नेपाल में आई बाढ़ ने तबाही के ऐसे निशान छोड़ दिए हैं जो शायद कई सालों तक मिटने वाले नहीं हैं. नेपाल का ही देवघाट एक समय काफी खूबसूरत हुआ करता था. लोगों की चहल-पहल रहती थी, बाजार थे, घर थे और कई सपने भी थे. लेकिन आज वही देवघाट सुनसान पड़ा है. तबाही के बाद यह किसी वीरान जगह जैसा दिखाई देता है.
त्रिशूली नदी के उफान ने यहां सब कुछ खत्म कर दिया है. सिर्फ 20 मीटर आगे चलने पर ही देवघाट में बिखरे हुए सपने और जिंदगियों के निशान मिल जाते हैं. बात चाहे कीचड़ में दबी एक चप्पल की हो, किसी टूटे हुए सूटकेस की हो या फिर मिट्टी में पड़े इस गिटार की जो अब किसी भी तरह की धुन नहीं दे सकता.
देवघाट में इस समय कई घर तो पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, तो कई की नींव इतनी कमजोर हो चुकी है कि वहां रहना संभव नहीं है.
देवघाट में पहले एक पुल भी हुआ करता था, लेकिन अब वह भी नहीं है. पुल तक जाने वाली सीढ़ियां आज भी दिखाई दे रही हैं, लेकिन अब उनका कोई मतलब नहीं क्योंकि वे सीढ़ियां कहीं जाती ही नहीं हैं.

इस समय लोगों के लिए लाइफलाइन का काम जिपलाइन कर रही है. यहां भी दो तरह की जिंदगियां दिखाई दे रही हैं. जिपलाइन की एक रस्सी उस घर से बाहर निकली एक सरिया से बंधी है, वहीं जिपलाइन का दूसरा सिरा एक पेड़ से बंधा हुआ है.
यानी एक तरफ वह घर है, जो बाढ़ में गुजर गया और दूसरी तरफ वह पेड़ है जो अकेला बच गया.इस जगह पर जब एनडीटीवी पहुंचा तो जिपलाइन के पास कई स्थानीय स्वयंसेवक मौजूद थे जो निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा कर रहे थे.
हमने उनसे पूछा कि जिपलाइन पर खड़े होने पर डर नहीं लगता? तो स्वयंसेवक ने सीधा कहा, "बाढ़ आकर गुजर भी चुकी है. पानी की ताकत ने जब हमें नहीं डराया तो जिपलाइन से गिरने में कैसा डर?".
एनडीटीवी ने कई उन लोगों से भी बात की, जिनके आशियाने देवघाट में तबाह हो चुके हैं. ऐसे ही एक शख्स हैं दीपक सुनार जो बैंक में काम करते हैं. जब बाढ़ आई, तब वह अपने घर पर मौजूद नहीं थे. गनीमत यह रही कि भूस्खलन के आते ही पूरा परिवार ऊंचाई की तरफ चला गया था. ऐसे में सभी की जान तो बच गई लेकिन घर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है.

त्रिशूली नदी से सिर्फ डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर बना है यह घर लेकिन इसका निचला हिस्सा पूरी तरह खत्म हो चुका है. आसपास की जमीन इतनी कमजोर है कि घर कब तक टिका रहेगा, किसी को नहीं पता.
दीपक बताते हैं कि इस समय हालात ऐसे हैं कि पांच-छह महीने तक वे अपने घर वापस नहीं लौट सकते. एक और कहानी सीताराम रेमालची की भी है. वह दीपक के घर से सिर्फ 10 मीटर की दूरी पर रहते हैं. लेकिन सीताराम का घर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है.
वह 40 साल से यहां रह रहे थे, लेकिन अब कुछ नहीं बचा है. सिर्फ रसोई का एक छोटा-सा हिस्सा दिखाई दे रहा है. सीताराम बताते हैं, "शुरुआत में सब कुछ ठीक था, लेकिन 25 मिनट के अंदर सब कुछ बर्बाद हो गया." उनका परिवार भी बाढ़ से किसी तरह बच गया, लेकिन चार दशक पुराना घर खत्म हो चुका है.
अब सीताराम किसी दूसरी जगह पर अपना घर बनाना चाहते हैं. वह नहीं चाहते कि उनके भविष्य की पीढ़ियां भी ऐसी जगह पर रहें, जहां हमेशा उनकी जान पर खतरा बना रहे.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं