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चीन के BRI के जवाब में भारत लाया था IMEC, इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप के इस बिजनेस कॉरिडोर का इटली कैसे बनेगा सबसे बड़ा एंट्री गेट?

चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव को छोड़ने के बाद इटली अब जी20 में भारत के शुरू किए IMEC पर दांव लगा रहा है. क्या है ये और क्यों इसे बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा है? पूरा विश्लेषण पढ़ें.

चीन के BRI के जवाब में भारत लाया था IMEC, इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप के इस बिजनेस कॉरिडोर का इटली कैसे बनेगा सबसे बड़ा एंट्री गेट?
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (India-Middle East-Europe Economic Corridor)
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  • इटली 2023 में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से बाहर निकल कर उसी साल भारत में लॉन्च किए गए IMEC से जुड़ गया.
  • अब इटली अपनी पूरी ताकत और निवेश भारत-केंद्रित IMEC कॉरिडोर पर लगा रहा है.
  • मध्य-पूर्व देशों (यूएई और सऊदी अरब) से आने वाले जहाजों के लिए इसके बंदरगाह मुख्य टर्मिनल होंगे.
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चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जवाब में शुरू किए गए इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC), को एक नए वैकल्पिक समुद्री बिजनेस रूट के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है. इस पूरे समीकरण में इटली की भूमिका तेजी से अहम हो रही है. वजह यह है कि बीआरआई छोड़ने के बाद अब इटली खुद को भूमध्य सागर के जरिए भारत और पश्चिम एशिया से आने वाले उत्पादों के लिए यूरोप का बड़ा एंट्री गेट बनाने जा रहा है. ये दुनिया की कनेक्टिविटी राजनीति में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है. 

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IMEC क्या है?

IMEC यानी India-Middle East-Europe Economic Corridor एक ऐसा बहुपक्षीय कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट है, जिसका मकसद भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक संपर्क को तेज, सस्ता और ज्यादा भरोसेमंद बनाना है. 9 सितंबर 2023 को जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान इसके सिद्धांतों पर एमओयू (समझौता ज्ञापन) साइन किया गया था.

इसमें भारत, अमेरिका, यूरोपीय संघ, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी और इटली शामिल थे. प्रस्तावित ढांचे में समुद्री मार्ग, रेल संपर्क, सड़क नेटवर्क, ऊर्जा लिंक और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे पहलू शामिल हैं.

भारत सरकार ने 2025 में कहा था कि आईएमईसी से लॉजिस्टिक्स लागत 30 प्रतिशत तक और ट्रांसपोर्ट समय 40 प्रतिशत तक घट सकता है. अगर यह अनुमान जमीन पर सही बैठता है, तो भारत-यूरोप व्यापार का ढांचा काफी बदल सकता है.

इस गलियारे का उद्देश्य ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण जैसे विभिन्न क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना है, ताकि शक्ति का अनुचित केंद्रीकरण न हो और भागीदार राष्ट्रों के बीच लाभों का अधिक समान वितरण सुनिश्चित हो सके.

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इटली BRI से बाहर क्यों निकला?

इटली दिसंबर 2023 में चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव से बाहर निकल गया था. रिपोर्टों के मुताबिक इटली की सरकार का मानना है कि उसे इससे वो आर्थिक लाभ नहीं मिला, जिसकी उम्मीद की गई थी. इसके विपरीत चीन का इटली में निवेश घटने के साथ-साथ व्यापार घाटा बढ़ गया था. इसके अलावा, इटली अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देना चाहता था. चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव से निकलने वाला इटली एकमात्र जी7 देश बना. यह फैसला उस सोच का हिस्सा था जिसमें इटली ने चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की कोशिश की.

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IMEC के लिए इटली क्यों है अहम?

अब इटली IMEC में खुद को यूरोप के प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करना चाहता है. इसका मतलब है कि भारत और पश्चिम एशिया से आने वाला माल भूमध्य सागर के रास्ते इटली के बंदरगाहों पर उतरे, और वहां से यूरोप के बाकी हिस्सों तक तेजी से पहुंचे.

इस रणनीति में इटली के लिए केवल भौगोलिक फायदा नहीं है. उसके पास पहले से मौजूद बंदरगाह, रेल कनेक्टिविटी, औद्योगिक नेटवर्क और यूरोपीय संघ के अंदर उसकी स्थिति भी है. यही वजह है कि ट्रिएस्टे , जेनोआ और वेनिस जैसे इटली के बंदरगाह अब इस बड़ी कहानी का हिस्सा बन रहे हैं.

ट्रिएस्टे  क्यों चर्चा में है?

ट्रिएस्टे  का नाम आईएमईसी के संदर्भ में सबसे प्रमुखता से सामने आया है. इटली की मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इटली ट्रिएस्टे को यूरोपीय ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और भारत-भूमध्यसागर कनेक्टिविटी के संगम के तौर पर देख रहा है.

ट्रिएस्टे  की सबसे बड़ी ताकत उसका डीप वाटर पोर्ट और मजबूत रेल नेटवर्क है. यहां से ऑस्ट्रिया, जर्मनी और मध्य-पूर्वी यूरोप तक निर्यात के सामान जल्दी भेजे जा सकते हैं, इसलिए इसे आईएमईसी के लिए रणनीतिक पोर्ट माना जा रहा है.

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अन्य पोर्ट्स के किरदार

ट्रिएस्टे  को पूर्वी और मध्य यूरोप का गेटवे माना जा रहा है, जबकि जेनोआ पोर्ट को पश्चिमी यूरोप के लिहाज से अहम माना गया है. इसका मतलब यह है कि इटली एक ही पोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि वह मल्टी-पोर्ट मॉडल बनाना चाहता है.

इससे होकर भारत या खाड़ी देशों से होकर आने वाले सामानों को इटली के अलग-अलग बंदरगाहों के जरिए यूरोप के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाया जा सकता है. यही रणनीति इटली को केवल ट्रांजिट पॉइंट नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक हब में बदल सकती है.

क्या IMEC, BRI का जवाब है?

राजनीतिक भाषा में आईएमईसी को BRI का जवाब कहा जा रहा है, लेकिन दोनों अलग हैं. बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव चीन का मॉडल है, जबकि आईएमईसी बहुपक्षीय भागीदारी वाला ढांचा है. फिर भी तुलना इसलिए होती है क्योंकि दोनों का लक्ष्य बड़े आर्थिक भूभागों को जोड़ना है. इटली का चीन की परियोजना को छोड़कर आईएमईसी की तरफ झुकना इसी रणनीतिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है.

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BRI क्यों विवाद में रहा

चीन का BRI दुनिया भर में बंदरगाह, रेल, सड़क, पाइपलाइन और डिजिटल नेटवर्क बनाने की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक रहा है. कागज पर यह कनेक्टिविटी और विकास की परियोजना लगती है, लेकिन कई देशों में इसे कर्ज के बोझ, पारदर्शिता की कमी और रणनीतिक निर्भरता बढ़ाने वाली नीति के रूप में देखा गया.

आलोचकों का कहना है कि जिन देशों ने BRI के तहत बड़े प्रोजेक्ट लिए, वे कई बार लंबे समय तक भारी भुगतान दबाव में आ गए. कुछ जगहों पर यह चिंता भी पैदा हुई कि आर्थिक निर्भरता धीरे-धीरे राजनीतिक दबाव में बदल सकती है.

इसी पृष्ठभूमि में IMEC को एक ज्यादा संतुलित, बहुपक्षीय और खुला मॉडल माना जा रहा है. इसमें भारत, खाड़ी देशों, यूरोप और अन्य साझेदारों की साझा भूमिका है, इसलिए इसे एकतरफा दबदबे की बजाय साझेदारी आधारित ढांचे के रूप में पेश किया जा रहा है.

आगे की चुनौतियां

आईएमईसी अभी पूरी तरह लागू हो चुका कॉरिडोर नहीं है. 2023 के एमओयू में भी यह साफ था कि आगे कार्ययोजना, समयसीमा और समन्वय तंत्र विकसित किए जाने थे. यानी बंदरगाह अपग्रेडेशन, रेल कनेक्टिविटी, निवेश, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं. लेकिन अगर ये बाधाएं पार होती हैं, तो इटली सचमुच भारत से यूरोप पहुंचने वाले माल का बड़ा समुद्री दरवाजा बन सकता है.

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