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अमेरिका के पास सबसे बड़ी सेना, फिर भी ईरान पर जमीनी हमला क्यों नामुमकिन, समझिए भूगोल

आशंका है कि अमेरिका अगले कुछ दिनों में ईरान पर हमला कर सकता है. हालांकि ये भी कड़वा सच है कि वह हवाई हमले ही कर सकता है, ईरान पर जमीनी हमला लगभग नामुमकिन है. जानिए, क्यों?

अमेरिका के पास सबसे बड़ी सेना, फिर भी ईरान पर जमीनी हमला क्यों नामुमकिन, समझिए भूगोल
  • ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में बड़ी सेना तैनात कर दी है. आशंका है कि कुछ दिनों में ईरान पर हमला हो सकता है
  • इतिहास गवाह है कि ईरान को जमीन से जीतना कितना मुश्किल है. सदियों पहले केवल मंगोल ही उसे फतह कर पाए थे
  • ईरान एक प्राकृतिक किले की तरह है, जो तीन तरफ ऊंचे पहाड़ों और चौथी तरफ गहरे समुद्र से घिरा है
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अमेरिका ने ईरान की घेराबंदी कर दी है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में अपनी बड़ी सेना तैनात कर दी है. विमान वाहक युद्धपोतों के अलावा जंगी जहाज, लड़ाकू विमान और हवा में ईंधन भरने वाले विमान भी भेजे जा चुके हैं. आशंका है कि अगले कुछ दिनों में ईरान पर हमला शुरू हो सकता है, बस ट्रंप के आदेश का इंतजार है. हालांकि ये भी कड़वा सच है कि अमेरिका ईरान पर हवाई हमले ही कर सकता है, जमीनी हमला करना लगभग नामुमकिन है. आइए बताते हैं, ऐसा क्यों है?

ईरान: एक अभेद्य प्राकृतिक किला

ईरान दुनिया का 17वां सबसे बड़ा देश है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका भूगोल है. ईरान एक प्राकृतिक किले की तरह है, जो तीन तरफ से ऊंचे पहाड़ों और चौथी तरफ गहरे समुद्र से घिरा हुआ है. देश के बीच में विशाल बंजर रेगिस्तान है, जो किसी भी बाहरी सेना के लिए काल साबित हो सकता है. ईरान के ऊंचे पर्वत, गहरी घाटियां और सीमाएं उसकी प्राकृतिक सुरक्षा ढाल का काम करती हैं. 

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सिर्फ मंगोल ही ईरान को जीत पाए

इतिहास गवाह है कि ईरान को जीतना कितना मुश्किल रहा है. सदियों पहले केवल मंगोल ही उसे फतह करने में कामयाब हो सके थे. उन्होंने भी ईरान के उत्तर-पूर्वी हिस्से से घुसपैठ करके यह जीत हासिल की थी. ओटोमन साम्राज्य की ताकतवर सेनाएं भी जाग्रोस पर्वत श्रृंखला में कुछ अंदर तक पहुंचीं, लेकिन कभी भी फारस के मध्य हृदय-क्षेत्र में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं कर सकीं. 

जाग्रोस पर्वत है सुरक्षा ढाल

ईरान की पहचान सबसे ज़्यादा उसके पहाड़ों से होती है, जो उसकी सीमाओं और प्रमुख शहरों को सुरक्षित रखते हैं. ईरान की सबसे महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला ज़ाग्रोस है. यह काकेशस पर्वतों का दक्षिणी विस्तार है और लगभग 900 मील (1448 किमी) तक लंबी हैं. ये तुर्की, आर्मेनिया से लगी उत्तर-पश्चिमी सीमा से लेकर दक्षिण-पूर्व में बंदर अब्बास और होर्मुज़ जलडमरूमध्य तक फैली हुई हैं. 

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जमीनी सेना का आगे बढ़ना मुश्किल 

ये पहाड़ इतने ऊंचे और दुर्गम हैं कि यहां टैंकों और भारी हथियारों के साथ जमीनी सेना का आगे बढ़ना लगभग नामुमकिन है. जाग्रोस के अलावा ईरान एल्बुरज और कोपेट डाग पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा है, जो इसे एक सुरक्षा घेरे में रखती हैं. ईरान के बड़े शहर इन्हीं पहाड़ों के पीछे या ऊंचाइयों पर बसे हैं, जो उन्हें सीधी जमीनी पहुंच से दूर रखते हैं.

समंदर की चुनौती और दलदली रास्ता

समुद्री रास्ते की बात करें तो ईरान की करीब 800 मील लंबी तटरेखा है. इसमें से आधा हिस्सा फारस की खाड़ी और आधा ओमान की खाड़ी के किनारे है. अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना है, लेकिन ईरान के तटों पर उतरना आसान नहीं है. दक्षिण में इराक की सीमा के पास शत्त अल-अरब का इलाका बेहद दलदली है. 1980 के दशक में सद्दाम हुसैन ने इसी रास्ते से हमला किया था, लेकिन उनकी सेना दलदल में फंसकर धीमी पड़ गई थी. 

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अमेरिकी घेराबंदी और युद्ध की आहट

मिडिल ईस्ट में मौजूदा तनाव की बात करें तो अमेरिका ने 2003 के इराक युद्ध के बाद पहली बार इतनी बड़ी वायुसेना मिडिल ईस्ट में तैनात की है. अमेरिकी नौसेना के 13 युद्धपोत जिनमें विमानवाहक पोत USS अब्राहम लिंकन और USS गेराल्ड फोर्ड शामिल हैं, ईरान के करीब पहुंच चुके हैं. इनके साथ एफ-22, एफ-35 जैसे 50 से अधिक आधुनिक लड़ाकू विमान और गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर भी तैनात हैं. अमेरिका की इतनी भारी तैयारी को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि मिडिल ईस्ट में कभी भी जंग छिड़ सकता है. 

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