असर दिखाता है, तो यह अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है. अब देखने वाली बात यह होगी कि यह पहल सिर्फ घोषणा बनकर रह जाती है या सचमुच जनता के जीवन में बदलाव लाती है.

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