- अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के तेल डिपो पर हवाई हमलों के बाद तेहरान में गंभीर प्रदूषण और काली बारिश हुई है
- तेहरान के निवासियों ने सिरदर्द और सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की, साथ ही तेल से दूषित बारिश देखी गई
- ईरानी रेड क्रिसेंट सोसायटी ने हमले के बाद अम्लीय और खतरनाक बारिश की चेतावनी जारी की है
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की ओर से शुरू की गई जंग ने पूरे मिडिल ईस्ट के लोगों की जान पर आफत ला दी है. खासकर ईरान की राजधानी तेहरान में तेल डिपो पर हुए हवाई हमलों के बाद एक चिंताजनक स्थिति सामने आई है. इजरायल की तरफ से किए गए इस हमले के कुछ घंटों बाद तेहरान के कुछ हिस्सों में काली बारिश तक हुई. कुछ मीडिया संस्थानों ने इसे “एसिड रेन” भी बताया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल साधारण एसिड रेन का मामला नहीं हो सकता, बल्कि इससे हवा में गंभीर प्रदूषण और स्वास्थ्य के बड़े खतरे पैदा हो सकते हैं. चलिए समझते हैं कि तेल डिपो पर हुए इस हमले ने कैसे तेहरान के लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर दी है.
ईरान में क्या हो रहा?
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 28 फरवरी को अमेरिकी-इजरायल हमले शुरू होने के बाद से ईरान की राजधानी के आसपास कम से कम चार तेल ठिकानों पर हमले की पुष्टि हुई है. यहां के निवासियों ने कहा कि धुंध और प्रदूषण की वजह से सूरज की किरणें जमीन तक नहीं उतर रही हैं. शहर के कुछ हिस्सों में जलने की तेज गंध आ रही है. तेहरान के लोगों ने बताया कि उन्हें सिरदर्द हो रहा, उन्हें सांस लेने में परेशानी हो रही. उन्हें तेल से दूषित बारिश के कारण इमारतों और कारों पर गंदा पानी जमता हुआ दिखाई दिया.
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लोगों की सेहत के लिए यह क्यों बड़ी चिंता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रमुख टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने पहले ही इस संघर्ष के लोगों की सेहत पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर “गहरी चिंता” जताई है. उन्होंने कहा कि तेल सुविधाओं को नुकसान होने से खाद्य पदार्थ, पानी और हवा प्रदूषित होने का खतरा है. यह खतरा खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए बहुत गंभीर हो सकता है.
इस रिपोर्ट के अनुसार यूनिवर्सिटी ऑफ लीसेस्टर में पर्यावरणीय महामारी विज्ञान की प्रोफेसर अन्ना हंसेल ने कहा है कि हवा में बहुत अधिक मात्रा में मौजूद प्रदूषण के ये कण तुरंत फेफड़ों पर असर डालते हैं. "इनके प्रभाव कई सालों तक बने रह सकते हैं, जिससे सांस से जुड़ी बीमारियां बढ़ सकती हैं और कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।”
यूनिवर्सिटी ऑफ रिडिंग में रिसर्च साइंटिस्ट अक्षय देवरस ने कहा कि ईरान में जो हुआ है, वह निश्चित रूप से अभूतपूर्व है, क्योंकि यह सब मिसाइल हमलों और तेल रिफाइनरियों पर हवाई हमलों के कारण हुआ है. उन्होंने कहा कि कई युद्धों में धूल और कणों वाला प्रदूषण बहुत बढ़ जाता है, लेकिन इस मामले में हवा में मौजूद अलग-अलग रसायनों का मिश्रण बिल्कुल असामान्य है.
यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन में वायुमंडलीय रसायन विज्ञान और वायु गुणवत्ता की प्रोफेसर एलोइस मरैस ने भी इससे सहमति जताई है. उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में इस तरह का प्रदूषण केवल तब देखने को मिलता है जब कोई बहुत बड़ा औद्योगिक हादसा हो और पूरी तेल रिफाइनरी विस्फोट से उड़ जाए. यहां इसकी वजह एक जंग है.
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