- बिहार में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार के नजदीक आते ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं हैं
- मंत्रीमंडल विस्तार में जातीय और सामाजिक संतुलन बनाए रखना पार्टी नेतृत्व के लिए प्रमुख चुनौती बनी रहती है
- कई नेता सामाजिक सम्मेलनों, जयंती और स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से अपनी राजनीतिक ताकत और प्रभाव दिखा रहे हैं
बिहार में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से पहले एक बार फिर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि जैसे-जैसे विस्तार की घड़ी नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे कई नेता अपनी ताकत दिखाने में जुट गए हैं. इसके लिए सामाजिक और ऐतिहासिक आयोजनों का सहारा लिया जा रहा है. कहीं जयंती है, कहीं पुण्यतिथि, तो कहीं समाजिक सम्मेलन—मकसद एक ही है, शीर्ष नेतृत्व को यह संदेश देना कि “हम भी दावेदार हैं.”
नीतीश कुमार को खुश करने की कोशिश
हाल ही में महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि के मौके पर जदयू के एमएलसी संजय सिंह ने राजपूत समाज के नेताओं और कार्यकर्ताओं का बड़ा जुटान किया. यह आयोजन औपचारिक तौर पर श्रद्धांजलि सभा थी, लेकिन सियासी जानकारों का मानना है कि इसके पीछे साफ राजनीतिक संकेत छिपा था. इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में राजपूत नेता, सामाजिक प्रतिनिधि और कार्यकर्ता जुटे. यही नहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी औपचारिक निमंत्रण दिया गया. इससे यह संदेश गया कि आयोजन करने वाले नेता की पहुंच और पकड़ दोनों है.
हर बार होता है ऐसा
बिहार में जब-जब मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा होती है, तब-तब नेताओं की गतिविधियां अचानक बढ़ जाती हैं. कोई अपने क्षेत्र में कार्यक्रम करता है, तो कोई राजधानी में लगातार मौजूद रहकर मुलाकातों का दौर तेज कर देता है. इस बार भी कुछ ऐसा ही माहौल है.बिहार की राजनीति में जातीय और सामाजिक संतुलन हमेशा से अहम रहा है. मंत्रिमंडल विस्तार के वक्त भी इस संतुलन को ध्यान में रखा जाता है. राजपूत समाज, पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक, हर वर्ग के नेताओं की कोशिश है कि वे यह दिखा सकें कि उनके साथ समाज का समर्थन है. इसी रणनीति के तहत कई नेता समाजिक सभाएं, जयंती-पुण्यतिथि आयोजन और सम्मान समारोह जैसे कार्यक्रम कर रहे हैं.
ऐसे आयोजनों का असली मकसद मंच से भाषण देना नहीं, बल्कि संदेश देना होता है.संदेश यह कि नेता के पास भीड़ जुटाने की क्षमता है, वह अपने समाज या इलाके में प्रभाव रखता है और चुनावी समय में वह उपयोगी साबित हो सकता है . यही कारण है कि इन आयोजनों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भी जमकर साझा किए जाते है.
कई नेता लगे हैं लाइन में
किसी भी सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को न्योता देना अपने आप में एक राजनीतिक संकेत माना जाता है. इससे यह दिखाया जाता है कि आयोजन करने वाला नेता पार्टी नेतृत्व के करीब है. महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि पर हुए आयोजन में मुख्यमंत्री को न्योता देकर यह साफ संदेश दिया गया कि कार्यक्रम केवल समाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है.ऐसा नहीं है कि सिर्फ संजय सिंह ही सक्रिय हैं. बिहार के अलग-अलग हिस्सों में विधायक, एमएलसी और संगठन के पदाधिकारी अपने-अपने स्तर पर कार्यक्रम कर रहे हैं. कोई स्वास्थ्य शिविर लगा रहा है, कोई धार्मिक आयोजन कर रहा है, तो कोई समाजिक सम्मेलन के बहाने अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है. इन सभी के मन में एक ही उम्मीद है, मंत्रिमंडल में जगह.
पार्टी नेतृत्व के सामने भी चुनौती
पार्टी नेतृत्व के सामने भी चुनौती आसान नहीं है. मंत्रिमंडल विस्तार में संगठन को संतुष्ट करना, सामाजिक संतुलन बनाना और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व देना. सब कुछ एक साथ देखना होता है. इसलिए कई बार दावेदारों की लंबी सूची होने के बावजूद सीमित लोगों को ही मौका मिल पाता है. हालांकि, इस तरह के शक्ति प्रदर्शन का जोखिम भी है. अगर कोई नेता जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाता है, तो यह उलटा असर भी डाल सकता है. पार्टी नेतृत्व अक्सर यह देखता है कि कौन अनुशासित है और कौन सिर्फ दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है.
सभी दिखा रहे अपनी ताकत
इन तमाम आयोजनों से एक बात साफ है कि बिहार की राजनीति इस समय अंदरूनी प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है. मंत्रिमंडल विस्तार भले अभी हुआ न हो, लेकिन उसकी आहट ने नेताओं को मैदान में उतार दिया है. कुल मिलाकर, बिहार में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से पहले श्रद्धांजलि और सामाजिक आयोजनों के बहाने ताकत दिखाने की राजनीति तेज हो गई है. जदयू एमएलसी संजय सिंह का आयोजन हो या अन्य नेताओं की सक्रियता—सबका मकसद अपनी दावेदारी मजबूत करना है. अब देखना यह है कि पार्टी नेतृत्व इन संदेशों को कैसे पढ़ता है और मंत्रिमंडल विस्तार में किसे मौका मिलता है. फिलहाल इतना तय है कि बिहार की सियासत में यह दौर शांत नहीं, बल्कि बेहद सक्रिय है.
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