बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार.
- बिहार में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री छात्र राजनीति से उठे हैं.
- लालू यादव भी छात्र राजनीति की देन हैं.
- पिछले काफी समय से विश्विद्यालयों में नहीं हुए चुनाव.
पटना:
बिहार में भले पिछले 27 वर्षों से सत्ता पर छात्र राजनीति से उठकर आये लोग सत्ता में हैं लेकिन इसका एक कड़वा सच यह भी है इनके शासन में छात्र संघ के चुनाव मात्र एक से दो बार से ज़्यादा नहीं हुए. बिहार के नए राज्यपाल सत्यपाल मलिक को जब ये मालूम चला तो उन्होंने अब चुनाव नियमित कैसे हो इसके लिए एक समिति का गठन किया है. राज्यपाल ने चुनावों के लिए नियमावली बनाने के लिए एक तीन सदस्य कमिटी का गठन किया है. इसमें राज्य के तीन अलग-अलग विश्वविधायलय के कुलपति शामिल हैं. राज्य में पिछली बार 2012 में छात्र संघ के चुनाव हुए थे. राज्यपाल जो राज्य के सभी विश्वविधायलय के कुलाधिपति भी होते हैं समिति के सदस्यों के अनुसार चाहते हैं कि छात्र संघ के चुनाव नियमित हों.
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हालाँकि राज्य में इन चुनाव के अभाव में कॉलेज और विश्वविधायलय को इसका नुक़सान भी उठाना पड़ता है. NAAC की मान्यता लेने में इस आधार पर आकड़ों में कटौती भी होती है. इसके अलावा छात्र पूरी पढ़ाई कर निकल जाते हैं लेकिन छात्र संघ क्या होता है उसका कोई ज्ञान नहीं होता. और उनकी समस्या की सुध लेने वाला भी कोई नहीं होता.
VIDEO: यह कैसा काम
बिहार की वर्तमान राजनीति में रामविलास पासवान के अलावा वो चाहे लालू यादव हों या नीतीश कुमार या सुशील मोदी सब छात्र राजनीति से ही सक्रिय राजनीति में आए. आज भी ये लोग मानते हैं कि छात्र राजनीति के बिना इनका राजनीतिक सफ़र अधूरा है, लेकिन यह भी सच है कि सत्ता पाने के बाद छात्र राजनीति ख़ासकर कॉलेज में चुनाव कराने में इन्होंने कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई.
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