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नॉर्वे के छोटे से शहर लॉन्गइयरबेन में मौत पर पाबंदी है.
नार्वे स्थित इस आइसलैंड पर खून जमा देने वाली ठंड पड़ती है.
सर्दियों के मौसम में यहां का तापमान हद से ज्यादा कम हो जाता है.
अब आइए, आपको बताते हैं कि आखिर क्यों यहां मरना मना है. जी हां, आपको भले इस बात पर विश्वास न हो, लेकिन यह बात बिल्कुल सच है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नॉर्वे के छोटे से शहर लॉन्गइयरबेन में वहां के प्रशासन ने मौत पर पाबंदी लगा दी है. नार्वे और उत्री ध्रुव के बीच स्थित इस आइसलैंड पर खून जमा देने वाली ठंड पड़ती है. सर्दियों के मौसम में यहां का तापमान इतना कम हो जाता है कि जिंदगी मुश्किल हो जाती है.
मीडिया रिपोर्ट की माने तो 2000 के आबादी वाले इस शहर में लोगों को मरने की इजाजत नहीं है. प्रशासन द्वारा पाबंदी लगाए जाने के बाद पिछले 70 साल से यहां कोई मौत नहीं हुई है. दरअसल, इस पाबंदी के पीछे वजह काफी बड़ी है. बता दें, यहां पड़ने वाली कड़ाके की ठंड की वजह से यहां डेड बॉडी सालों तक ज्यों की त्यों पड़ी रहती है. ठंड की वजह से वह न गलती है और न ही सड़ती है और यही वजह कि सालों तक शव वैसे का वैसा ही रह जाता है.
एक शोध में यह पाया गया कि साल 1917 में जिस शख्स की मौत इनफ्लुएंजा की वजह से हुई उसके शव में इनफ्लुएंजा के वायरस जस के तस पड़े थे. यहां बता दें, इनफ्लुएंजा एक विशेष समूह के वायरस के कारण मानव समुदाय में होनेवाला एक संक्रामक रोग है. इस बीमारी में इंसान बुखार की चपेट में आ जाता है और वह बहुत ज्यादा कमजोर हो जाता है. यह बीमारी महामारी के रूप में फैलता है.
बीमारी फैलना का खतरा मंडराने के बाद वहां की प्रशासन ने इस शहर में मौत पर पाबंदी लगा दी. ऐसे में यहां जैसे ही कोई मरने वाला होता है या कोई इमरजेंसी आती है, तो उस व्यक्ति को हेलिकॉप्टर से देश के दूसरे इलाके में ले जाता है, और मरने के बाद वहीं पर उसका अंतिम संस्कार किया जाता है.
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