बूंद-बूंद से सागर भरता है यह कहावत पुरानी है, लेकिन मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड अंतर्गत रामपुर पंचायत के तेरासी टोला में इस कहावत का एक नया रूप दिखाई दे रहा है. यहां बूंद-बूंद पानी से नहीं, बल्कि 500-500 रुपये से उम्मीद जोड़ी गई है. पक्की सड़क की राह देखते गांव के करीब 200 परिवारों ने सरकारी योजना की आस छोड़कर अपनी जेब से पैसे निकाले और सड़क बनाया.
इसके लिए किसी ने ट्रैक्टर लगाया, किसी ने मिट्टी डाली, किसी ने कुदाल उठाई और किसी ने फावड़ा. क्योंकि ग्रामीणों के मुताबिक, जिस सड़क का इंतजार लंबे समय से था उसका इंतजार खत्म नहीं हुआ. तो गांव ने कहा अब हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठेंगे.
लेकिन एक सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों ग्रामीणों को खुद के पैसे और संसाधनों से सड़क बनानी पड़ी और इसके लिए चंदा जुटाना पड़ा?
ये सिर्फ सड़क नहीं
एनडीटीवी गांव के इस रास्ते पर पहुंची तो देखा कि सामने कीचड़,गड्ढे,पानी और फिसलन है. ये सिस्टम की पोल भी खोल रहे थे. लेकिन जरा सोचिए, इसी रास्ते पर करीब 200 परिवारों की पूरी जिंदगी चलती है.
बच्चों को स्कूल जाना है तो यही रास्ता. मजदूरों को काम पर जाना है तो यही रास्ता. बुजुर्गों को बाजार जाना है तो यही रास्ता. किसी परिवार को जरूरी सामान लाना है तो यही रास्ता. और अगर अचानक कोई बीमार पड़ जाए तो अस्पताल जाने की शुरुआत भी इसी रास्ते से होती है.
ग्रामीण बताते हैं कि इस रास्ते से बरसात के मौसम में हालात और भी बदतर हो जाते हैं. कहीं पैर धंसता है. कहीं बाइक फिसलती है, कहीं पानी रास्ता रोकता है. यानी जिस सड़क से जिंदगी आगे बढ़नी चाहिए, वही रास्ता कदम रोक देता है.

लंबी है इंतजार की शाम
ग्रामीणों के मुताबिक, सड़क को लेकर कई बार आवाज उठाई गई. जनप्रतिनिधियों से गुहार ,अधिकारियों तक समस्या और हर बार उम्मीद कि अब कुछ होगा. लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इंतजार लंबा होता गया. दिन बीते, महीने बीते, साल बीते, बारिश आई, कीचड़ आया, लेकिन इस रास्ते पर सड़क न आ सकी.
गांव वालों ने स्थानीय विधायक से भी इस बारे में बात की थी, लेकिन एक बार फिर उन्हें निराशा हाथ लगी. फिर गांव में एक सवाल उठा आखिर कब तक इंतजार? और इसी सवाल ने कहानी की दिशा बदल दी. ग्रामीणों ने तय किया अब कोई आए या न आए हम खुद रास्ता बनाने की कोशिश करेंगे.
चंदे से बनाई सड़क
गांव के लोगों ने तय किया कि 500 रुपये के चंदे से इस रास्ते पर सड़क बनाई जाएगी. किसी ने अपनी जरूरतों में कटौती की होगी, किसी ने घर के खर्च से पैसे निकाले होंगे, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक लोगों ने योगदान दिया, क्योंकि उनके सामने और कोई चारा न था.
फिर पैसे के साथ लोगों ने अपना श्रम भी दिया. किसी ने ट्रैक्टर लगाया,किसी ने मिट्टी पहुंचाई, किसी ने कुदाल उठाई, किसी ने फावड़ा चलाया. और देखते ही देखते रास्ता सुधारने की कोशिश गांव के सामूहिक अभियान में बदल गई. कहावत है,एक और एक ग्यारह होते हैं.

तेरासी टोला के लोगों ने शायद इसी कहावत को जमीन पर उतार दिया.अकेले 500 रुपये शायद बहुत कम हों, लेकिन जब सैकड़ों हाथ साथ आए तो रास्ता बनाने की शुरुआत हो गई.
एक ग्रामीण में NDTV को बताया, "हम लोगों ने 500-500 रुपये चंदा किया है. सड़क बहुत खराब है. बरसात में चलना मुश्किल हो जाता है. इसलिए हमलोग खुद रास्ता ठीक कर रहे हैं. सबसे बड़ा दर्द बेटी की शादी है.
ग्रामीणों के मुताबिक, जब किसी घर में बेटी की शादी तय होती है तो खुशी के साथ एक सवाल भी सामने आता है. बारात गांव तक पहुंचेगी कैसे? अगर बारिश हुई तो?
अगर सड़क पर कीचड़ हुआ तो अगर गाड़ियां रास्ते में फंस गई तो?
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की खराब हालत की वजह से रिश्तों पर भी असर पड़ता है और कुछ लोग यहां रिश्ता करने से हिचकिचाते हैं. एक पिता के लिए बेटी की शादी जिंदगी का सबसे खुशी वाला मौका होता है.
(ये स्टोरी बिहार से रमण कुमार की मदद से तैयार की गई है.)
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