- बेगूसराय के नोनपुर गांव में एसटीएफ और जिला पुलिस ने नक्सली दयानंद मालाकार को मुठभेड़ में मार गिराया था
- दयानंद मालाकार और ममता देवी की नक्सली गतिविधियों के दौरान हुई मुलाकात से प्रेम संबंध शुरू हुआ था
- दोनों ने परिवार और समाज के विरोध के बावजूद मंदिर में शादी कर अपराध की दुनिया में साथ काम किया
बेगूसराय में 31 दिसंबर की शाम हुई पुलिस मुठभेड़ ने एक ऐसे नक्सली प्रेम कहानी का अंत कर दिया, जिसकी चर्चा आज पूरे बिहार में हो रही है. यह कहानी रील की नहीं, बल्कि रियल लाइफ की है, जिसमें इश्क, बगावत, बंदूक और फिर मौत का खौफनाक मंजर शामिल है.
सुर्खियों में क्यों है यह प्रेम कहानी?
हाल ही में बेगूसराय के नोनपुर गांव में एसटीएफ (STF) और जिला पुलिस ने एक साझा ऑपरेशन में कुख्यात नक्सली दयानंद मालाकार को मार गिराया. दयानंद की मौत के साथ ही उसकी पत्नी ममता देवी की गिरफ्तारी हुई. पुलिस जांच में जो सच सामने आया, वह किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसा है. यह कहानी बताती है कि कैसे नक्सली विचारधारा के बीच दो दिल मिले, समाज और परिवार से बगावत की और अंततः अपराध की दुनिया ने उनका घर उजाड़ दिया.
'बंदूक' के साये में शुरू हुआ था इश्क
दयानंद मालाकार और ममता देवी की मुलाकात नक्सली गतिविधियों के दौरान ही हुई थी. दयानंद, जो 1999 में महज 19 साल की उम्र में खगड़िया के अलौली में पहली हत्या कर अपराध की दुनिया में कदम रख चुका था, संगठन के लिए काम करते समय रामभरोस सहनी की बेटी ममता के संपर्क में आया. ममता भी कम उम्र में ही नक्सली संगठन से जुड़ चुकी थी. दयानंद 'माली' जाति से था और ममता 'सहनी' समाज से. दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ा, तो जाति की दीवारें और नक्सली संगठनों के नियम आड़े आने लगे.

परिवार से बगावत और मंदिर में शादी
जब ममता ने अपने पिता को दयानंद के बारे में बताया, तो उन्हें भारी विरोध और डांट का सामना करना पड़ा. दोनों के परिवार इस रिश्ते के खिलाफ थे. लेकिन जुनून ऐसा था कि दोनों ने छिप-छिप कर मिलना जारी रखा. अंततः दुनिया और अपनों की बंदिशों को तोड़ते हुए उन्होंने मंदिर में शादी रचा ली.

अपराध की दुनिया में 'राइट हैंड' बनी पत्नी
शादी के बाद यह जोड़ा आम जिंदगी जीने के बजाय अपराध के दलदल में और गहरे उतर गया. दयानंद बिहार के कई जिलों (खगड़िया, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय) में आतंक का पर्याय बन गया, तो ममता उसकी 'राइट हैंड' बनकर हर वारदात में साथ देने लगी. दयानंद पर हत्या, रंगदारी और नक्सली वारदातों के 20 से ज्यादा मामले दर्ज थे. वहीं, ममता पर हत्या, आर्म्स एक्ट, सीएल एक्ट और विस्फोटक अधिनियम के तहत कई मामले दर्ज हैं. वह पहले भी जेल जा चुकी है. दोनों ने मिलकर नोनपुर गांव में एक जमींदार की जमीन पर जबरन लाल झंडा गाड़कर कब्जा किया और वहीं अपना ठिकाना बना लिया था.

31 दिसंबर की वो आखिरी रात
पुलिस की फाइलों में 2018 के बाद से दयानंद एक बड़ी चुनौती बना हुआ था. 31 दिसंबर की शाम एसटीएफ को सूचना मिली कि वह अपने घर पर है. पुलिस ने घेराबंदी की, तो दयानंद ने सरेंडर करने के बजाय फायरिंग शुरू कर दी. जवाबी कार्रवाई में दयानंद मारा गया. पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में हथियार, कारतूस और नक्सली पर्चे बरामद किए.
सलाखों के पीछे 'अधूरी' कहानी
आज दयानंद मालाकार मिट्टी में मिल चुका है, और उसकी प्रेमिका से पत्नी बनी ममता देवी एक बार फिर सलाखों के पीछे है. जो इश्क बंदूकों की गूंज के बीच शुरू हुआ था, उसका अंत पुलिस की गोलियों और जेल की तन्हाई के साथ हुआ. बेगूसराय का यह एनकाउंटर इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसने एक कुख्यात अपराधी के अंत के साथ-साथ एक खूनी प्रेम कहानी का भी पटाक्षेप कर दिया है.
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