
फाइल फोटो
न्यूयॉर्क:
क्या आप अपने मोबाइल, टेलीविजन या टैबलेट का अधिक इस्तेमाल करते हैं? अगर करते हैं तो इसे कम कर दीजिए, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन आपकी नींद उड़ा सकते हैं।
एक ताजा शोध में यह सामने आया है कि इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी का अधिक इस्तेमाल किशोरों की नींद पर बुरा असर डाल सकती है।
रोड आइलैंड स्थित ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि अधिक आयु के युवक/युवतियों की अपेक्षा 9 से 15 वर्ष के बीच के किशोरों और किशोरियों की नींद स्क्रीन की रोशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है।
प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से शोधकर्ताओं ने पाया कि रात में इलेक्ट्रॉनिक उपरकरणों से निकलने वाली तेज रोशनी किशोरों में नींद के हार्मोन 'मेलाटोनिन' को कम कर देता है। जितनी तेज रोशनी होगी उतना ही इन हार्मोंस पर असर पड़ेगा।
मनोचिकित्सा और मानव व्यवहार की प्रोफेसर और लेखिका मैरी कार्सकादोन ने कहा कि रात में मोबाइल और अन्य उपकरणों से निकली कम मात्रा की रोशनी भी नींद को प्रभावित करने के लिए काफी है। इससे रात को नींद आने में और सुबह स्कूल के लिए जल्दी उठने में काफी मुश्किल होती है।
बच्चों और उनके अभिभावकों को सोते समय अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल कम करना चाहिए। 'क्लीनिकल एंडोक्राइनोलॉजी एंड मैटाबॉलिज्म' पत्रिका में यह शोध प्रकाशित हुआ।
एक ताजा शोध में यह सामने आया है कि इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी का अधिक इस्तेमाल किशोरों की नींद पर बुरा असर डाल सकती है।
रोड आइलैंड स्थित ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि अधिक आयु के युवक/युवतियों की अपेक्षा 9 से 15 वर्ष के बीच के किशोरों और किशोरियों की नींद स्क्रीन की रोशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है।
प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से शोधकर्ताओं ने पाया कि रात में इलेक्ट्रॉनिक उपरकरणों से निकलने वाली तेज रोशनी किशोरों में नींद के हार्मोन 'मेलाटोनिन' को कम कर देता है। जितनी तेज रोशनी होगी उतना ही इन हार्मोंस पर असर पड़ेगा।
मनोचिकित्सा और मानव व्यवहार की प्रोफेसर और लेखिका मैरी कार्सकादोन ने कहा कि रात में मोबाइल और अन्य उपकरणों से निकली कम मात्रा की रोशनी भी नींद को प्रभावित करने के लिए काफी है। इससे रात को नींद आने में और सुबह स्कूल के लिए जल्दी उठने में काफी मुश्किल होती है।
बच्चों और उनके अभिभावकों को सोते समय अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल कम करना चाहिए। 'क्लीनिकल एंडोक्राइनोलॉजी एंड मैटाबॉलिज्म' पत्रिका में यह शोध प्रकाशित हुआ।
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