- ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के लिए सीजफायर हुआ, जिसके तहत होर्मुज स्ट्रेट खोला गया था
- ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल टैंकरों से प्रति बैरल एक डॉलर टोल वसूलने की योजना बना रहा है
- टोल वसूली के लिए जहाजों को अपने माल की जानकारी ईमेल से देनी होगी और टोल क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान करना होगा
ईरान-अमेरिका में सीजफायर हो गया है. सीजफायर दो हफ्ते के लिए हुआ है. समझौते के तहत ईरान को होर्मुज स्ट्रेट खोलना था, ताकि वहां से जहाज निकल सकें. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को खोला भी लेकिन लेबनान पर इजरायली हमलों के बाद इसे फिर से बंद कर दिया है. इस बीच ऐसी भी खबरें हैं कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल टैंकरों से टोल वसलूने की तैयारी कर रहा है. ईरान ने चेतावनी दी है कि कोई भी जहाज अगर बगैर मंजूरी के यहां से निकलता है तो उस पर हमले किए जाएंगे.
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान अब शिपिंग कंपनियों से होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल टैंकरों के लिए टोल वसूलेगा, क्योंकि वह सीजफायर के दौरान इस पर अपना कंट्रोल बनाए रखना चाहता है.
ईरान के तेल, गैस और पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स एक्सपोर्टर्स यूनियन के प्रवक्ता हामिद होसैनी ने बताया कि हर जहाज को अपने माल के बारे में ईमेल से जानकारी देनी होगी, जिसके बाद ईरान उन्हें बताएगा कि क्रिप्टो में कितना टोल चुकाना है? उन्होंने कहा कि 1 बैरल तेल पर 1 डॉलर का टोल लगाया जाएगा. हालांकि, खाली टैंकर बिना किसी रोक-टोक के यहां से गुजर सकते हैं.
लेकिन वह ऐसा क्यों करेगा? क्योंकि होसैनी का कहना है कि ईरान इस पर नजर रखेगा कि होर्मुज के रास्ते से क्या आ-जा रहा है, ताकि यह पुख्ता किया जा सके कि हथियारों की हेराफेरी तो नहीं हो रही.
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ईरान को इससे क्या फायदा होगा?
अभी जो समझौता हुआ है, उसमें होर्मुज स्ट्रेट सबसे अहम मुद्दा है. 28 फरवरी से जंग शुरू होने से पहले तक होर्मुज स्ट्रेट से बिना किसी रोक-टोक के जहाज गुजर रहे थे. लेकिन जंग शुरू होने के बाद ईरान ने इसे बंद कर दिया.
अब अगर अमेरिका के साथ कोई स्थायी समझौता होता है तो वह इसी शर्त पर होगा कि होर्मुज को पूरी तरह से खोल दिया जाए. 40 दिन की जंग में ईरान ने दिखा दिया है कि होर्मुज से गुजरना है तो उसकी इजाजत जरूरी है.
ईरान अब होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह से अपना कंट्रोल चाहता है. वह इस इलाके में अपना दबदबा बनाना चाहता है. अगर वह टोल वसूलता है तो इससे खाड़ी देशों पर भी दबाव बनेगा और मिडिल ईस्ट में ईरान एक नई ताकत बनकर उभरेगा.
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज का पूरा कंट्रोल ईरान के पास आता है तो इससे तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ के भीतर पावर बैलेंस भी बिगड़ सकता है, क्योंकि इससे ईरान के पास अपने प्रतिद्वंद्वियों के तेल पर 'VETO' लगाने का अधिकार मिल सकता है.
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भारत पर भी पड़ेगा असर
अभी तक जो खबरें आई हैं, उससे साफ है कि जंग रुकने के बाद होर्मुज के रास्ते व्यापार करना काफी महंगा हो जाएगा. ईरान 1 बैरल तेल पर 1 डॉलर का 'टोल' लगाएगा. अमेरिका भी ऐसा चाहता है. अमेरिका चाहता है कि वह ईरान के साथ मिलकर टोल वसूले. इससे दोनों को फायदा होगा. इसका मतलब साफ है कि कुछ भी हो तेल पर 'टोल' तो लगेगा ही.
अगर ऐसा होता है तो इससे भारत पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 80 से 85% कच्चा तेल आयात करता है. भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में दिख सकता है.
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1 बैरल पर 1 डॉलर तेल कैसे असर डालेगा?
इसके लिए थोड़ा गणित समझना होगा. भारत को हर दिन 55 लाख बैरल कच्चा तेल चाहिए. ये कच्चा तेल 40 से ज्यादा देशों से आता है. अच्छी बात ये है कि पहले इसमें से 55% कच्चा तेल होर्मुज के रास्ते आता था. अब 30% कच्चा तेल ही होर्मुज के रास्ते आता है.
55 लाख बैरल का 30% होता है 16.5 लाख बैरल. इस हिसाब से हर दिन 16.5 लाख बैरल कच्चा तेल होर्मुज से आएगा. अब अगर ईरान 1 बैरल तेल पर 1 डॉलर टोल लगाता है तो भारत को हर दिन 16.5 लाख डॉलर ज्यादा चुकाने होंगे. भारतीय करंसी के हिसाब से यह हर दिन लगभग 15 करोड़ रुपये होते हैं. इस हिसाब से भारत को सालभर में साढ़े 5 हजार करोड़ रुपये ज्यादा चुकाने होंगे.
अब यह साढ़े 5 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च या तो सरकार उठाएगी या फिर तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाकर वसूलेंगी. आखिरकार इससे महंगाई बढ़ेगी.
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रुपया भी कमजोर होगा!
अब यहां एक और दिक्कत आएगी. ईरान का कहना है कि वह तेल पर लगने वाले टोल का पेमेंट बिटकॉइन से लेगा. अभी 1 बिटकॉइन की कीमत 71,600 डॉलर यानी करीब 66.3 लाख रुपये है.
अब बिटकॉइन जैसी क्रिप्टो की कीमतों में मिनटों में बदलाव आ जाता है. अगर मान लीजिए कि टोल चुकाते समय बिटकॉइन की कीमत 5% भी बढ़ गई तो इससे 15 करोड़ का एक्स्ट्रा बिल 75 लाख रुपये और बढ़ जाएगा.
ऐसे में जब तेल निकालने के लिए बिटकॉइन में पेमेंट करनी पड़ेगी तो सरकार को बड़ी मात्रा में बिटकॉइन भी खरीदना होगा. इससे बिटकॉइन भी महंगा होगा और भारत का आयात बिल महंगा होगा. और ये सब डॉलर में होगा तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा, जिससे आखिर में रुपया ही कमजोर होगा.
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