- तालिबान ने अफगानिस्तान में नया कानून लागू किया है जो घरेलू हिंसा को कानूनी मान्यता देता है
- इस कानून के तहत पति अपनी पत्नी को तब तक मार सकता है जब तक हड्डी न टूटे या घाव न बने. अगर करे भी तो सजा सीमित
- नया कानून अफगान समाज को चार वर्गों में बांटता है और अपराध की सजा आरोपी की सामाजिक हैसियत के आधार पर तय होती है
अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. अफगानिस्तान को चलाने वाले तालिबान ने एक नया कानून लागू किया है, जो महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को कानूनी रूप से मान्यता देता है. इस कानून के तहत पति अपनी पत्नी और बच्चों को उस हद तक शारीरिक सजा दे सकता है, जब तक उससे हड्डी न टूटे या खुला घाव न बने. यानी हड्डी नहीं टूटी तो पीटना गलत नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार यह दंड संहिता तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के हस्ताक्षर से लागू हुई है. यह कानून एक तरह की नई जाति व्यवस्था बनाता है, जिसमें सजा इस बात पर निर्भर करती है कि अपराध करने वाला व्यक्ति “आजाद” है या “गुलाम”.
कानून क्या कहता है?
अगर कोई पति बहुत ज्यादा बल प्रयोग करता है और उससे पत्नी के शरीर पर दिखाई देने वाली साफ चोट लगती है या हड्डी टूटती है, तो भी उसे केवल 15 दिन की जेल हो सकती है. इसके अलावा, सजा तभी होगी जब महिला अदालत में हिंसा को साबित कर पाए. महिला को पूरी तरह ढका हुआ रहकर जज को अपनी चोटें दिखानी होंगी. अदालत में उसके साथ उसका पति या कोई पुरुष अभिभावक होना भी जरूरी है. दूसरी तरफ, अगर कोई शादीशुदा महिला अपने पति की अनुमति के बिना अपने रिश्तेदारों के यहां जाती है, तो उसे तीन महीने तक जेल हो सकती है.
कानून का अनुच्छेद 9 अफगान समाज को चार हिस्सों में बांटता है. धार्मिक विद्वान यानी उलेमा, उच्च वर्ग यानी अशराफ, मध्यम वर्ग और निचला वर्ग. इस व्यवस्था में अब किसी अपराध की सजा उसके अपराध की गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी की सामाजिक हैसियत से तय होती है. इस कानून के अनुसार, अगर कोई इस्लामी धार्मिक विद्वान अपराध करता है तो उसे सिर्फ नसीहत दी जाएगी. अगर अपराधी उच्च वर्ग से है तो उसे अदालत बुलाया जाएगा और सलाह दी जाएगी. मध्यम वर्ग के व्यक्ति को उसी अपराध के लिए जेल होगी. लेकिन निचले वर्ग के व्यक्ति को जेल के साथ-साथ शारीरिक सजा भी दी जाएगी.
लोग बोलने से डर रहे
द इंडिपेंडेंट के अनुसार, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि लोग इस कानून के खिलाफ गुप्त रूप से भी बोलने से डर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि तालिबान ने नया आदेश जारी किया है, जिसमें इस कानून पर चर्चा करना भी अपराध बताया गया है. अफगानिस्तान का मानवाधिकार संगठन रवादारी, जो देश से बाहर रहकर काम करता है, ने एक बयान में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपील की है कि इस आपराधिक प्रक्रिया संहिता को तुरंत लागू करने से रोका जाए और इसे रोकने के लिए सभी कानूनी उपाय अपनाए जाएं.
महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि रीम अलसालेम ने एक्स पर लिखा कि इस नए कानून का महिलाओं और लड़कियों पर असर बेहद डरावना है. तालिबान यह अच्छी तरह समझ चुका है कि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय उन्हें गलत साबित करेगा, और अगर करेगा तो कब.
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