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भारत-अमेरिका ट्रेड डील का पुतिन से दोस्ती पर नहीं होगा असर- 5 वजहें जान लीजिए

India US Trade Deal: व्लादिमीर पुतिन के लिए भारत- अमेरिका व्यापार समझौता कोई 'रेड लाइन' नहीं है. यह भारत की संतुलनकारी विदेश नीति का स्वाभाविक हिस्सा है. समझिए कैसे.

भारत-अमेरिका ट्रेड डील का पुतिन से दोस्ती पर नहीं होगा असर- 5 वजहें जान लीजिए
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
  • भारत- अमेरिका के बीच नया व्यापार समझौता हुआ है जिसमें भारत पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया है
  • यह समझौता आर्थिक है और इसका कोई सैन्य या सुरक्षा गठबंधन से संबंध नहीं है, इसलिए रूस इसे प्रतिकूल नहीं समझेगा
  • भारत और रूस के संबंध गहरे और बहुस्तरीय हैं, जो रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग पर आधारित हैं
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भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौता (India US Trade Deal) हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया है कि अब भारत पर 50 प्रतिशत नहीं, केवल 18 प्रतिशत टैरिफ लगेगा. पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच फोन कॉल के बाद इस व्यापार समझौते की घोषणा की गई. माना जा रहा है कि यह समझौता दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के रिश्तों को नई शुरुआत देगा. इससे व्यापार बढ़ेगा, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और वैश्विक राजनीति में भी सहयोग बढ़ेगा. हालांकि इस ट्रेड डील के ऐलान के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताने के बाद, इससे जुड़े 25 प्रतिशत टैरिफ हटा दिया है. 

अब सवाल है कि अगर अब भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करेगा तो कहीं इससे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भारत की दोस्ती पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा. 5 फैक्टर ऐसे हैं जो बताते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा.

1- भारत रणनीतिक रूप से आजाद

रूस और रूसी राष्ट्रपति यह बात अच्छे से जानते हैं कि भारत किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा नहीं बनता. भारत अमेरिका, रूस, यूरोप और ग्लोबल साउथ, सबके साथ अपने-अपने हितों के अनुसार संबंध रखता है. और भारत- अमेरिका व्यापार समझौता भी नई दिल्ली में बैठी सरकार की इसी नीति का हिस्सा है, न कि कोई रूस-विरोधी कदम.

2- यह कोई सैन्य या सुरक्षा गठबंधन नहीं

भारत और अमेरिका के बीच हुए इस व्यापार समझौता एक आर्थिक समझौता है. इसका फोकस टैरिफ, मार्केट एक्सेस और सप्लाई चेन पर है. इसमें कहीं भी रूस की सुरक्षा, यूक्रेन युद्ध या NATO विस्तार जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल नहीं हैं. इसलिए मास्को इसे सीधे अपने खिलाफ नहीं देखेगा.

3- भारत- रूस रिश्ते गहरे और बहुस्तरीय हैं

 भारत और रूस के रिशते इतने गहरे और बहुस्तरीय हैं कि ये संबंध किसी एक व्यापार समझौते से प्रभावित नहीं होते हैं. भारत रूस से रक्षा उपकरणों की खरीद करता है, उससे S-400 जैसे एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम लेता है. भारत परमाणु ऊर्जा के मुद्दे रूस के साथ डील करता है. जब रूस पर प्रतिबंध लगने के बाद बड़े-बड़े देश रूसी कच्चे तेल को खरीदने से परहेज कर रहे थे, तब भारत उससे बड़ी खरीद कर रहा था. रूस जानता है कि भारत के साथ उसका रिश्ता दीर्घकालिक और भरोसेमंद है. उसे पता है कि भारत अपने आर्थिक हित और जरूरतों के हिसाब से अमेरिका से डील कर रहा है, ठीक उसी तरह जैसे वो अपनी जरूरतों की वजह से प्रतिबंध के बावजूद रूस से तेल खरीदता आया है.

4- भारत रूस के लिए जरूरी साझेदार

यूक्रेन में जंग छेड़ने के बाद अमेरिका और यूरोप ने रूस पर तमाम प्रतिबंध लगाए हैं. उसके बाद से भारत रूस के लिए बड़ा कूटनीतिक समर्थक बनकर उभरा है. रूस भारत को नाराज करने का जोखिम नहीं लेगा, खासकर एक ऐसे व्यापार समझौते पर जो सीधे रूस को नुकसान नहीं पहुंचाता है.

5- रूस खुद भी व्यावहारिक कूटनीति अपनाता है

रूस खुद पाकिस्तान से लेकर तुर्की जैसे देशों से व्यापार करता है, जो भारत विरोधी माने जाते हैं. इसलिए वह भारत से यह उम्मीद नहीं करेगा कि वह अमेरिका से आर्थिक रिश्ते तोड़ दे. मास्को भारत के संतुलित और यथार्थवादी दृष्टिकोण को समझता है.

कुल मिलाकर पुतिन के लिए भारत- अमेरिका व्यापार समझौता कोई 'रेड लाइन' नहीं है, बल्कि भारत की संतुलनकारी विदेश नीति का स्वाभाविक हिस्सा है.

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