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भगवान को 'गोद' लेने की अनोखी होड़! प्रभु के माता-पिता बनने के लिए भक्त लगाते हैं लाखों की बोली

पत्थर में प्राण फूंकने की वह पावन घड़ी और साक्षात भगवान का माता-पिता बनने का परम सौभाग्य...खंडवा के इस जैन उत्सव में आस्था का ऐसा अनूठा संगम दिखता है कि, आंखें श्रद्धा से भर आएं.

पाषाण से परमात्मा स्वरूप में स्थापित की जाती है प्रतिमा, भगवान के माता पिता बनने के लिए लगाते है बोली

Khandwa Panchkalyanak Mahotsav Jain Tradition: क्या आपने कभी सुना है कि कोई इंसान भगवान का माता-पिता बन सकता है? सुनने में फिल्मी लगता है, लेकिन मध्य प्रदेश के खंडवा में यह हकीकत है. यहां के जैन समाज में एक ऐसी अनोखी रस्म है जहां लोग भगवान के माता-पिता बनने के लिए न सिर्फ दुआएं मांगते हैं, बल्कि बाकायदा बोली भी लगाते हैं. श्रद्धा और समर्पण का यह संगम वाकई देखने लायक है. पत्थर में प्राण फूंकने की वह पावन घड़ी और साक्षात भगवान का माता-पिता बनने का परम सौभाग्य...खंडवा के इस जैन उत्सव में आस्था का ऐसा अनूठा संगम दिखता है कि आंखें श्रद्धा से भर आएं.

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अक्सर आपने सुना होगा कि कोई दंपत्ति बच्चों को गोद लेकर उनके माता-पिता बनते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के खंडवा में जैन समाज की एक ऐसी परंपरा है जो दिल को छू लेती है. यहां भगवान का माता-पिता बनने के लिए भक्त बोली लगाते हैं. शायद ये बात आप को अजीबोगरीब लगे, लेकिन पिछले 45 सालों से इस परंपरा का निर्वहन खंडवा का जैन समाज कर रहा है. जैन समाज में यह एक बेहद पवित्र और दुर्लभ अवसर माना जाता है, जिसे पाने के लिए लोग सालों तक तपस्या और त्याग करते हैं.

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पाषाण से परमात्मा बनने का पावन सफर (Sacred Journey from Stone to Divinity)

दरअसल, खंडवा के 45 साल पुराने महावीर दिगंबर जैन मंदिर में पांच दिवसीय भव्य पंचकल्याणक महोत्सव का आयोजन होने जा रहा है. यह आयोजन घासपुरा क्षेत्र में मुनिश्री आदित्य सागर महाराज के सानिध्य में होगा. 'पंचकल्याणक महोत्सव' जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान होता है, जिसमें भगवान की पाषाण प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है और उन्हें पाषाण से परमात्मा स्वरूप में स्थापित किया जाता है.

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जब भक्त बनते हैं भगवान के माता-पिता (When Devotees become Parents of the Divine)

इस पूरे आयोजन की सबसे खास बात यह है कि, इसमें भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य भी श्रद्धालुओं को मिलता है. इसके लिए समाज के लोग पर्चियों और बोली के माध्यम से चयन प्रक्रिया में शामिल होते हैं. कई लोग इस अवसर को पाने के लिए पहले से ही अपनी इच्छा जताते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय गुरु और समाज की परंपरा के अनुसार ही लिया जाता है. जैन समाज में भगवान के माता-पिता बनना केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना जाता है. इसके लिए व्यक्ति को अपने जीवन में कई तरह के त्याग करने पड़ते हैं, अपने व्यवहार और दिनचर्या में बदलाव लाना पड़ता है. इसके बाद ही वह इस योग्य माना जाता है.

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इंद्र दरबार और अटूट श्रद्धा की बोली (Indra Darbar and the Bidding of Faith)

जैन समाज के सचिव सुनील जैन ने बताया कि, पंचकल्याणक के दौरान पांच दिनों तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिनमें भगवान के जीवन के पांच प्रमुख कल्याणकों का वर्णन किया जाता है. इन पांच दिनों में इंद्र दरबार सजता है, जिसमें इंद्र-इंद्राणी बनने का भी अवसर मिलता है. इसके लिए भी समाज के लोग स्वेच्छा से भाग लेते हैं और कई बार लाखों रुपये तक की बोली लगाई जाती है. उन्होंने बताया कि इस बार इस आयोजन को लेकर पूरे निमाड़ क्षेत्र में खासा उत्साह है. कई श्रद्धालु भगवान की सेवा और आयोजन में भाग लेने के लिए आगे आ रहे हैं. 

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भगवान के माता-पिता बनने के लिए लगी लाइन! (bhagwan ke mata pita banne ka mauka)

जानकारी के मुताबिक, कुछ लोगों ने इस आयोजन में सेवा के लिए लाखों रुपये तक की बोली लगाई है, जिससे यह आयोजन और भी भव्य बनने जा रहा है. हालांकि, समाज के लोगों का कहना है कि, जैन धर्म में अमीर-गरीब सभी समान होते हैं, लेकिन यह परंपरा आस्था और श्रद्धा से जुड़ी हुई है, जो वर्षों से चली आ रही है. इसमें भाग लेने वाले लोग इसे सौभाग्य मानते हैं और पूरे मन से इसमें शामिल होते हैं. ऐसे में खंडवा का यह पंचकल्याणक महोत्सव न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं के कारण लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र भी बना हुआ है. जहां भगवान के माता-पिता बनने का मौका पाने के लिए लोग पूरी श्रद्धा के साथ आगे आ रहे हैं.

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