बस चार दिन के अंदर अमेरिका ईरान पर हमला कर सकता है. अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सेना की बहुत बड़ी तैनाती कर दी है. इसमें जंगी जहाज, युद्धपोत, लड़ाकू विमान और हवा में फ्यूल भरने वाले विमान शामिल हैं. इस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सेना ने ईरान के खिलाफ लंबे समय तक चलने वाले सैन्य अभियान की जमीन तैयार कर ली है. उसे बस इंतजार है राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फाइल आदेश की. CNN और CBS ने बुधवार को बताया कि अमेरिकी सेना इस सप्ताह के अंत तक ईरान पर हमला करने के लिए तैयार हो सकती है. हालांकि खबरों के मुताबिक ट्रंप ने अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है.
बता दें कि ट्रंप ने पिछले साल ईरान पर हमले का आदेश दिया था. उस समय इजरायल ने ईरान के खिलाफ 12 दिनों की जंग छेड़ी थी. इस बार भी वह बार-बार तेहरान को चेतावनी दे चुके हैं कि अगर वार्ता के बावजूद परमाणु समझौता नहीं होता है तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई करेगा. अमेरिका और ईरान के बीच पहले के परमाणु समझौते को खुद ट्रंप ने 2018 में अपने पहले कार्यकाल में खत्म कर दिया था.
चलिए जानते हैं अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में कितनी सैन्य ताकत तैनात कर रखी है.
जंगी जहाजें
एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार इस समय अमेरिका के 13 युद्धपोत मिडिल ईस्ट में हैं. इनमें एक एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन, नौ डिस्ट्रॉयर और तीन लिटोरल कॉम्बैट शिप शामिल हैं. कुछ और जहाज भी वहां भेजे जा रहे हैं. इतना ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड इस समय अटलांटिक महासागर में है और कैरेबियन से मिडिल ईस्ट की ओर जा रहा है. ट्रंप ने इसी महीने की शुरुआत में इसे वहां भेजने का आदेश दिया था. इसके साथ तीन डिस्ट्रॉयर भी हैं.
मिडिल ईस्ट में एक साथ दो अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर होना बहुत ही कम देखा जाता है. इन जहाजों पर दर्जनों लड़ाकू विमान होते हैं और हजारों नाविक तैनात रहते हैं. पिछले साल जून में भी अमेरिका के दो ऐसे बड़े युद्धपोत इस इलाके में थे, जब उसने इजरायल के 12 दिन के हमलों के दौरान ईरान के तीन परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था.
फाइटर जेट्स
ओपन सोर्स से मिलने वाली जानकारी और फ्लाइट ट्रैकिंग वेबसाइट फ्लाइटरडार24 के अनुसार अमेरिका ने बड़ी संख्या में फाइटर जेट्स भी मिडिल ईस्ट में भेजे हैं. इनमें F-22 रैप्टर स्टील्थ फाइटर जेट, F-15 और F-16 लड़ाकू विमान और KC 135 हवा में ईंधन भरने वाले विमान शामिल हैं, जो इन विमानों के लंबे ऑपरेशन के लिए जरूरी होते हैं.
प्रदर्शन, धमकियां और बातचीत
ट्रंप ने यूएसएस लिंकन को मिडिल ईस्ट में भेजने का आदेश उस समय दिया था, जब ईरान में प्रदर्शन हो रहे थे. ये प्रदर्शन शुरू तो आर्थिक संकट के कारण शुरू हुए थे, लेकिन बाद में इस्लामी सरकार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन में बदल गए. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता में आए धार्मिक नेतृत्व ने इन प्रदर्शनों को हिंसा से दबाया. सुप्रीम लीडर खामेनेई ने सत्ता बनाए रखी. ट्रंप ने तब कई बार ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर उसने प्रदर्शनकारियों को मारा तो अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप करेगा. उन्होंने ईरानियों से सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने की अपील भी की थी और कहा था कि मदद रास्ते में है.
हालांकि पिछले महीने ट्रंप हमले का आदेश देने से पीछे हट गए थे. उन्होंने कहा था कि वॉशिंगटन के दबाव में तेहरान ने 800 से ज्यादा फांसी की सजा पर रोक लगाई है. लेकिन इसके बाद उन्होंने फिर से ईरान के खिलाफ धमकियां शुरू कर दीं.
दूसरी तरफ परमाणु समझौते के लिए बातचीत जारी है. मंगलवार को अमेरिका और ईरान के अधिकारियों के बीच जिनेवा में बातचीत हुई. इसका मकसद अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप को रोकना था. ईरान ने बाद में कहा कि दोनों पक्ष किसी समझौते के लिए कुछ मार्गदर्शक सिद्धांतों पर सहमत हुए हैं. लेकिन व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने बुधवार को कहा कि थोड़ी प्रगति जरूर हुई है, लेकिन कई मुद्दों पर दोनों पक्ष अभी भी बहुत दूर हैं. लेविट ने यह भी कहा कि ईरान पर हमला करने के पक्ष में कई कारण और तर्क दिए जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि ईरान के लिए समझौता करना ही सबसे समझदारी होगी.
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