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जंग की अमानवीय चाल, जानें इतिहास में कब-कब युद्ध में 'ह्यूमन शील्ड' का इस्तेमाल हुआ

युद्धों के इतिहास में कई बार आम नागरिकों को ‘ह्यूमन शील्ड’ के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर आधुनिक संघर्षों तक, यह अमानवीय रणनीति अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन और युद्ध अपराध के रूप में दर्ज होती रही है.

जंग की अमानवीय चाल, जानें इतिहास में कब-कब युद्ध में 'ह्यूमन शील्ड' का इस्तेमाल हुआ
  • युद्धों में ह्यूमन शील्ड रणनीति के तहत आम नागरिकों को सैनिक ठिकानों और हथियारों की सुरक्षा के लिए आगे रखा गया
  • सद्दाम हुसैन ने युद्ध में नागरिकों और विदेशी बंधकों को महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर ढाल के तौर पर यूज किया था
  • हिज्बुल्लाह और हमास ने आबादी वाले इलाकों में रॉकेट लॉन्च पैड्स स्थापित कर नागरिकों को युद्ध में शामिल किया
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कोई भी युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं बल्कि बढ़िया रणनीतियों से भी जीते जाते हैं. लेकिन कुछ रणनीतियां इंसानियत को शर्मसार कर देती हैं. ऐसी ही एक रणनीति है “ह्यूमन शील्ड” (मानवीय ढाल), जिसमें सैनिक ठिकानों, हथियारों या नेताओं को बचाने के लिए आम नागरिकों या कैदियों को आगे खड़ा कर दिया जाता है, ताकि दुश्मन हमला करने से हिचक जाए. इतिहास गवाह है कि यह तरीका कई बार-बार इस्तेमाल हुआ है और हर बार इसकी कीमत आम लोगों ने चुकाई है. ईरान के खिलाफ जब अमेरिका और इजरायल के हमले जारी है, तब अपने बुनियादी ढांचे और ऑयल रिफाइनरी को बचाने के लिए ईरानी नागरिक सड़कों पर उतर आए हैं. बिजली संयंत्रों की सुरक्षा के लिए आम लोगों ने मानव श्रृंखला (ह्यूमन चेन) बना ली है, जिसका वीडियो भी सामने आया है. मगर इतिहास में कई घटनाएं ऐसी भी है, जब इंसानों को जबरन ढाल की तरह इस्तेमाल किया गया. जानिए कब-कब युद्ध में ऐसा हुआ-

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जब सद्दाम हुसैन ने नागरिकों को ढाल बनाया

साल 1991 और 2003 के गल्फ और इराक युद्ध के दौरान दुनिया ने ‘ह्यूमन शील्ड' का सबसे चर्चित उदाहरण देखा. सद्दाम हुसैन ने बिजली घर, तेल रिफाइनरी और बांध जैसे अहम ठिकानों पर सैकड़ों लोगों को तैनात कर दिया था. इनमें इराकी नागरिकों के साथ विदेशी नागरिक (hostages) भी शामिल था. जिसका मकसद साफ था कि अगर अमेरिका और उसके सहयोगी हमला करें, तो नागरिकों की मौत का दबाव बने. सद्दाम हुसैन की ये रणनीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना का कारण बनी. कई विदेशियों को इराक और कुवैत छोड़ने की अनुमति नहीं दी गई और उन्हें संभावित सैन्य लक्ष्यों के पास रखा गया. अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे जिनेवा कन्वेंशन का खुला उल्लंघन बताया और युद्ध अपराध करार दिया. बाद में ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म' शुरू होने से पहले सद्दाम ने ज्यादातर विदेशी नागरिकों को रिहा कर दिया, लेकिन यह मामला युद्ध के सबसे विवादित अध्यायों में गिना जाता है.

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गाजा और लेबनान: भीड़ के बीच छिपी जंग

मिडिल ईस्ट के संघर्षों में भी यह मुद्दा बार-बार उठता रहा है. इजरायल अक्सर यह आरोप लगाता रहा है कि हिज्बुल्लाह और हमास अपने रॉकेट लॉन्च पैड्स और सैन्य ठिकानों को घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों, स्कूलों और अस्पतालों के पास बनाते हैं. कई बार स्थानीय मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर घोषणा की गई कि लोग घरों की छतों पर जमा हो जाएं ताकि इजरायली एयरफोर्स बमबारी न कर सके. इससे युद्ध और नागरिक जीवन के बीच की सीमा लगभग खत्म हो जाती है.

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श्रीलंका: LTTE और ‘मानवीय ढाल' का आरोप

श्रीलंका में तमिल टाइगर्स (LTTE) पर आरोप लगा था कि उन्होंने युद्ध के अंतिम दिनों में लगभग 3 लाख आम तमिल नागरिकों को एक छोटे से घेरे में 'ढाल' बनाकर रखा था, ताकि श्रीलंकाई सेना भारी गोलाबारी न कर सके. अंतिम चरण में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) पर बड़े पैमाने पर आम नागरिकों को ‘ह्यूमन शील्ड' की तरह इस्तेमाल करने के आरोप लगे. उस वक्त तमाम अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संयुक्त राष्ट्र, और श्रीलंका सरकार की रिपोर्टों के मुताबिक, जैसे‑जैसे लिट्टे का इलाक़ा सिमटता गया, उसने हज़ारों तमिल नागरिकों को जबरन अपने साथ बनाए रखा ताकि सरकारी सेना की कार्रवाई रोकी जा सके. कई रिपोर्टों में कहा गया कि लोग इलाका छोड़ना चाहते थे, लेकिन लिट्टे ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका, जिससे वे लड़ाई के बीच फंस गए, यही उन्हें ढाल की तरह इस्तेमाल करने का सबसे गंभीर उदाहरण माना जाता है.

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द्वितीय विश्व युद्ध: जब कैदियों को ढाल बनाया गया

जापान ने युद्ध के अंत में अपने कुछ सैन्य कारखानों के पास युद्धबंदियों (POWs) को रखा था. वहीं, नाजी जर्मनी ने भी मित्र देशों की बमबारी रोकने के लिए ट्रेनों और पुलों पर कैदियों को बिठाया था. सेनाओं पर यह आरोप लगे कि उन्होंने आम नागरिकों और युद्धबंदियों को रणनीतिक ठिकानों, जैसे स्टेशन, पुल, कारखाने और सैन्य ठिकानों के आसपास रहने के लिए मजबूर किया, ताकि दुश्मन हमला करने से हिचके. जर्मन सेना पर विशेष रूप से आरोप लगे कि उसने कब्ज़े वाले इलाकों में नागरिकों को सैन्य काफिलों और ट्रेनों के साथ चलाया गया. कई मामलों में कैदियों को सैन्य गतिविधियों के पास रखा गया, जिससे वे अनजाने में ढाल बन गए. युद्ध के बाद नूर्नबर्ग ट्रायल में इन घटनाओं का जिक्र है. इसे अमानवीय तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया. यही अनुभव आगे चलकर जिनेवा कन्वेंशन को और सख्त बनाने की एक बड़ी वजह बना।

कानूनी और नैतिक सवाल

किसी भी जंग में ‘ह्यूमन शील्ड' का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law) के तहत गंभीर उल्लंघन माना जाता है. यह जिनेवा कन्वेंशन की भावना के खिलाफ है. नागरिकों को जानबूझकर खतरे में डालना युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है. बावजूद इसके इतिहास के इन उदाहरणों से साफ है कि ‘ह्यूमन शील्ड' कोई नई चाल नहीं, बल्कि बार-बार अपनाई गई रणनीति है. लेकिन हर बार एक सवाल खड़ा होता है कि क्या युद्ध जीतने के लिए इंसानों को ढाल बनाना जायज है? इसकी सबसे बड़ी कीमत हमेशा बेगुनाह नागरिकों को चुकानी पड़ती है.

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