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घरेलू मोर्चे पर फेल, सरहद पर 'खेल'! अफगानिस्तान के साथ जंग के पीछे पाकिस्तान का 'डर्टी गेम'

रिपोर्ट की मानें तो पाकिस्तान में सेना की साख तेजी से गिर रही है. गिलगिट बाल्टिस्तान में शहबाज-मुनीर मुर्दाबाद के नारे लग रहे हैं. सोशल मीडिया पर इस्तीफा और बॉयकोट जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं. इससे ध्यान भटकाने के लिए ही जंग को हवा दी जा रही है.

घरेलू मोर्चे पर फेल, सरहद पर 'खेल'! अफगानिस्तान के साथ जंग के पीछे पाकिस्तान का 'डर्टी गेम'

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जंग एक बार फिर से तेज हो गई है. तालिबान ने पाकिस्तानी सेना पर काबुल, कंधार, पक्तिया और पक्तिका समेत कई अफगान प्रांतों में नए सैन्य हमले करने का आरोप लगाया है. वहीं अफगानिस्तान ने पलटवार करते हुए पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के कोहाट जिले में पाकिस्तानी सैन्य केंद्रों और प्रतिष्ठानों पर हवाई हमले किए हैं. इन हमलों के बीच अफगानी मीडिया की एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला दावा किया गया है. 

'जनता का ध्यान भटकाने को भड़काई जंग'

अफगानिस्तान की प्रमुख न्यूज एजेंसी खामा प्रेस की एक रिपोर्ट में सनसनीखेज दावा किया गया है कि पाकिस्तान की सेना जानबूझकर अफगानिस्तान से संघर्ष को हवा दे रही है. इसकी वजह बताते हुए कहा गया है कि घरेलू नाकामियों और शासन की कमजोरी से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ये जंग भड़काई जा रही है. रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान में इस वक्त शाहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के खिलाफ असंतोष चरम पर है. जनता की इस नाराजगी को दबाने के लिए 'बाहरी दुश्मन' का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है.

शाहबाज-मुनीर मुर्दाबाद के लग रहे नारे

रिपोर्ट की मानें तो पाकिस्तान के अंदर सेना की साख तेजी से गिर रही है. पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगिट बाल्टिस्तान में सुरक्षा बलों के हाथों नागरिकों की हत्या के बाद शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर मुर्दाबाद के नारे लग रहे हैं. सोशल मीडिया पर आसिम मुनीर इस्तीफा दो और बॉयकोट मिलिट्री बिजनेस जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं. अभिव्यक्ति की आजादी पर सेना की नकेल ने इस गुस्से को और भड़का दिया है. 

ताबड़तोड़ हमलों से फरवरी का महीना लाल

पाकिस्तान के लिए फरवरी का महीना हालिया इतिहास के सबसे खूनी महीनों में से एक रहा है. शिया मस्जिद में सुसाइड बॉम्बिंग से लेकर बाजौर और बन्नू में आतंकी हमले हुए. मस्जिद अटैक में ही कम से कम 36 लोग मारे गए और 170 से ज्यादा जख्मी हो गए. बाजौर हमले में 11 सैनिकों की जान चली गई. खैबर पख्तूनख्वा के बन्नू में भी बॉम्बिंग की घटनाएं हुईं. इन हमलों की एक वजह खुफिया नाकामी बताई जा रही है. 

मुनीर की सेना का पुराना फॉर्मूला

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि खुफिया एजेंसियों के पास इन संभावित हमलों की पहले से जानकारी थी, फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई. इस नाकामी को छिपाने के लिए मुनीर की सेना ने पुराना फॉर्मूला अपनाया और अफगानिस्तान के साथ सीमा पर जंग जैसे हालात पैदा कर दिए. 21 फरवरी को अफगानिस्तान के नंगरहार, पक्तिका और खोस्त प्रांतों में किए गए पाकिस्तानी हवाई हमले इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं. 

मूल मुद्दों को ध्यान भटकाने का 'खेल'

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तहरीक-ए-तालिबान और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रॉविंस (ISKP) कैंपों पर कार्रवाई कुछ और नहीं बल्कि पाकिस्तान की जनता को अपनी ताकत दिखाने का महज एक नाटक था. जब जनता सेना की खुफिया नाकामी और राजनीति में दखलंदाजी पर सवाल उठाने लगी तो अफगानिस्तान में हमले को लेकर विक्टिम कार्ड खेल दिया गया. रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय से महज 11 मील दूर इस्लामाबाद में जब आतंकी हमले हुए, तब सेना जवाब देने की स्थिति में नहीं थी. ऐसे में खुद को अफगानिस्तानी आतंकवाद का पीड़ित दिखाने और मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए पड़ोसी देश पर हमले तेज कर दिए गए. 

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